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रोचक मामला: भुलाए जाने के अधिकार पर हाईकोर्ट करेगा सुनवाई
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सेना के अधिकारी ने हाईकोर्ट के सभी आर्डर से नाम हटाने की लगाई गुहार
दुष्कर्म के मामले में बरी होने को बनाया अपना नाम हटाने का आधार
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में अपनी तरह का एक अलग मामला पहुंचा है, जिसमें याचिकाकर्ता ने भुलाए जाने के अधिकार का हवाला देते हुए हाईकोर्ट के सभी आदेशों से अपना नाम हटाने के लिए गुहार लगाई है। ऐसे में अब हाईकोर्ट इस कानूनी प्रश्न पर निर्णय करेगा कि क्या किसी अभियुक्त या संदिग्ध को भुलाए जाने का अधिकार है, जबकि समाज का आपराधिक मामले में किसी व्यक्ति की संलिप्तता के बारे में जानने के अधिकार है। साथ ही केंद्र सरकार को हाईकोर्ट ने नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
मूल रूप से हरियाणा के निवासी सैन्य अधिकारी ने याचिका दाखिल करते हुए भुलाए जाने के अधिकार के मद्देनजर दुष्कर्म के एक मामले में हाईकोर्ट की ओर से पारित अंतिम अग्रिम जमानत आदेश को ऑनलाइन रिकार्ड से हटाने के लिए गूगल, इंडियन कानून और चावला प्रकाशन को निर्देश देने की मांग की थी। याचिका में कहा, वह एक सैन्य अधिकारी हैं और उन्हें मामले में ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया है, इसलिए मामले में उपलब्ध अग्रिम जमानत आदेश को ऑनलाइन रिकार्ड को हटा दिया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता ने कहा, हाईकोर्ट ने नियमों के अनुसार अग्रिम जमानत आदेश में याचिकाकर्ता का नाम छिपा दिया था। हालांकि, इंडियन कानून और दूसरी वेबसाइट ने ऐसा नहीं किया। जब भी याचिकाकर्ता का नाम गूगल किया जाता है, तो जमानत आदेश दिखाने वाला इंडियन कानून का पेज गूगल रिजल्ट में सबसे ऊपर दिखाई देता है। अगर याचिकाकर्ता का नाम नहीं छिपाया जाता है, तो इससे याचिकाकर्ता और उसके परिवार के सदस्यों की प्रतिष्ठा और सामाजिक प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। हाईकोर्ट ने कहा, यह जांचना जरूरी है कि क्या किसी अपराध के अभियुक्त/संदिग्ध को भुलाए जाने का अधिकार है, जो समाज के अधिकार के विरुद्ध है।
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दुष्कर्म के मामले में बरी होने को बनाया अपना नाम हटाने का आधार
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में अपनी तरह का एक अलग मामला पहुंचा है, जिसमें याचिकाकर्ता ने भुलाए जाने के अधिकार का हवाला देते हुए हाईकोर्ट के सभी आदेशों से अपना नाम हटाने के लिए गुहार लगाई है। ऐसे में अब हाईकोर्ट इस कानूनी प्रश्न पर निर्णय करेगा कि क्या किसी अभियुक्त या संदिग्ध को भुलाए जाने का अधिकार है, जबकि समाज का आपराधिक मामले में किसी व्यक्ति की संलिप्तता के बारे में जानने के अधिकार है। साथ ही केंद्र सरकार को हाईकोर्ट ने नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
मूल रूप से हरियाणा के निवासी सैन्य अधिकारी ने याचिका दाखिल करते हुए भुलाए जाने के अधिकार के मद्देनजर दुष्कर्म के एक मामले में हाईकोर्ट की ओर से पारित अंतिम अग्रिम जमानत आदेश को ऑनलाइन रिकार्ड से हटाने के लिए गूगल, इंडियन कानून और चावला प्रकाशन को निर्देश देने की मांग की थी। याचिका में कहा, वह एक सैन्य अधिकारी हैं और उन्हें मामले में ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया है, इसलिए मामले में उपलब्ध अग्रिम जमानत आदेश को ऑनलाइन रिकार्ड को हटा दिया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता ने कहा, हाईकोर्ट ने नियमों के अनुसार अग्रिम जमानत आदेश में याचिकाकर्ता का नाम छिपा दिया था। हालांकि, इंडियन कानून और दूसरी वेबसाइट ने ऐसा नहीं किया। जब भी याचिकाकर्ता का नाम गूगल किया जाता है, तो जमानत आदेश दिखाने वाला इंडियन कानून का पेज गूगल रिजल्ट में सबसे ऊपर दिखाई देता है। अगर याचिकाकर्ता का नाम नहीं छिपाया जाता है, तो इससे याचिकाकर्ता और उसके परिवार के सदस्यों की प्रतिष्ठा और सामाजिक प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। हाईकोर्ट ने कहा, यह जांचना जरूरी है कि क्या किसी अपराध के अभियुक्त/संदिग्ध को भुलाए जाने का अधिकार है, जो समाज के अधिकार के विरुद्ध है।
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