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खांसी है या शरीर टूट रहा है तो हल्के में न लें, कहीं...
ब्यूरो/अमर उजाला,चंडीगढ़
Updated Mon, 24 Mar 2014 10:17 AM IST
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आज वर्ल्ड टीबी डे है। कभी लाइलाज रही टीबी का आज कामयाब इलाज संभव है। भारत में रोज चार हजार लोग टीबी की चपेट में आते हैं, जबकि एक हजार लोग दूसरी परलोक सिधार जाते हैं। चंडीगढ़ का भी आंकड़ा कुछ ठीक नहीं है। विशेषज्ञों के मुताबिक हर महीने 250-275 टीबी के मामले सामने आ रहे हैं।
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चंडीगढ़ में डायबिटीज के मरीज काफी हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि डायबिटीज के मरीजों को भी टीबी की संभावना ज्यादा रहती है। वर्ल्ड टीबी डे के अवसर पर अमर उजाला पाठकों के लिए टीबी पर विशेष रिपोर्ट प्रस्तुत कर रहा है।
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क्या है टीबी
टीबी (ट्यूबरक्लोसिस) एक संक्रामक रोग है। यह एक से दूसरे व्यक्ति में फैलता है। वातावरण में फैले माइक्रोबैक्टीरिया व्यक्ति के खांसते वक्त शरीर में प्रवेश करता है। जिन लोगों का इम्यून सिस्टम कमजोर होता है, उनमें यह बैक्टीरिया असरदार हो जाता है। ये ज्यादातर फेफड़ों में ही पाया जाता है। इसके अलावा आंतें, मस्तिष्क, हड्डियों, जोड़, गुर्दे, त्वचा, हृदय भी टीबी से ग्रसित हो सकते हैं। टीबी ग्रसित रोगियों के कफ, छींकने, खांसने, थूकने से टीबी का बैक्टीरिया बड़ी ही आसानी से एक मनुष्य से दूसरे को संक्रमित कर देता है।
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क्या हैं लक्षण
1.शरीर में थकान महसूस होना
2.शाम के वक्त बुखार आना
3.दो सप्ताह से ज्यादा खांसी
4. छाती में दर्द होना
5. वजन का लगातार घटना
6. भूख में कमी आना
7. बलगम के साथ खून आना
8. सांस लेने में दिक्कत आना
9. शरीर के अलग-अलग हिस्सों में गिल्टियां होना
ऐसे बचें टीबी से
1. जन्म होते ही एक माह के अंदर टीबी का टीका लगवाएं।
2. भीड़भाड़ वाली जगह पर मुंह पर रुमाल रखकर खांसे।
3. टीबी के रोगी जगह-जगह न थूंके
4. अल्कोहल और धूम्रपान से बचें।
5. जब टीबी हो तो उसका पूरा इलाज करवाएं।
चंडीगढ़ में हर साल तीन हजार मरीज
स्टेट टीबी अधिकारी डॉ. अनिल गर्ग ने बताया कि चंडीगढ़ में हर साल जांच के दौरान तीन हजार मरीज सामने आ रहे हैं। इनमें से एक हजार मरीज वे हैं, जो माइग्रेंट है, जबकि दो हजार मरीज चंडीगढ़ के रहने वाले हैं।
डॉ. गर्ग ने कहा कि आजकल डायग्नोसिस की नई टेक्नोलॉजी है, इस कारण मरीज जल्दी डिटेक्ट हो रहे हैं। इसलिए कह सकते हैं कि मरीजों की संख्या ज्यादा सामने आ रही है।
क्या है इलाज
डॉ. गर्ग के मुताबिक टीबी का बहुत ही आसान इलाज उपलब्ध है। उनके मुताबिक टीबी का पता लगते ही उसका इलाज शुरू कर देना चाहिए। छह महीने तक इसका रेगुलर इलाज होता है।
इस बीमारी में सबसे बड़ा रिस्क यही है कि यदि मरीज ने बीच में ही इलाज छोड़ दिया तो यह बीमारी गंभीर बन जाती है। फिर उसका इलाज काफी मुश्किल होता है। बीच में इलाज छोड़ने की बीमारी को मल्टी ड्रग्स रेसिसटेंट (एमडीआर) कहते हैं। इसमें व्यक्ति की मौत की ज्यादा संभावना रहती है।
क्या है मल्टी ड्रग्स रेसिस्टेंट
जब टीबी का मरीज बीच में दवा लेना छोड़ देता है तो उन्हें मल्टी ड्रग्स रेसिस्टेंट (एमडीआर) कहते हैं। इसके बाद टीबी की दवा शरीर पर असर नहीं करती। हालांकि इसका इलाज उपलब्ध है, लेकिन यह काफी कठिन होता है।
इसमें पूरे दो साल इलाज चलता है। दो साल के ट्रीटमेंट में करीब दो लाख रुपये का खर्चा आता है। दवा का काफी साइड इफेक्ट होता है। इसका असर किडनी, लीवर व ब्रेन पर भी पड़ता है।
चंडीगढ़ में इलाज व जांच की बेहतर सुविधा
चंडीगढ़ में टीबी के मरीजों के लिए कई सुविधाएं उपलब्ध हैं। अधिकारियों के मुताबिक पूरे शहर में 17 जगह डायग्नोसिस माइक्रोस्कोपिक सेंटर बनाए गए हैं। इन सेंटरों में बलगम की जांच होती है।
चंडीगढ़ के मरीजों को मुफ्त दवा दी जाती है। इन्हें डाट्स प्रणाली के तहत पूरे शहर में 270 जगह दवा उपलब्ध कराई जाती है। चंडीगढ़ में एमडीआर का इलाज भी मुफ्त में किया जाता है। इसका सेंटर जीएमसीएच 32 में बनाया गया है। इसमें दवा से लेकर इलाज का पूरा खर्चा मुफ्त में वहन किया जाता है।
इलाज में बनते हैं ये बाधक
विशेषज्ञों के मुताबिक टीबी के इलाज में एक महीने बाद मरीज को लगने लगता है कि वह ठीक हो रहा है। उसके बाद वह दवा लेना बंद कर देता है। इससे वह टीबी के गंभीर संक्रमण के संपर्क में आ जाता है। कई लोग प्राइवेट क्लीनिक में इलाज कराते हैं। प्राइवेट क्लीनिक में टीबी के मरीजों का रिकार्ड नहीं रखा जाता।
कुछ दिन इलाज कराने के बाद जब मरीज नहीं आता है तो उसकी जांच नहीं होती, जबकि सरकारी क्लीनिक में इस बात का खास ध्यान रखा जाता है। यदि कोई मरीज दूसरे प्रदेश भी चला जाता है तो उसे पोस्टकार्ड व किसी अन्य माध्यम से संपर्क करने की कोशिश की जाती है।
डायबिटीज, कैंसर व एचआईवी में ज्यादा आशंका
विशेषज्ञों के मुताबिक जिन लोगों में डायबिटीज, कैंसर व एचआईवी होता हैं, उनमें टीबी की संभावना सबसे अधिक होती है। इन बीमारियों से मरीजों का इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है।
सबसे ज्यादा एचआईवी मरीजों की मौत टीबी के कारण होती है। डॉ. अनिल ने बताया कि जितने भी टीबी के मरीज आते हैं, उनकी एचआईवी की भी जांच होती है। सौ में से दो से तीन मरीजों में एचआईवी के केस सामने आते हैं। इसके अलावा दस प्रतिशत डायबिटीज के मरीजों में टीबी पॉजिटिव पाया गया।
क्या होना चाहिए आहार
टीबी के मरीजों को संतुलित आहार के साथ-साथ हाई प्रोटीन डाइट देना आवश्यक हो जाता है। इसके लिए उन्हें दूध, पनीर, अंडे, चिकन और मछली खाने की सलाह दी जाती है। यदि सामान्य व्यक्ति को एक ग्राम प्रोटीन डाइट लेने की सलाह दी जाती है तो टीबी के मरीजों को अपनी डाइट में 1.5 ग्राम प्रोटीन लेने की।
टीबी से बचने का एक ही रास्ता है कि जब भी खांसे तो मुंह पर हाथ या रुमाल रखें। पौष्टिक आहार खाएं, जिससे आपका इम्यून सिस्टम मजबूत होगा। इम्यून सिस्टम के मजबूत होने से बैक्टरिया बेअसर हो जाते हैं।
-डॉ. अनिल गर्ग, स्टेट टीबी अधिकारी, चंडीगढ़
टीबी का इलाज बीच में छोड़ना सबसे ज्यादा घातक होता है। इलाज छूटने से टीबी गंभीर बन जाती है। इससे एमडीआर होता है। एमडीआर का इलाज काफी कठिन और खर्चीला है।
-एके जनमेजा, एचओडी पल्मोनरी मेडिसिन, जीएमसीएच-32
टीबी के मरीज यदि स्मोकर हैं तो उन्हें सबसे ज्यादा खतरा है। लगातार स्मोकिंग से उनकी जान भी जा सकती है और भी कई दिक्कतें पैदा हो जाती हैं।
-एसके जिंदल, एचओडी पल्मोनरी मेडिसिन, पीजीआई
टीवी कंट्रोल में सबसे ज्यादा दिक्कत उन मरीजों में आ रही है जो प्राइवेट क्लीनिक में जाते हैं। अक्सर पाया गया है कि निजी क्लीनिक में दिखाने के बाद मरीज दवा के प्रति कुछ समय बाद ही लापरवाह हो जाते हैं। इस दिशा में भी सरकार पालिसी बना रही है, ताकि उनके क्लीनिक में भी दवा मिल सके।
-डी बीहेरा, प्रोफेसर पीजीआई व चेयरमैन नेशनल टास्क फोर्स
लगातार दो हफ्ते की खांसी के बाद अब बलगम की जांच जरूर करवाएं। टीबी अब लाइलाज नहीं है। जिंदल क्लीनिक में इस गंभीर बीमारी का आधुनिक इलाज उपलब्ध है।
डॉ. आदित्य जिंदल, जिंदल क्लीनिक सेक्टर -20