{"_id":"08e2ae577dcc212b8df43233f08f161f","slug":"haryana-girl-hosted-beti-bchao-flag-on-kilimanjaro-hill-of-africa-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"अफ्रीका की चोटी पर रेखा ने फहराया 'बेटी बचाओ' का झंडा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अफ्रीका की चोटी पर रेखा ने फहराया 'बेटी बचाओ' का झंडा
दीपेंद्र प्रताप सिंह/अमर उजाला, रेवाड़ी
Updated Wed, 19 Aug 2015 02:42 PM IST
विज्ञापन
हरियाणा के रेवाड़ी जिले की बेटी रेखा ने अफ्रीका की सबसे ऊंचे प्वाइंट पर्वत किलिमंजेरो की उहरू चोटी पर ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का झंडा फहरा दिया है। तंजानिया स्थित इस पर्वत को दुनिया के सबसे ऊंचे एकल पर्वत के तौर पर भी जाना जाता है।
विज्ञापन
रेखा ने किलिमंजेरो की उहरू चोटी (5895 मीटर) पर 8 अगस्त को चढ़ना शुरू किया था। सात दिन बाद 15 अगस्त को अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी को फतेह किया। लक्ष्य हासिल करने पर रेखा ने खुशी जताई और कहा कि इस बात का मलाल भी है कि उसकी एवरेस्ट विजेता बहन सुनीता गुर्जर नहीं जा सकीं।
विज्ञापन
रेखा बावल खंड के गुर्जर माजरी में उनका मूल निवास है। वर्तमान में वह बंगलूरू में रहकर नौकरी कर रही है। सुनीता ने भी दो पर्वत की चोटियों को फतह करने के लिए मदद की मांग प्रशासन के सामने रखी थी, प्रशासन की ओर से उन्हें मदद नहीं मिली।
विज्ञापन
माइनस 30 डिग्री तापमान पर की चढ़ाई
रेखा ने बताया कि तंजानिया के किलिमंजेरो पर्वत की उहरू चोटी अफ्रीका का सबसे ऊंचा प्वाइंट है। इस पर्वत की कोई शृंखलाएं नहीं होने की वजह से हड्डियां जमा देने वाली हवा काफी तेजी से सीधे आती है। रात तीन से पांच बजे के बीच सबसे ज्यादा ठंड रहती है। इस दौरान तापमान माइनस 30 डिग्री सेल्सियस रहता है।
ओम नम: शिवाय करती पहुंची शिखर पर
रेखा ने बताया कि माउंटेन सिकनेस को दूर करने के लिए एक हफ्ते पहले से डाइमोक्स (मौसम बदलने के दौरान होने वाली बीमारियां दूर करने की दवा) ली जाती है। यह दवा ग्रुप के सभी छह अन्य सदस्यों ने ली थी, लेकिन उसने नहीं ली थी। बहन सुनीता से मिली सलाह के अलावा मंत्र ओम नम: शिवाय का जाप करते हुए वह चोटी तक पहुंच गई।
300 मीटर किसिंग रॉक सबसे कठिन
रेखा ने माउंटेन क्लाइंबिंग के तीसरे दिन को एडवेंचर का सबसे कठिन दिन बताया। उसका कहना है कि इस दिन उन्हें पर्वत के ऐसे हिस्से पर चढ़ना था, जोकि बिल्कुल सीधा था। इसके अलावा सपोर्ट के लिए किसी तरह की रोप या अन्य साधन भी नहीं था। हाथों के सहारे चट्टानों को पकड़कर चढ़ना था। इस दौरान संतुलन रखना बेहद जरूरी होता है। क्योंकि चट्टानों से चिपककर चढ़ना होता है, इसलिए 300 मीटर के इस हिस्से को किसिंग रॉक भी कहते हैं।