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कोरोना कमांडोः गरीबी को नजदीक से देखा, इसलिए लॉकडाउन में किसी को भूखा सोने नहीं दिया
Wed, 24 Jun 2020 12:24 PM IST
पंचकुला ब्यूरो
अमर उजाला, चंडीगढ़
अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: पंचकुला ब्यूरो
Updated Wed, 24 Jun 2020 12:24 PM IST
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पत्नी के साथ संजय चौबे
- फोटो : फाइल फोटो
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कोरोना वायरस के कारण जब लॉकडाउन हुआ और कर्फ्यू लगा। फैक्ट्रियां बंद हो गईं तब संजय चौबे का परिवार भूखे और जरूरतमंद लोगों के लिए डटकर खड़ा रहा। यह परिवार लॉकडाउन के दौरान गरीब और जरूरतमंदों को खाना उपलब्ध कराता रहा। परिवार के लोग मिलकर खाना बनाते और उसे पैक करते, जिसे संजय चौबे स्वयं ही बांटने के लिए निकल पड़ते थे।
सेक्टर-45 निवासी समाजसेवी संजय चौबे और उनकी पत्नी सरोज चौबे ने पूरे 61 दिन जरूरतमंदों को शहर के विभिन्न भागों में जाकर खाना खिलाया। इतना ही नहीं, लॉकडाउन के दौरान खून की कमी को देखते हुए रक्तदान शिविर का भी आयोजन किया। इस रक्तदान शिविर में सरोज चौबे ने भी रक्दतान किया। इस काम में उन्होंने अपनी तरफ से 2.35 लाख रुपये खर्च किए। साथ ही उनके दोस्तों ने भी सामान देकर इस नेक काम में सहयोग किया।
संजय चौबे का कहना है कि 1992 में जब वह काम की तलाश में चंडीगढ़ शहर आए थे तब उन्होंने गरीबी को बहुत नजदीक से देखा था। एक टाइम खाना खाकर गुजारा किया। कई बार भूखे सोना पड़ा। इस शहर में जो कुछ भी मैं कर पाया पता नहीं उसमे कितने लोगों का आशीर्वाद, कितनों की दुआएं शामिल हैं।
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सबसे पहले पीजी में रहने वाले बच्चे का फोन आया
संजय चौबे ने बताया कि जिस दिन लॉकडाउन शुरू हुआ उसी दिन मैंने फेसबुक पर एक मैसेज डाला कि चंडीगढ़ में कोई भी परिवार किसी कारण से भूखा न सोए बल्कि मुझे फोन करें। उनकी हर संभव मदद करेंगे। उस मैसेज को करीब 200 लोगों ने आगे से आगे शेयर कर दिया। उन्होंने बताया कि उन्हें सबसे पहले पीजी में रहने वाले बच्चे और बच्चियों के फोन आने लगे। उसी दिन से वह रोज करीब 30 बच्चों को सुबह शाम खाना बनाकर टिफिन में देने लगे।
साथ ही साथ खाना बनाकर अपनी गाड़ी में रख कर अपने जरूरतमंद भाइयों के बीच जाकर उनको खिलाना शुरू किया। नवरात्र भी चल रहे थे। उनकी धर्मपत्नी और बेटी ने बहुत सहयोग किया। सुबह उठ कर खाना बनाना शुरू करना और एक बजे तक खाना तैयार कर गाड़ी में डिस्पोजेबल थाली रखना और उनको खिला कर आना। यह उनका रोज का नियम बन गया था। वह रोज करीब तीन सौ लोगों का खाना बनाकर शहर के अलग अलग हिस्सों में जाकर खाना खिलाते।
उन्होंने शहर के हर हिस्से जैसे दड़वा गैस कॉलोनी, कालोनी नंबर चार, ट्रांसपोर्ट एरिया, शिवपुर कच्ची कॉलोनी, डडूमाजरा, बैकुंठ धाम, लेबर चौक 44, इंडस्ट्रियल एरिया फेज 1 की स्लम कॉलोनी, मक्खन माजरा इत्यादि हर जगह पहुंच कर जरूरतमंदों को खाना खिलाया।
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सेक्टर-45 निवासी समाजसेवी संजय चौबे और उनकी पत्नी सरोज चौबे ने पूरे 61 दिन जरूरतमंदों को शहर के विभिन्न भागों में जाकर खाना खिलाया। इतना ही नहीं, लॉकडाउन के दौरान खून की कमी को देखते हुए रक्तदान शिविर का भी आयोजन किया। इस रक्तदान शिविर में सरोज चौबे ने भी रक्दतान किया। इस काम में उन्होंने अपनी तरफ से 2.35 लाख रुपये खर्च किए। साथ ही उनके दोस्तों ने भी सामान देकर इस नेक काम में सहयोग किया।
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संजय चौबे का कहना है कि 1992 में जब वह काम की तलाश में चंडीगढ़ शहर आए थे तब उन्होंने गरीबी को बहुत नजदीक से देखा था। एक टाइम खाना खाकर गुजारा किया। कई बार भूखे सोना पड़ा। इस शहर में जो कुछ भी मैं कर पाया पता नहीं उसमे कितने लोगों का आशीर्वाद, कितनों की दुआएं शामिल हैं।
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सबसे पहले पीजी में रहने वाले बच्चे का फोन आया
संजय चौबे ने बताया कि जिस दिन लॉकडाउन शुरू हुआ उसी दिन मैंने फेसबुक पर एक मैसेज डाला कि चंडीगढ़ में कोई भी परिवार किसी कारण से भूखा न सोए बल्कि मुझे फोन करें। उनकी हर संभव मदद करेंगे। उस मैसेज को करीब 200 लोगों ने आगे से आगे शेयर कर दिया। उन्होंने बताया कि उन्हें सबसे पहले पीजी में रहने वाले बच्चे और बच्चियों के फोन आने लगे। उसी दिन से वह रोज करीब 30 बच्चों को सुबह शाम खाना बनाकर टिफिन में देने लगे।
साथ ही साथ खाना बनाकर अपनी गाड़ी में रख कर अपने जरूरतमंद भाइयों के बीच जाकर उनको खिलाना शुरू किया। नवरात्र भी चल रहे थे। उनकी धर्मपत्नी और बेटी ने बहुत सहयोग किया। सुबह उठ कर खाना बनाना शुरू करना और एक बजे तक खाना तैयार कर गाड़ी में डिस्पोजेबल थाली रखना और उनको खिला कर आना। यह उनका रोज का नियम बन गया था। वह रोज करीब तीन सौ लोगों का खाना बनाकर शहर के अलग अलग हिस्सों में जाकर खाना खिलाते।
उन्होंने शहर के हर हिस्से जैसे दड़वा गैस कॉलोनी, कालोनी नंबर चार, ट्रांसपोर्ट एरिया, शिवपुर कच्ची कॉलोनी, डडूमाजरा, बैकुंठ धाम, लेबर चौक 44, इंडस्ट्रियल एरिया फेज 1 की स्लम कॉलोनी, मक्खन माजरा इत्यादि हर जगह पहुंच कर जरूरतमंदों को खाना खिलाया।