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टीबी का ब्लाइंड मरीज, अस्पताल ने न भर्ती किया न इलाज दिया, अब जिंदगी 'नरक' से भी बदतर

Wed, 03 Oct 2018 09:20 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अंबाला कैंट(हरियाणा)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अंबाला कैंट(हरियाणा) Updated Wed, 03 Oct 2018 09:20 AM IST
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Hospital Refused to Admit Blind Patient of TB Disease in Ambala Cantt of Haryana
blind patient
अस्पताल में टीबी के एक मरीज की जिंदगी नरक से भी बदतर हो गई है। एक तो उसे आंखों से नजर नहीं आता, दूसरा उसे भर्ती नहीं किया गया और न ही इलाज दिया गया। अब वह अस्पताल में ही फर्श पर सोता है। लोगों से मांग-मांगकर रोटी खाता है। मां मर गई, तो पिता ने दूसरी शादी कर ली। मामला हरियाणा के अंबाला कैंट का है।
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सरकार टीबी को लेकर लोगों को कितना भी जागरूक करे, लेकिन समाज में फैले भेदभाव के कारण बीमारी का पता चलते ही एक ब्लाइंड की जिंदगी नरक जैसी हो गई है। अंध महाविद्यालय से वापस भेजे जाने और टीबी अस्पताल द्वारा भर्ती नहीं किए जाने के कारण उसने सिविल अस्पताल को ही अपना ठिकाना बना लिया है। फर्श पर सोकर रात गुजारता है और दूसरों से रोटी मांगकर या रोटी बैंक की तरफ से खाना मिलने पर अपनी भूख मिटा रहा है।
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विडंबना यह है कि स्वास्थ्य मंत्री के क्षेत्र में ऐसा हो रहा है, पर अधिकारी नियमों का हवाला देकर मानवता को शर्मसार कर रहे हैं। बता दें कि आंखों से 75 प्रतिशत ब्लाइंड कर्ण कुमार निवासी वार्ड नंबर-2, राजीव कॉलोनी, घरौंडा (करनाल) की माता का कुछ साल पहले निधन हो गया था। पिता दीपक कुमार ने दूसरी शादी कर ली। इसके बाद सौतेली मां ने घर से बाहर निकाल दिया।
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पानीपत के अंध विद्यालय से दसवीं पास की। इसके बाद वह अंबाला आ गया और अंध महाविद्यालय के अध्यापकों से संपर्क किया, लेकिन टीबी की बीमारी का पता चलने पर उन्होंने रखने से मना कर दिया।

लावारिस होने के कारण भर्ती नहीं किया गया

Hospital Refused to Admit Blind Patient of TB Disease in Ambala Cantt of Haryana
hospital
कर्ण ने बताया कि कॉलेज की तरफ से कहा गया कि बीमारी सही होने के बाद ही उसे रखा जाएगा। हालांकि कॉलेज प्रबंधक का कहना है कि उनके यहां 12वीं पास को ही हॉस्टल की सुविधा है। कॉलेज की तरफ से उसका सिविल अस्पताल में इलाज चल रहा है। यहां कार्यरत ब्लाइंड रामबीर ने उसकी मदद की, जिस कारण उसका इलाज शुरू हो पाया। अस्पताल की ओर से उसे टीबी हॉस्पिटल भेजा गया, लेकिन उन्होंने लावारिस होने के कारण भर्ती करने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि दवाई दे सकते हैं, लेकिन जब तक कोई साथ में न हो एडमिट नहीं कर सकते। इसके बाद वह सिविल अस्पताल आ गया।  

कोई रोटी दे देता है तो किसी ने दी चादर
कर्ण ने बताया कि सिविल अस्पताल ने कोई जगह नहीं दी है। फर्श पर ही सोकर रात गुजारता हूं। सुबह चाय मिल जाती है। इसके बाद किसी मरीज की रोटी बचती है तो मांगकर खा लेता हूं। दोपहर बाद रोटी बैंक की ओर से खाना आने पर भूख मिटा लेता हूं। उसने बताया कि कुछ दिन पहले एक मरीज जब जाने लगा तो उसने अपनी चादर दे दी।

टीबी का मरीज होने के चलते कर्ण को कोई भी छात्र रखने के लिए तैयार नहीं हुआ। हमारे यहां विद्यार्थी को ही हॉस्टल में रखने का प्रावधान है।
- जेएस अग्रवाल, सुपरिंटेंडेंट, अंध महाविद्यालय
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