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Chandigarh News: हाईकोर्ट में 100 प्रतिशत से अधिक निपटारे की रफ्तार, 2026 में चार लाख मामलों के समाधान की उम्मीद
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चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में उठाए गए प्रशासनिक और प्रक्रियात्मक कदमों का असर अब साफ दिखने लगा है। अदालत में मामलों के निपटारे की दर 100 प्रतिशत से अधिक पहुंच चुकी है, जिससे वर्ष 2026 में करीब चार लाख लंबित मामलों के निपटारे की संभावना जताई जा रही है। यह उपलब्धि ऐसे समय में सामने आई है, जब हाईकोर्ट में स्वीकृत 85 पदों के मुकाबले केवल 55 न्यायाधीश ही कार्यरत हैं और 30 पद रिक्त हैं।
आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2025 में लंबित मामलों की संख्या 4,32,227 थी, जो घटकर अब 4,20,466 रह गई है। जुलाई 2025 में मामलों के निपटारे का प्रतिशत 107.62 था, जो सितंबर के अंत तक बढ़कर 116.39 पहुंच गया। इस वर्ष अब तक 811 संस्थानों से जुड़े 1,962 मामलों का निपटारा किया जा चुका है, जबकि पिछले वर्ष 70,354 संस्थानों से संबंधित 85,309 मामलों का समाधान हुआ था।
पहले याचिका दाखिल होने के बाद प्रतियां विरोधी पक्ष को दी जाती थीं, जिससे सुनवाई टलती रहती थी। अब बिना अग्रिम प्रति दिए याचिकाएं बेंच के समक्ष सूचीबद्ध नहीं की जातीं, जिससे अनावश्यक स्थगन पर लगाम लगी है।
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विलंब से दाखिल उत्तरों और हलफनामों पर अदालत ने शून्य सहिष्णुता का रुख अपनाया है। समयसीमा तोड़ने पर अब जुर्माना लगाकर ही दस्तावेज स्वीकार किए जा रहे हैं। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से वकीलों की उपस्थिति से स्थगन के कारण कम हुए हैं। अदालतें पहले शुरू हो रही हैं और अधिक समय तक बैठ रही हैं। डिवीजन बेंचों की संख्या 13 से घटाकर आठ करने से अतिरिक्त न्यायिक समय उपलब्ध हुआ है। 14 जनवरी 2026 से लागू नई अनुसूची से निपटान क्षमता और बढ़ने की उम्मीद है।
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आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2025 में लंबित मामलों की संख्या 4,32,227 थी, जो घटकर अब 4,20,466 रह गई है। जुलाई 2025 में मामलों के निपटारे का प्रतिशत 107.62 था, जो सितंबर के अंत तक बढ़कर 116.39 पहुंच गया। इस वर्ष अब तक 811 संस्थानों से जुड़े 1,962 मामलों का निपटारा किया जा चुका है, जबकि पिछले वर्ष 70,354 संस्थानों से संबंधित 85,309 मामलों का समाधान हुआ था।
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पहले याचिका दाखिल होने के बाद प्रतियां विरोधी पक्ष को दी जाती थीं, जिससे सुनवाई टलती रहती थी। अब बिना अग्रिम प्रति दिए याचिकाएं बेंच के समक्ष सूचीबद्ध नहीं की जातीं, जिससे अनावश्यक स्थगन पर लगाम लगी है।
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विलंब से दाखिल उत्तरों और हलफनामों पर अदालत ने शून्य सहिष्णुता का रुख अपनाया है। समयसीमा तोड़ने पर अब जुर्माना लगाकर ही दस्तावेज स्वीकार किए जा रहे हैं। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से वकीलों की उपस्थिति से स्थगन के कारण कम हुए हैं। अदालतें पहले शुरू हो रही हैं और अधिक समय तक बैठ रही हैं। डिवीजन बेंचों की संख्या 13 से घटाकर आठ करने से अतिरिक्त न्यायिक समय उपलब्ध हुआ है। 14 जनवरी 2026 से लागू नई अनुसूची से निपटान क्षमता और बढ़ने की उम्मीद है।