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हाईकोर्ट का अहम आदेश: एमफिल के आधार पर सेवा में बने रहने का दावा नहीं कर सकते एक्सटेंशन लेक्चरर
Sat, 08 Mar 2025 02:02 PM IST
निवेदिता वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Sat, 08 Mar 2025 02:02 PM IST
सार
गौरव ने जून 2009 में विनायक मिशन रिसर्च फाउंडेशन डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी से एमफिल (अंग्रेजी) की डिग्री प्राप्त की थी और 2013 में एक्सटेंशन लेक्चरर के रूप में नियुक्त किया गया था। 20 जुलाई 2017 को उसे पद से हटा दिया गया था, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
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पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि एमफिल डिग्री धारक एक्सटेंशन लेक्चरर्स, जिन्होंने यूजीसी नेट की परीक्षा पास नहीं की है, वे सेवा जारी रखने के लिए पात्र नहीं हैं और उन्हें सेवा मुक्त किया जाना अनिवार्य है।
याचिका गौरव सोरौत नामक एक्सटेंशन लेक्चरर ने दायर की थी। उसने अंग्रेजी विषय में एक्सटेंशन लेक्चरर पद के लिए अयोग्य घोषित करने को चुनौती दी थी। याची पलवल के होडल स्थित राजकीय कालेज में कार्यरत था। प्राचार्य ने सरकारी नीति के तहत उन्हें सेवा से हटाने का निर्देश दिया था।
गौरव ने जून 2009 में विनायक मिशन रिसर्च फाउंडेशन डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी से एमफिल (अंग्रेजी) की डिग्री प्राप्त की थी और 2013 में एक्सटेंशन लेक्चरर के रूप में नियुक्त किया गया था। 20 जुलाई 2017 को उसे पद से हटा दिया गया था, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इस याचिका के अंतरिम आदेश में कोर्ट ने निर्देश दिया कि जब तक अगली सुनवाई न हो, उनकी जगह किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त नहीं किया जाएगा और यदि कार्यभार पर्याप्त हो तो बिना साक्षात्कार के उसे जारी रखने की अनुमति दी जाएगी।
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इसके बाद हरियाणा सरकार ने एक्सटेंशन लेक्चरर की नियुक्ति से संबंधित नीति दिशानिर्देश जारी किए, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि केवल नेट पास व्यक्ति ही सेवा में रहेंगे, गैर-योग्य व्यक्तियों को हटा दिया जाएगा। गौरव सोरौत ने यूजीसी की 27 सितंबर 2010 की बैठक के फैसले का हवाला देते हुए खुद को पात्र बताया, जिसमें यह कहा गया था कि 11 जुलाई 2009 से पहले एमफिल प्राप्त करने वालों को यूजीसी नेट से छूट दी गई थी। लेकिन कोर्ट ने पाया कि 1986 के सेवा नियमों के तहत सरकारी कालेजों में सहायक प्रोफेसर पद के लिए यूजीसी नेट उत्तीर्ण करना एक न्यूनतम पात्रता शर्त है। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि यूजीसी की 27 सितंबर 2010 की बैठक का निर्णय न तो कभी अधिसूचित किया गया था, न ही राज्य सरकार द्वारा इसे अपनाया गया। इन तथ्यों और कानूनी तर्कों के आधार पर, हाईकोर्ट ने गौरव सोरौत की याचिका को खारिज कर दिया।
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याचिका गौरव सोरौत नामक एक्सटेंशन लेक्चरर ने दायर की थी। उसने अंग्रेजी विषय में एक्सटेंशन लेक्चरर पद के लिए अयोग्य घोषित करने को चुनौती दी थी। याची पलवल के होडल स्थित राजकीय कालेज में कार्यरत था। प्राचार्य ने सरकारी नीति के तहत उन्हें सेवा से हटाने का निर्देश दिया था।
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गौरव ने जून 2009 में विनायक मिशन रिसर्च फाउंडेशन डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी से एमफिल (अंग्रेजी) की डिग्री प्राप्त की थी और 2013 में एक्सटेंशन लेक्चरर के रूप में नियुक्त किया गया था। 20 जुलाई 2017 को उसे पद से हटा दिया गया था, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इस याचिका के अंतरिम आदेश में कोर्ट ने निर्देश दिया कि जब तक अगली सुनवाई न हो, उनकी जगह किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त नहीं किया जाएगा और यदि कार्यभार पर्याप्त हो तो बिना साक्षात्कार के उसे जारी रखने की अनुमति दी जाएगी।
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इसके बाद हरियाणा सरकार ने एक्सटेंशन लेक्चरर की नियुक्ति से संबंधित नीति दिशानिर्देश जारी किए, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि केवल नेट पास व्यक्ति ही सेवा में रहेंगे, गैर-योग्य व्यक्तियों को हटा दिया जाएगा। गौरव सोरौत ने यूजीसी की 27 सितंबर 2010 की बैठक के फैसले का हवाला देते हुए खुद को पात्र बताया, जिसमें यह कहा गया था कि 11 जुलाई 2009 से पहले एमफिल प्राप्त करने वालों को यूजीसी नेट से छूट दी गई थी। लेकिन कोर्ट ने पाया कि 1986 के सेवा नियमों के तहत सरकारी कालेजों में सहायक प्रोफेसर पद के लिए यूजीसी नेट उत्तीर्ण करना एक न्यूनतम पात्रता शर्त है। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि यूजीसी की 27 सितंबर 2010 की बैठक का निर्णय न तो कभी अधिसूचित किया गया था, न ही राज्य सरकार द्वारा इसे अपनाया गया। इन तथ्यों और कानूनी तर्कों के आधार पर, हाईकोर्ट ने गौरव सोरौत की याचिका को खारिज कर दिया।