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Haryana: अब जनता से जुड़े मामलों में भ्रष्टाचार का संदेह होने पर स्वत: संज्ञान लेंगे लोकायुक्त

यशपाल शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Sun, 24 Jul 2022 06:54 AM IST
सार

पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल ने वर्ष 1999 में हरियाणा लोकपाल कानून बनाकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के कार्यरत जज आईपी वशिष्ठ को पहला लोकपाल बनाया था। उस समय लोकपाल को स्वत: संज्ञान लेकर किसी भी मंत्री व अधिकारी के भ्रष्टाचार की जांच करने का अधिकार था।

प्रतीकात्मक तस्वीर
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विस्तार

हरियाणा के लोकायुक्त अब भ्रष्टाचार और बदनीयती के मामलों में स्वत: संज्ञान लेंगे। सुप्रीम कोर्ट के आठ महीने पहले आए फैसले के बाद अब उन्हें इस तरह के मामलों में शिकायत आने का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। भ्रष्टाचार में लिप्त और जानबूझकर लोगों के काम लटकाने वाले अफसरों के खिलाफ वह खुद जांच के आदेश जारी कर सकेंगे।



लोकायुक्त सेवानिवृत्त जस्टिस हरिपाल वर्मा ने कहा कि जनता से जुड़े किसी भी मामले में भ्रष्टाचार की बू आने पर वह स्वत: संज्ञान ले सकते हैं। विशेष मामलों में ही शिकायत की जरूरत होगी। सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार व बदनीयती के मामलों में कार्रवाई के लिए आठ महीने पहले फैसला सुनाया है। विस्तृत अध्ययन के बाद उसे जल्दी लागू करने जा रहे हैं।


राजस्व विभाग के अधिकारियों द्वारा लोगों की निशानदेही समय पर न करने, पंचायत प्रतिनिधियों के अवैध कब्जों को न हटाने, पदोन्नति न करने, विकास कार्यों में भ्रष्टाचार, हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण के अधिकारियों के नियमानुसार काम न करने आदि मामलों में लोकायुक्त स्वत: संज्ञान ले सकते हैं। ये सभी मामले जनता से जुड़े हुए हैं और अधिकारियों की मनमानी के कारण लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। 

पिछले वित्तीय वर्ष की रिपोर्ट तैयार

लोकायुक्त जस्टिस हरिपाल वर्मा ने बीते वर्ष की रिपोर्ट तैयार कर ली है। उन्होंने 19 जुलाई 2021 को कार्यभार संभाला था, तब से 31 मार्च 2022 तक निपटाई गई शिकायतों और सरकार को भेजी गई सिफारिशों के आधार पर रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट जल्दी राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय को सौंपी जाएगी। लोकायुक्त कार्यालय ने इसके लिए राजभवन से समय मांगा है।

सरकार से इन शक्तियों की दरकार

  • भ्रष्टाचार के मामलों में अभियोग चलाने और जांच एजेंसी पर नियंत्रण।
  • आदेशों की अवमानना होने पर हाईकोर्ट की तरह अवमानना का मामला चला सकें।
  • सरकार की तरफ से सभी मामलों में स्वत: संज्ञान लेकर कार्रवाई करने का अधिकार
  • भ्रष्टाचार उजागर करने वाले की सुरक्षा

भ्रष्टाचार के बड़े मामलों की आती हैं कम शिकायतें

लोकायुक्त के पास भ्रष्टाचार के बड़े मामलों की कम शिकायतें पहुंचती हैं। नेताओं के भ्रष्टाचार से जुड़े इक्का-दुक्का मामलों में ही शिकायतें हुई होंगी, जबकि लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्ति का मुख्य उद्देश्य ही सफेदपोशों के भ्रष्टाचार को रोकना है।

चौटाला शासन में कम हुईं शक्तियां

पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल ने वर्ष 1999 में हरियाणा लोकपाल कानून बनाकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के कार्यरत जज आईपी वशिष्ठ को पहला लोकपाल बनाया था। उस समय लोकपाल को स्वत: संज्ञान लेकर किसी भी मंत्री व अधिकारी के भ्रष्टाचार की जांच करने का अधिकार था। पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने अपने कार्यकाल में लोकपाल को लोकायुक्त का दर्जा देकर उनके अधिकारों में कटौती की। 2002 में बनाए गए हरियाणा लोकायुक्त एक्ट में स्वत: संज्ञान लेकर किसी भी मंत्री व अधिकारी के खिलाफ जांच करने का अधिकार छीन लिया गया। 

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