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एक वकील, जिसने सैकड़ों एसिड पीड़ितों के लिए लड़ाई लड़ी और जीती भी...
विवेक शर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 21 Oct 2017 08:41 PM IST
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HC Arora
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2012 में एक समाचार पत्र में प्रकाशित खबर ने एक वकील की जिंदगी बदल दी। एक मासूम सुंदर बच्ची को तेजाब डाल कर उसकी जिंदगी बर्बाद कर देने वाला यह वाकया विचलित कर देने वाला था। पूरी रात नींद नहीं आई और अगले दिन कानूनी लड़ाई लड़ने के मकसद के साथ एडवोकेट एचसी अरोड़ा ने इस हैवानियत के खिलाफ कदम बढ़ाने आरंभ कर दिए। कानून की तलवार लेकर इसे एसिड अटैक पीड़ितों की ढाल बनाने का फैसला लेकर वे आगे बढ़ते गए।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट एचसी अरोड़ा ने 2012 से एसिड अटैक पीड़ितों के लिए लड़ाई आरंभ की। जनहित याचिका के माध्यम से उन्होंने पंजाब के तेजाब पीड़ितों को राहत दिलाने की लड़ाई आरंभ की तो हाईकोर्ट ने इस याचिका में चंडीगढ़ और हरियाणा को भी जोड़ दिया। आखिरकार हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ ने तेजाब पीड़ितों के लिए पॉलिसी बनाई।
फिर पीड़ितों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए आर्थिक सहायता की अपील लेकर हाईकोर्ट पहुंचे। उनकी सोच का ही नतीजा है कि अब पॉलिसी के अनुसार पीड़ितों को 8 हजार रुपये प्रतिमाह की आर्थिक सहायता देने का निर्णय लिया गया और पर्सन विद डिसएबिलिटी एक्ट के तहत 40 प्रतिशत से अधिक अपंगता होने पर कोटे के तहत नौकरी के लिए आवेदन करने के लिया योग्य करार दिया गया। अभी तक अरोड़ा ने दर्जन भर से अधिक ऐसी पीड़ितों के केस लड़े हैं और उन्हें इंसाफ दिलाने की दिशा में काम किया है। यही नहीं, यदि एसिड अटैक का कोई आरोपी बरी होता है तो उसके खिलाफ अपील तथा यदि कोई जमानत मांगने हाईकोर्ट आता है उसके खिलाफ केस लड़ने के लिए फीस नहीं लेते ।
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट एचसी अरोड़ा ने 2012 से एसिड अटैक पीड़ितों के लिए लड़ाई आरंभ की। जनहित याचिका के माध्यम से उन्होंने पंजाब के तेजाब पीड़ितों को राहत दिलाने की लड़ाई आरंभ की तो हाईकोर्ट ने इस याचिका में चंडीगढ़ और हरियाणा को भी जोड़ दिया। आखिरकार हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ ने तेजाब पीड़ितों के लिए पॉलिसी बनाई।
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फिर पीड़ितों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए आर्थिक सहायता की अपील लेकर हाईकोर्ट पहुंचे। उनकी सोच का ही नतीजा है कि अब पॉलिसी के अनुसार पीड़ितों को 8 हजार रुपये प्रतिमाह की आर्थिक सहायता देने का निर्णय लिया गया और पर्सन विद डिसएबिलिटी एक्ट के तहत 40 प्रतिशत से अधिक अपंगता होने पर कोटे के तहत नौकरी के लिए आवेदन करने के लिया योग्य करार दिया गया। अभी तक अरोड़ा ने दर्जन भर से अधिक ऐसी पीड़ितों के केस लड़े हैं और उन्हें इंसाफ दिलाने की दिशा में काम किया है। यही नहीं, यदि एसिड अटैक का कोई आरोपी बरी होता है तो उसके खिलाफ अपील तथा यदि कोई जमानत मांगने हाईकोर्ट आता है उसके खिलाफ केस लड़ने के लिए फीस नहीं लेते ।
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कोई बेटी नहीं जाती है इनके घर से खाली हांथ
HC Arora
फैसला सरकारी पर परोक्ष रूप से अरोड़ा को श्रेय
हरियाणा और पंजाब की सरकार द्वारा एसिड अटैक पीड़ितों के लिए जो कदम उठाए जा रहे हैं सरकार भले ही उन योजनाओं श्रेय ले रही हैं, लेकिन यह योजनाएं हाईकोर्ट की पीआईएल बेंच के अरोड़ा द्वारा लड़ी गई कानूनी लड़ाई का नतीजा हैं ।
कोई बेटी नहीं जाती है इनके घर से खाली हांथ
एसिड अटैक पीड़ितों के लिए मुहिम चलाने और उनके केस लड़ने के साथ ही उनकी आर्थिक सहायता में भी अरोड़ा पीछे नहीं हैं। अक्सर इन पीड़ितों के पास आने-जाने का खर्च तक नहीं होता है। एचसी अरोड़ा उन्हें आने-जाने के खर्च के साथ ही अपने सामर्थ्य के अनुसार आर्थिक सहायता भी उपलब्ध करवाते हैं।
ऐसे आए समाज सेवा क्षेत्र में
एचसी अरोड़ा बैंक में अच्छे पोस्ट पर तैनात थे। नौकरी से त्यागपत्र देकर उन्होंने वकालत शुरू कर दी। इससे भी मन को शांति नहीं मिली। समाज के लिए कुछ करने के मकसद से जनहित याचिका (पीआईएल) दायर करनी शुरू कर दी। इसके लिए सूचना के अधिकार को हथियार के तौर पर प्रयोग किया। अभी तक वे सवा सौ से भी अधिक जनहित याचिकाएं दायर कर चुके हैं।
हरियाणा और पंजाब की सरकार द्वारा एसिड अटैक पीड़ितों के लिए जो कदम उठाए जा रहे हैं सरकार भले ही उन योजनाओं श्रेय ले रही हैं, लेकिन यह योजनाएं हाईकोर्ट की पीआईएल बेंच के अरोड़ा द्वारा लड़ी गई कानूनी लड़ाई का नतीजा हैं ।
कोई बेटी नहीं जाती है इनके घर से खाली हांथ
एसिड अटैक पीड़ितों के लिए मुहिम चलाने और उनके केस लड़ने के साथ ही उनकी आर्थिक सहायता में भी अरोड़ा पीछे नहीं हैं। अक्सर इन पीड़ितों के पास आने-जाने का खर्च तक नहीं होता है। एचसी अरोड़ा उन्हें आने-जाने के खर्च के साथ ही अपने सामर्थ्य के अनुसार आर्थिक सहायता भी उपलब्ध करवाते हैं।
ऐसे आए समाज सेवा क्षेत्र में
एचसी अरोड़ा बैंक में अच्छे पोस्ट पर तैनात थे। नौकरी से त्यागपत्र देकर उन्होंने वकालत शुरू कर दी। इससे भी मन को शांति नहीं मिली। समाज के लिए कुछ करने के मकसद से जनहित याचिका (पीआईएल) दायर करनी शुरू कर दी। इसके लिए सूचना के अधिकार को हथियार के तौर पर प्रयोग किया। अभी तक वे सवा सौ से भी अधिक जनहित याचिकाएं दायर कर चुके हैं।