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हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: प्राकृतिक अभिभावक अपहरण के लिए नहीं ठहराए जा सकते दोषी, मां के खिलाफ समन रद्द

Tue, 09 Jan 2024 03:41 PM IST
निवेदिता वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Tue, 09 Jan 2024 03:41 PM IST
सार

हाईकोर्ट ने कहा कि 5 साल तक के नाबालिग बच्चे की कस्टडी आमतौर पर मां के पास ही होती है। मां का अपने बच्चों के प्रति प्यार निस्वार्थ होता है और मां की गोद उसके बच्चों के लिए भगवान का पालना होती है और इसलिए, कम उम्र के बच्चों को उक्त प्यार और स्नेह से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

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High Court made it clear that parents cannot be held guilty for kidnapping child
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट - फोटो : File Photo

विस्तार

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने तीन साल की बेटी के अपहरण की आरोपी मां की याचिका को मंजूर करते हुए बहादुरगढ़ के मजिस्ट्रेट द्वारा जारी समन आदेश और शिकायत को रद्द कर दिया। 
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हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कर दिया कि माता-पिता को बच्चे के अपहरण के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि दोनों उसके समान स्वाभाविक अभिभावक हैं। 
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अपने आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि आईपीसी की धारा 361 के साथ-साथ हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट 1956 की धारा 6 को ध्यान में रखते हुए अपराध साबित करना जरूरी है। अपहरण को साबित करने के लिए यह आवश्यक है कि नाबालिग बच्चे को उसके वैध अभिभावक से छीन लिया जाए। मां स्वयं एक वैध अभिभावक के दायरे में आती है और ऐसे में मां को बच्ची के अपहरण का दोषी नहीं माना जा सकता।
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हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही माता-पिता के रिश्ते में खटास आ गई हो, लेकिन फिर भी माता-पिता और बच्चे के बीच का रिश्ता बना रहता है। याचिका में झज्जर निवासी मां ने हाईकोर्ट को बताया कि उसके और उसके पति के बीच वैवाहिक कलह हो गई थी। याचिकाकर्ता ने अपनी नाबालिग बेटी की कस्टडी के लिए झज्जर की फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की, लेकिन बच्चे की कस्टडी उसके पति को दे दी गई। बाद में उच्च न्यायालय के समक्ष एक अपील दायर की गई, जिसमें डिवीजन बेंच ने 2022 में पारित आदेश के माध्यम से याचिकाकर्ता-मां को नाबालिग बच्चे की कस्टडी दे दी।

याची ने बताया कि उस पर आरोप था कि कुछ लोगों के जरिए वह अपनी बेटी को ससुर के घर से ले गई। याचिकाकर्ता के ससुर ने याचिकाकर्ता, उसके पिता, मां, बहन और भाई के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी, जिन्होंने उनके क्लिनिक में आए अज्ञात पुरुष और महिला के साथ मिलकर उनकी तीन साल की पोती के अपहरण की साजिश रची थी। 


हाईकोर्ट ने कहा कि 5 साल तक के नाबालिग बच्चे की कस्टडी आमतौर पर मां के पास ही होती है। मां का अपने बच्चों के प्रति प्यार निस्वार्थ होता है और मां की गोद उसके बच्चों के लिए भगवान का पालना होती है और इसलिए, कम उम्र के बच्चों को उक्त प्यार और स्नेह से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। इन टिप्पणियों के साथ ही हाईकोर्ट ने बल्लभगढ़ कोर्ट की ओर से जारी समन आदेश और शिकायत को रद्द कर दिया। न्यायालय ने सम्मन आदेश एवं परिवाद प्रकरण को निरस्त कर दिया।
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