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Highcourt: अंजान गवाह का सीधे अदालत में आरोपी को पहचानना वैध नहीं, हत्या में दोषी को हाईकोर्ट ने किया दोषमुक्त
Thu, 21 Nov 2024 03:19 PM IST
निवेदिता वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Thu, 21 Nov 2024 03:19 PM IST
सार
हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस को आरोपी की पहचान सुनिश्चित करने के लिए पहचान परीक्षण परेड आयोजित करनी चाहिए थी। वैध पहचान परीक्षण परेड आयोजित किए बिना अभियोजन पक्ष के गवाह ने अदालत में आरोपी की पहचान की
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पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे एक व्यक्ति को दोषमुक्त करार देते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि यदि गवाह अंजान है और दोषी को सीधा अदालत में पहचानता है तो उसकी गवाही सत्य नहीं मानी जा सकती। कोर्ट में पहचानने से पहले उसकी टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (कई अंजानों में से आरोपी को पहचानना) जरूरी है।
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संगरूर निवासी कुलदीप सिंह ने 2007 में हुई हत्या के एक मामले में मई 2013 में सुनाई गई उम्रकैद की सजा के आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष का मामला विश्वसनीय नहीं था तथा चश्मदीद की गवाही सत्य नहीं थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार कुलदीप ने एक अन्य सह-आरोपी के साथ मिलकर खेतों में भगवान सिंह की हत्या की थी और मोटरसाइकिल पर भाग गए थे। हाईकोर्ट ने कहा कि कथित चश्मदीद ने जांच अधिकारी के समक्ष कहा था कि आरोपी साफ-सुथरा था, लेकिन यह अपेक्षित प्रमुख शारीरिक विशेषताओं का अपर्याप्त विवरण है।
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हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस को आरोपी की पहचान सुनिश्चित करने के लिए पहचान परीक्षण परेड आयोजित करनी चाहिए थी। वैध पहचान परीक्षण परेड आयोजित किए बिना अभियोजन पक्ष के गवाह ने अदालत में आरोपी की पहचान की और यह स्पष्ट रूप से यह एक बहुत ही कमजोर पहचान प्रतीत होती है।
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हाईकोर्ट ने कहा कि गवाह विश्वसनीय नहीं है क्योंकि उसने यह गवाही दी थी कि उसे दर्शन सिंह जो इलेक्ट्रीशियन है, ने बताया था कि उसके मृतक चचेरे भाई को आरोपी ने घायल कर दिया था। हालांकि वह उक्त इलेक्टि्रशियन को गवाह के रूप में पेश करने में विफल रहा। इस वजह से अभियोजन पक्ष की ओर से चूक बयान की सत्यता पर सवाल उठाती है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि 315 बोर की पिस्तौल, कारतूसों के साथ, कथित तौर पर संबंधित आरोपी के कहने पर बरामद की गई थी, लेकिन उसे कभी भी बैलिस्टिक विशेषज्ञ के पास राय के लिए नहीं भेजा गया। उपरोक्त के मद्देनजर, हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि आदेश को रद्द करते हुए याची को बरी करने का आदेश दिया है।