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स्वच्छता को लेकर हाईकोर्ट की फटकार, 'जिम्मेदारी नहीं निभा सकते तो नगर निगम कर दो भंग'
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sun, 23 Apr 2017 09:38 AM IST
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : File Photo
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शहर में गंदगी के कारण बढ़ रही बीमारियों, निगम की लापरवाही और फंड के खर्च न होने पर हाईकोर्ट ने पंचकूला नगर निगम को जिम्मेदारी निभाने में नाकाम करार दिया है। अदालत ने हरियाणा म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन एक्ट-1994 की धारा-400 के तहत निगम को भंग करने की सलाह दी है।
हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार को निगम की सभी शक्तियां और अधिकार अपने तहत लेकर विकास के लिए काम आरंभ करना चाहिए। बदहाल व्यवस्था होने से फंड बिना इस्तेमाल हुए वापस चले गए, जो निगम की कार्यशैली को दर्शाता है। हाईकोर्ट ने अब विकास कार्यों के लिए जारी फंड का उचित इस्तेमाल न करने पर निगम को अगली सुनवाई पर जवाब सौंपने के आदेश दिए हैं।
पंचकूला वासियों को सुविधाएं देने, यहां लगे गंदगी के ढेर, बदहाल सीवरेज सिस्टम और अव्यवस्था पर कड़ा रुख अपनाते हुए हाईकोर्ट ने पंचकूला नगर निगम को कड़ी फटकार लगाई। हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा की पंचकूला में जगह-जगह खुले में गंदगी के ढेर लगे हैं। गंदगी के कारण डेंगू, चिकनगुनिया, मलेरिया, टाइफायड और बुखार के मरीजों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। एक ओर जहां गंदगी लोगों की सेहत बिगाड़ रही है, वहीं वेस्ट वाटर का कुप्रबंधन भी बड़ा सरदर्द बना हुआ है।
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पीने का पानी ट्यूबवेल के जरिये सप्लाई होता है, ऐसे में इसके प्रदूषित होने का खतरा बना हुआ है। निगम विकास कार्यों के लिए फंड होने के बावजूद न जाने क्यों इसे खर्च नहीं कर रहा और बीमारियों के हवाले कर रहा है। हाईकोर्ट ने कहा कि अगर नगर निगम की ऐसी ही कार्यप्रणाली रही तो पंचकूला नगर निगम को भंग करना ज्यादा उचित रहेगा।
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हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार को निगम की सभी शक्तियां और अधिकार अपने तहत लेकर विकास के लिए काम आरंभ करना चाहिए। बदहाल व्यवस्था होने से फंड बिना इस्तेमाल हुए वापस चले गए, जो निगम की कार्यशैली को दर्शाता है। हाईकोर्ट ने अब विकास कार्यों के लिए जारी फंड का उचित इस्तेमाल न करने पर निगम को अगली सुनवाई पर जवाब सौंपने के आदेश दिए हैं।
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पंचकूला वासियों को सुविधाएं देने, यहां लगे गंदगी के ढेर, बदहाल सीवरेज सिस्टम और अव्यवस्था पर कड़ा रुख अपनाते हुए हाईकोर्ट ने पंचकूला नगर निगम को कड़ी फटकार लगाई। हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा की पंचकूला में जगह-जगह खुले में गंदगी के ढेर लगे हैं। गंदगी के कारण डेंगू, चिकनगुनिया, मलेरिया, टाइफायड और बुखार के मरीजों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। एक ओर जहां गंदगी लोगों की सेहत बिगाड़ रही है, वहीं वेस्ट वाटर का कुप्रबंधन भी बड़ा सरदर्द बना हुआ है।
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पीने का पानी ट्यूबवेल के जरिये सप्लाई होता है, ऐसे में इसके प्रदूषित होने का खतरा बना हुआ है। निगम विकास कार्यों के लिए फंड होने के बावजूद न जाने क्यों इसे खर्च नहीं कर रहा और बीमारियों के हवाले कर रहा है। हाईकोर्ट ने कहा कि अगर नगर निगम की ऐसी ही कार्यप्रणाली रही तो पंचकूला नगर निगम को भंग करना ज्यादा उचित रहेगा।
नगर निगम अपने मकसद में पूरी तरह से नाकाम
पंचकूला नगर निगम
- फोटो : file photo
पंचकूला नगर निगम अपने मकसद में पूरी तरह से नाकाम रहा है। सरकार की सुविधाओं का निगम लाभ उठा रहा है, लेकिन लोगों को सुविधाएं देने में नाकाम रहा है। जस्टिस अमित रावल के यह आदेश सकेतड़ी के एक निवासी याचिकाकर्ता द्वारा घर में सीवर के पानी के भरे जाने के खिलाफ दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
हाईकोर्ट ने कहा की यहां की अव्यवस्थाओं को लेकर मार्च में डीसी और निगम कमिश्नर को बुलाया गया था, इसके बावजूद स्थिति में सुधार नहीं हुआ। सीवर के मामले में निगम के इंजीनियर ने हाईकोर्ट को बताया था कि यह काम पब्लिक हेल्थ विभाग का है, लेकिन इस मामले में हेल्थ विभाग को लिखे किसी पत्र की हाईकोर्ट को जानकारी तक नहीं दी गई।
हाईकोर्ट ने कहा की निगम विकास के लिए जारी किए गए फंड के इस्तेमाल में पूरी तरह से नाकाम रहा है। वर्ष 2014-15 में निगम को 74 करोड़ सरकार ने जारी किए, इसमें से सिर्फ 28 करोड़ ही खर्च किए गए। वर्ष 2015-16 में 75 करोड़ 80 लाख जारी किए गए, जिसमें से 24 करोड़ 63 लाख ही खर्च किए गए।
इसी तरह वर्ष 2016 में विकास कार्यों के लिए निगम को 44 करोड़ जारी किए गए, जिसमें से सिर्फ सात्र करोड़ 51 लाख रुपये ही खर्च किए जा सके हैं। ऐसे में तय है की विकास कार्यों के लिए जारी फंड का आधा हिस्सा भी इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है।
हाईकोर्ट ने कहा की यहां की अव्यवस्थाओं को लेकर मार्च में डीसी और निगम कमिश्नर को बुलाया गया था, इसके बावजूद स्थिति में सुधार नहीं हुआ। सीवर के मामले में निगम के इंजीनियर ने हाईकोर्ट को बताया था कि यह काम पब्लिक हेल्थ विभाग का है, लेकिन इस मामले में हेल्थ विभाग को लिखे किसी पत्र की हाईकोर्ट को जानकारी तक नहीं दी गई।
हाईकोर्ट ने कहा की निगम विकास के लिए जारी किए गए फंड के इस्तेमाल में पूरी तरह से नाकाम रहा है। वर्ष 2014-15 में निगम को 74 करोड़ सरकार ने जारी किए, इसमें से सिर्फ 28 करोड़ ही खर्च किए गए। वर्ष 2015-16 में 75 करोड़ 80 लाख जारी किए गए, जिसमें से 24 करोड़ 63 लाख ही खर्च किए गए।
इसी तरह वर्ष 2016 में विकास कार्यों के लिए निगम को 44 करोड़ जारी किए गए, जिसमें से सिर्फ सात्र करोड़ 51 लाख रुपये ही खर्च किए जा सके हैं। ऐसे में तय है की विकास कार्यों के लिए जारी फंड का आधा हिस्सा भी इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है।