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देश में विज्ञान के भंडार का सृजन करना है तो पेशेवर लोगों को आगे आना होगा: विनोद संदलेश
Sat, 12 Sep 2020 11:17 AM IST
खुशबू गोयल
अमर उजाला, चंडीगढ़
अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Sat, 12 Sep 2020 11:17 AM IST
सार
- पीयू में हिंदी माह उत्सव के तहत ‘अनुवाद का संसार और हिंदी’ विषय पर परिचर्चा
- केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो नई दिल्ली के संयुक्त निदेशक विनोद संदलेश ने की शिरकत
- अनुवाद से नहीं जुड़ेंगे तो तकनीक, ज्ञान, विज्ञान या साहित्य का दायरा सीमित हो जाएगा
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विस्तार
विज्ञान के भंडार का सृजन यदि अपनी भाषा में करना है तो उसके लिए विश्वविद्यालय एवं अन्य संस्थानों से जुड़े पेशेवर लोगों को आगे आना होगा। यह कार्य केवल अनुवादकों के भरोसे नहीं हो पाएगा। यह बात पीयू में हिंदी विभाग की ओर से हिंदी माह उत्सव के तहत विशेष व्याख्यान श्रृंखला की पांचवीं कड़ी में शुक्रवार को केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो नई दिल्ली के संयुक्त निदेशक विनोद संदलेश ने कही। इस अवसर पर ‘अनुवाद का संसार और हिंदी’ विषय पर परिचर्चा हुई।
बतौर मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए विनोद संदलेश ने कहा कि आने वाला समय अनुवाद का है। यदि हम अनुवाद से नहीं जुड़ेंगे तो चाहे तकनीक हो, ज्ञान- विज्ञान हो या साहित्य हमारा दायरा बहुत सीमित हो जाएगा। यह भी उल्लेखनीय है कि भारत को साहित्य का इकलौता नोबेल पुरस्कार रवीन्द्र नाथ टैगोर की गीतांजलि को अनुवाद के माध्यम से ही मिला। उन्होंने कहा कि आने वाला युग अनुवाद का युग होगा और हिंदी भाषी लोगों के लिए अगले 20 वर्षों में अनुवाद की असीम संभावनाएं हैं बशर्ते कि वह बहुभाषी बनें।
देश में अच्छे अनुवादकों की भारी कमी
उदाहरण के लिए यदि भौतिक शास्त्र के ज्ञान को हिंदी में लाना है तो भौतिक शास्त्री को स्वयं अनुवाद की जिम्मेवारी लेनी होगी। विडंबना यह है कि सरकार के स्तर पर तो उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी बढ़ावा देने के लिए अनुवाद की योजना बनाई गई है, लेकिन अच्छे अनुवादकों की आज भी भारी कमी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीक के इस युग में अनुवाद की भूमिका कम नहीं हुई है न ही अनुवाद के बिना किसी भी देश में भाषिक एकता हो सकती है। उन्होंने लीला, कंठस्थ और मंत्रा आदि एप की जानकारी देते हुए बताया कि तकनीक के क्षेत्र में अनुवाद की बड़ी भूमिका है।
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बतौर मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए विनोद संदलेश ने कहा कि आने वाला समय अनुवाद का है। यदि हम अनुवाद से नहीं जुड़ेंगे तो चाहे तकनीक हो, ज्ञान- विज्ञान हो या साहित्य हमारा दायरा बहुत सीमित हो जाएगा। यह भी उल्लेखनीय है कि भारत को साहित्य का इकलौता नोबेल पुरस्कार रवीन्द्र नाथ टैगोर की गीतांजलि को अनुवाद के माध्यम से ही मिला। उन्होंने कहा कि आने वाला युग अनुवाद का युग होगा और हिंदी भाषी लोगों के लिए अगले 20 वर्षों में अनुवाद की असीम संभावनाएं हैं बशर्ते कि वह बहुभाषी बनें।
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देश में अच्छे अनुवादकों की भारी कमी
उदाहरण के लिए यदि भौतिक शास्त्र के ज्ञान को हिंदी में लाना है तो भौतिक शास्त्री को स्वयं अनुवाद की जिम्मेवारी लेनी होगी। विडंबना यह है कि सरकार के स्तर पर तो उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी बढ़ावा देने के लिए अनुवाद की योजना बनाई गई है, लेकिन अच्छे अनुवादकों की आज भी भारी कमी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीक के इस युग में अनुवाद की भूमिका कम नहीं हुई है न ही अनुवाद के बिना किसी भी देश में भाषिक एकता हो सकती है। उन्होंने लीला, कंठस्थ और मंत्रा आदि एप की जानकारी देते हुए बताया कि तकनीक के क्षेत्र में अनुवाद की बड़ी भूमिका है।
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व्याख्यान के बाद प्रश्न-उत्तर सत्र का आयोजन
व्याख्यान के बाद प्रश्न-उत्तर का सत्र भी हुआ, जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों अहमदनगर, बोधगया, कोल्हापुर और प्रयागराज से शोधार्थी एवं प्राध्यापकों ने हिस्सा लिया। विभागाध्यक्ष डॉ. गुरमीत सिंह ने सभी का स्वागत करते हुए बताया कि इस वर्ष हिंदी माह उत्सव में विशेष तौर पर ऑनलाइन माध्यम का लाभ उठाकर के देश के विभिन्न हिस्सों के विद्वानों को जोड़ने की कोशिश की गई है, ताकि विद्यार्थी हिंदी की व्यापक पहुंच से अवगत हो सकें।
14 सितंबर को डॉ. इरशाद कामिल करेंगे शिरकत
इस कड़ी में 14 सितंबर को हिंदी दिवस पर इस एक माह के उत्सव का समापन कार्यक्रम होगा। इसमें प्रसिद्ध गीतकार और हिंदी विभाग के पूर्व छात्र डॉ. इरशाद कामिल मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। वे ‘हिंदी-उर्दू-पंजाबी की साझा विरासत’ पर अपनी बात रखेंगे।
‘हिंदी हैं हम’ कविता लेखन प्रतियोगिता में 115 प्रविष्टियां मिलीं
आज के कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से 50 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इनमें विभाग के प्रो. सत्यपाल सहगल, डॉ राजेश जायसवाल प्रयागराज से डॉ. ज्ञानेन्द्र शुक्ल और श्री प्रशांत मिश्रा शामिल रहे। इस हिंदी माह उत्सव में छह विशेष व्याख्यानों के अलावा ‘हिंदी हैं हम’ नाम से कविता लेखन प्रतियोगिता भी आयोजित की गई। इसमें अंतिम तिथि तक 115 से अधिक प्रविष्टियां प्राप्त हुईं हैं। इस प्रतियोगिता के नतीजे 14 सितंबर के कार्यक्रम में घोषित होंगे।
14 सितंबर को डॉ. इरशाद कामिल करेंगे शिरकत
इस कड़ी में 14 सितंबर को हिंदी दिवस पर इस एक माह के उत्सव का समापन कार्यक्रम होगा। इसमें प्रसिद्ध गीतकार और हिंदी विभाग के पूर्व छात्र डॉ. इरशाद कामिल मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। वे ‘हिंदी-उर्दू-पंजाबी की साझा विरासत’ पर अपनी बात रखेंगे।
‘हिंदी हैं हम’ कविता लेखन प्रतियोगिता में 115 प्रविष्टियां मिलीं
आज के कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से 50 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इनमें विभाग के प्रो. सत्यपाल सहगल, डॉ राजेश जायसवाल प्रयागराज से डॉ. ज्ञानेन्द्र शुक्ल और श्री प्रशांत मिश्रा शामिल रहे। इस हिंदी माह उत्सव में छह विशेष व्याख्यानों के अलावा ‘हिंदी हैं हम’ नाम से कविता लेखन प्रतियोगिता भी आयोजित की गई। इसमें अंतिम तिथि तक 115 से अधिक प्रविष्टियां प्राप्त हुईं हैं। इस प्रतियोगिता के नतीजे 14 सितंबर के कार्यक्रम में घोषित होंगे।