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हाईकोर्ट हैरान, पूछा- मान-सम्मान के नाम पर अपनों की हत्या करने को कैसे तैयार हो सकते हैं लोग
Sat, 24 Oct 2020 01:18 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, चंडीगढ़
अमर उजाला नेटवर्क, चंडीगढ़
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Sat, 24 Oct 2020 01:18 AM IST
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पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
बढ़ते ऑनर किलिंग के मामलों पर चिंता जताते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि कैसे मान सम्मान के नाम पर अंधे होकर लोग अपने बच्चों या उनके चुने साथी की ही हत्या के लिए तैयार हो जाते हैं। हाईकोर्ट ने साथ ही बाल विवाह कानून पर भी सवाल उठाया है और अब इस मामले को लेकर न्यायिक स्तर पर सुनवाई आरंभ होगी।
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मामला मोहाली के एक प्रेमी जोड़े की सुरक्षा से जुड़ा हुआ था जिसमें लड़की की आयु विवाह योग्य नहीं थी। याचिका को जोड़े ने वापस ले लिया, लेकिन हाईकोर्ट ने इस तरह आ रही याचिकाओं पर चिंता जताई। हाईकोर्ट ने कहा कि अकसर देखने में आता है कि मान-सम्मान के नाम पर अंधे होकर जन्म देने वाले ही अलग जाति या धर्म में विवाह करने वाले बच्चों की हत्या तक कर देते हैं।
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साथ ही हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि विवाह योग्य आयु पूरी न होने की स्थिति में लड़की को किसे सौंपना चाहिए। क्या उसे उसकी पसंद के लड़के के साथ जाने देना चाहिए या नारी निकेतन की तरह के संस्थान में भेज देना चाहिए या फिर उसके अभिभावकों के साथ भेजना चाहिए।
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हाईकोर्ट ने कहा कि प्रेमी जोड़ों की स्थिति में लड़की के अभिभावक लड़के के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के लिए शिकायत देते हैं और ऐसा करना उसे अपराधी बनाने की ओर लेकर जाता है और मस्तिष्क में गहरी चोट देता है। संविधान में विवाह करने को लेकर प्रावधान हैं, लेकिन यदि इन प्रावधानों के खिलाफ जाकर भी प्रेमी जोड़ा विवाह करता है तो मान-सम्मान के नाम पर उनकी हत्या की अनुमति नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट ने एक अन्य सवाल उठाते हुए कहा कि बाल विवाह अधिनियम के तहत यदि कम उम्र की लड़की से लड़का विवाह करता है तो उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज होता है, लेकिन जब विवाह की न्यूनतम उम्र पार कर चुकी युवती किसी नाबालिग से विवाह करती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई को लेकर अधिनियम मौन है।
हाईकोर्ट ने याचिका वापस लेने की छूट देते हुए इसका निपटारा कर दिया, लेकिन इसी बीच एडवोकेट लुविंदर सोफत ने कहा कि इस मामले में न्यायिक स्तर पर स्थिति को स्पष्ट करना जरूरी है, ऐसे में वह कोर्ट का सहयोग करना चाहते हैं। हाईकोर्ट ने उन्हें अर्जी दाखिल कर कोर्ट मित्र के तौर पर अदालत की सहायता करने की छूट दे दी।