क्या आप अपने लीवर के इस खतरनाक दुश्मन को जानते हैं?
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आपके लीवर का एक दुश्मन है, जो बेहद खतरनाक और जानलेवा है। यह एक साइलेंट किलर। हम बात कर रहे हैं हैपेटाइटिस की। इसके बारे में लोगों में जागरूकता कम है। लोगों को न तो बीमारी के बारे में पता है और न ही उसके लक्षणों के बारे में।
यही कारण है कि हैपेटाइटिस लगातार बड़ी समस्या के रूप में सामने आ रहा है। पीजीआई में हर महीने हैपेटाइटिस सी के 70 और हैपेटाइटिस बी के 50 नए केस आ रहे हैं। इनमें अधिकतर केस पंजाब से हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि सतर्कता बरती जाए तो हैपेटाइटिस से बचा जा सकता है। हैपेटाइटिस होने पर उसे ठीक भी किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए बीमारी का समय पर पता चलना जरूरी है। हैपेटाइटिस डे पर जानते हैं कि इसके क्या-क्या रूप हैं और कैसे इससे बचा जा सकता है।
क्या है हैपेटाइटिस
हैपेटाइटिस का मतलब है लिवर (जिगर) की सूजन और यह वायरस से होता है। हैपेटाइटिस के मुख्य रूप से चार वायरस होते हैं। ए, बी, सी और ई। डी वायरस बहुत ही कम मामलों में देखने को मिलता है।
क्या है हैपेटाइटिस ए और बी
ए और ई वायरस को एक्यूट हैपेटाइटिस भी कहते हैं। यह मुख्य रूप से दूषित खाना और पानी से होता है। ए मुख्य रूप से बच्चों में होता है, जबकि ई वयस्कों में। वायरस का इन्फेक्शन होने के 15 से 45 दिन में लक्षण सामने आते हैं। इसके लक्षण मुख्य रूप से उल्टी, बुखार और पीलिया। ये लक्षण करीब चार हफ्ते तक चलते हैं। इसके बाद मरीज की हालत में सुधार होने लगता है।
हैपेटाइटिस बी और सी
इन्हें क्रोनिक हैपेटाइटिस भी कहते हैं। इन्फेक्शन के छह महीनों में इसके कोई लक्षण सामने नहीं आते। 20 फीसदी लोगों के शरीर से वायरस खुद बाहर निकल जाता है, लेकिन 80 फीसदी मामलों में वायरस लिवर के अंदर मौजूद रह जाता है। इनमें से 20 फीसदी में एक दशक के अंदर लिवर सिरोसिस (लिवर का सिकुड़ जाना) हो जाता है और तब जाकर बीमारी का पता चलता है, जबकि 25 परसेंट में समस्या की शुरुआत ज्वांडिश से होती है।
क्या है हैपेटाइटिस सी
हैपेटाइटिस सी के लक्षण डेढ़ से दो महीने में नजर आते हैं, लेकिन जब तक आते हैं, तब तक लीवर को काफी नुकसान पहुंच चुका होता है। इसे साइलेंट किलर भी कहते हैं। यह अल्कोहल, स्टेरॉयड, संक्रमणित सूई व खून, सेक्सुअल ट्रांसमिशन के अलावा बच्चे को मां से हो सकता है। येलो फीवर, विल्संस डिसीज और डेंगू भी कई बार हेपेटाइटिस की वजह बनता है। डाक्टरों के मुताबिक समय-समय पर लीवर के टेस्ट कराते रहने चाहिए।
इसलिए होता है वायरस
हैपेटाइटिस बी व सी की मुख्य वजह अल्कोहल, स्टेरॉयड, प्रदूषित सुई, प्रदूषित खून, सेक्सुअल ट्रांसमिशन के अलावा बच्चे को मां से हो सकता है। यलो फीवर, विल्संस डिसीज और डेंगू भी कई बार हैपेटाइटिस की वजह बनता है। हाल ही में नई वजह देखने को मिली है। कई बार लोग संकमति सुई से टैटू बनाते हैं। उससे हैपेटाइटिस होने की वजहें सामने आईं हैं।
लिवर भी हो सकता है फेल
पीजीआई के एडिशनल प्रोफेसर अजय डुसेजा ने बताया कि हैपेटाइटिस ई के कुछ मामलों में लिवर भी फेल हो सकता है। इलाज के दौरान मरीज में ब्लीडिंग शुरू हो जाती है। मरीज कोमा में चला जाता है। कई बार तो लिवर में पानी भी जाता है। उसके बाद लिवर फेल हो जाता है। इसलिए पीजीआई में आने वाले मरीजों को हर हफ्ते बुलाया जाता है, ताकि उनके ब्लड रिपोर्ट पर नजर रखी जा सके।
नहीं सामने आते लक्षण
विशेषज्ञों के मुताबिक इनके लक्षण सामने नहीं आते हैं, जब तक आते हैं तब तक लीवर काफी हद तक डैमेज हो जाता है। लक्षणों में मुख्य रूप से भूख न लगना, वजन कम होना, पीलिया, बुखार, कमजोरी, उल्टी, पेट में पानी भर जाना, खून की उलटियां होना, रंग काला होने लगना, पेशाब का रंग गहरा होना आदि। शुरुआती लक्षणों में मुख्य रूप से थकावट लगना। काम में मन न लगना जैसे होते हैं। इसलिए लोगों को पता नहीं चल पाता।
ऐसे लगता है बीमारी का पता
1.ब्लड डोनेशन के दौरान
2.लगातार लिवर की जांच के दौरान
3.विदेश यात्रा के दौरान कुछ एंबेसी करवाते हैं ब्लड जांच
4.प्रेंग्नेसी के दौरान होने वाले टेस्ट के दौरान
5.डायलिसिस के दौरान
6.किसी तरह के आपरेशन के दौरान
7.ब्लड कैंसर की कीमोथैरेपी के दौरान
इसलिए खतरनाक है बी और सी
हैपेटाइटिस बी और सी में लिवर फाइब्रोसिस (लिवर का सख्त होना) और लिवर सिरोसिस (लिवर का सिकुड़ जाना) होने की आशंका बहुत ज्यादा होती है। फाइब्रोसिस बहुत बढ़ जाए तो सिरोसिस हो जाता है। ऐसा होने पर लिवर अपना काम सही से नहीं कर पाता। सिरोसिस के बहुत-से मामले इलाज न होने पर कैंसर में बदल जाते हैं, बल्कि कैंसर के करीब 90 फीसदी मरीज सिरोसिस वाले ही होते हैं। बी के करीब 20 फीसदी और सी के करीब 4 फीसदी मरीजों में कैंसर की आशंका होती है।
इन टेस्ट से पता चलता है संक्रमण का
लिवर फंक्शन टेस्ट (एलएफटी), बी वायरस के लिए एचबीएसएजी व सी के लिए एंटी एचसीवी।
यह बरतें सतर्कता
1. घर पर बना रुटीन खाना खाते रहें।
2. कम खाना, चिकनाई वाला खाना न खाना जैसी बातें मिथ्य हैं
3. झाड़ फूंक कराने के बजाए डाक्टर को दिखाएं।
4.आराम करिए व दवा की डोज लेते रहें।
ऐसे बचें हेपटाइटिस से
-हैपेटाइटिस ए और ई से बचाव के लिए जरूरी है कि साफ खाना खाएं और पानी पीएं।
-ऐसे हॉस्पिटल या ब्लड बैंक से ही खून लें, जहां ढंग से चेक करने के बाद ही खून लिया जाता हो।
-टैटू से बचें। इन्फेक्टेड सुई हैपेटाइटिस की वजह बन सकती है।
-दांत का इलाज अच्छे हॉस्पिटल से कराएं, जहां इक्विपमेंट्स की साफ-सफाई का ध्यान रखा जाए।
-अल्कोहल से बचें। हैपेटाइटिस होने के बाद तो बिल्कुल न पीएं।
हैपेटाइटिस बी के लगा सकते हैं वैक्सीन
हाल ही में पेंटावैलेंट वैक्सीन में हैपेटाइटिस बी को कवर किया गया है। जो अब बच्चे जन्म ले रहे हैं, उन्हें तो वैक्सीन लगाई जा रही है, लेकिन जिन लोगों में हैपेटाइटिस बी की वैक्सीन नहीं लगी है तो वे लगवा सकते हैं। इसके तीन टीके लगते हैं। एक्सपर्ट्स इन्हें 95 फीसदी कामयाब मानते हैं। इसमें तीन डोज लेनी होती हैं। पहला इंजेक्शन लगने के बाद दूसरा अगले महीने और तीसरा छठे महीने लगना जरूरी है। एक हफ्ते से ज्यादा की देरी होने पर पहली खुराक का असर खत्म हो जाता है और तब तीनों टीकों फिर से लगवाने होते हैं। तीन टीकों का कोर्स होता है। हैपेटाइटिस सी और ई के टीके नहीं हैं।
ये भी ध्यान दें
1. पीलिया होने पर आमतौर पर लोग गन्ने का रस पीने और मूली खाने की सलाह देते हैं। कुछ लोग हल्दी खाने तो कुछ छोड़ने की सलाह देते हैं। ये सारे मिथ्य हैं।
2. पीलिया या जॉन्डिस खुद में कोई बीमारी नहीं है। यह लिवर की बीमारी का लक्षण है। किसी भी तरह के हैपेटाइटिस में पीलिया हो सकता है। इसी तरह लिवर का बढ़ना भी हैपेटाइटिस या लिवर की दूसरी बीमारियों का लक्षण हो सकता है।
3. टीबी के दवाएं विशेषज्ञों को दिखाकर ही खाएं। कई बार टीबी की दवाओं के खाने से भी लीवर पर भी असर पड़ सकता है।
4. शराब पीना बिल्कुल बंद कर दें। इलाज के बाद अगर डॉक्टर इजाजत दे तो ही शराब पीएं और लिमिट में।
5.न्यूट्रिशन से भरपूर खाना खाएं, खासकर प्रोटीन से भरपूर। धीरज रखें, शरीर में ताकत लौटने में वक्त लग सकता है।
पीजीआई में हर महीने हैपेटाइटिस सी व बी के मरीज बढ़ते जा रहे हैं। पिछले दस सालों में हैपेटाइटिस के केसों में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। खासकर पंजाब में। पंजाब के कई जिलों की ऐसी स्थिति है कि वहां पर बीमारी का रेशो नेशनल रेशो से काफी ज्यादा है। हैपेटाइटिस से बचने के लिए लोगों को समय-समय पर टेस्ट कराते रहने चाहिए।
- अजय डुसेजा, एडिशनल प्रोफेसर हीप्टोलाजी पीजीआई
पहले एक हफ्ते में 50 हजार था खर्च, अब मात्र 12 हजार
अब तक आम आदमी की पहुंच से दूर हैपेटाइटिस सी का इलाज काफी आसान हो गया है। पहले छह महीने के इलाज में दस से 12 लाख रुपये का खर्च आता था, लेकिन अब इसका इलाज मात्र एक लाख रुपये के भीतर संभव हो गया है।
पीजीआई सहित देश के 25 सेंटर में सोफोसुबुविर नामक ड्रग्स का सफल ट्रायल पूरा हो गया है। रिजल्ट काफी अच्छे आए हैं। 90 प्रतिशत तक मरीजों की रिकवरी हुई है। अच्छी बात यह है कि इसका एक महीने का कोर्स सिर्फ 12 हजार रुपये है, जबकि पहले जो इंजेक्शन लगाए जाते थे, उनका एक महीने का कोर्स 50 हजार रुपये होता था। इलाज की समय सीमा छह महीने होती है।
पीजीआई के हीप्टोलाजी डिपार्टमेंट के एडिशनल प्रोफेसर अजय डुसेजा ने बताया कि पिछले साल अक्तूबर में पीजीआई सहित देश के 15 हास्पिटल सोफोसुबुविर दवा का ट्रायल चला था। पीजीआई में कुल 15 हैपेटाइटिस सी से पीड़ित मरीजों पर ट्रायल किया गया। इसी साल मार्च में ट्रायल पूरा हो गया।
सभी मरीज पूरी तरह से ठीक हैं, इनमें हैपेटाइटिस सी का इंफेक्शन भी खत्म हो चुका है। यह ओरल मेडिसिन है। पहले इंजेक्शन के साथ मेडिसिन दी जाती थी। पीजीआई में आने वाले हैपेटाइटिस सी के मरीजों को यही ड्रग्स उपलब्ध कराई जाती है।
सीडीएससीओ भी दे चुका है परमिशन
राज्यसभा में एक पूछे गए सवाल पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने बताया था कि सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल आर्गेनाइजेशन (सीडीएससीओ) ने जनवरी में ही गिल्ड साइंस लिमिटेड को मेडिसिन बनाने और उसकी मार्केटिंग की परमिशन दे दी थी। मार्च 2015 में इंडियन मैन्युफैक्चर्ड कंपनी को भी सोफोसुबुविर की 400 एमजी टैबलेट को बनाने और उसकी मार्केटिंग की स्वीकृति दी जा चुकी है।
पहले महंगा था और साइड इफेक्ट भी काफी थे
एडिशनल प्रोफेसर अजय डुसेजा ने बताया कि हैपेटाइटिस सी के मरीजों को इंटरफिरोन नामक इंजेक्शन दिया जाता था। साथ में एक अन्य मेडिसिन भी दी जाती थी। जब यह इंजेक्शन मार्केट में आया था तो एक डोज की कीमत 50 हजार रुपये थी। हालांकि धीरे-धीरे वह सस्ता हुआ, लेकिन फिर भी इलाज आम आदमी के बस की बात नहीं थी। इंजेक्शन के कुछ साइडइफेक्ट भी थे। इनमें बुखार, बाल झड़ना जैसे साइड इफेक्ट देखने को मिले थे।