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Haryana Election: सत्ता विरोध कम करने की कवायद में अंतर्विरोध से जूझती भाजपा... यहां भी लागू किया ये फार्मूला
Fri, 06 Sep 2024 11:51 AM IST
शाहरुख खान
विजय गुप्ता, अमर उजाला, चंडीगढ़
विजय गुप्ता, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: शाहरुख खान
Updated Fri, 06 Sep 2024 11:51 AM IST
सार
हरियाणा में भाजपा सत्ता विरोध कम करने की कवायद में अंतर्विरोध से जूझ रही है। सिद्धांत से हटकर परिजनों और 75 पार वालों को भी प्रत्याशी बनाया गया है। इस्तीफा देने और निर्दलीय लड़ने का एलान कर रहे नेताओं को मनाना भी चुनौती है।
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Haryana Election
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी को विधानसभा चुनाव के 67 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी करते ही अभूतपूर्व बगावत का सामना करना पड़ रहा है। चुनाव में सत्ता विरोध का प्रभाव कम करने की कवायद में भाजपा अंतर्विरोध में उलझ गई है। टिकट न मिलने से नाराज नेताओं व उनके समर्थकों के इस्तीफे और निर्दलीय चुनाव लड़ने के एलान हो रहे हैं।
लगभग एक तिहाई प्रत्याशियों के विरोध में स्वर उठने से भाजपा के सामने फिलहाल नई चुनौती खड़ी हो गई है। सिर्फ हारे ही नहीं, मौजूदा विधायकों व मंत्रियों के भी टिकट काटकर जिताऊ उम्मीदवारों को मैदान में उतारने का भाजपा का फार्मूला कई राज्यों में सफल रहा है।
इन जिताऊ उम्मीदवारों में चाहे दूसरे दलों से आए ही क्यों न हों। इसी फार्मूले पर हरियाणा में भी काम हुआ है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का फीडबैक भी रहा है कि चुने हुए कई नेताओं के विरोध को देखते हुए नए लोगों को मौका दिया जाए।
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10 साल से सत्ता में होने की वजह से सरकार के प्रति नाराजगी के मद्देनजर न केवल पिछली बार हारे 50 में से 23 उम्मीदवारों को बदल दिया गया है, बल्कि 8 मौजूदा विधायकों का भी पत्ता साफ कर दिया है। 40 सीटों पर चेहरे बदलने पड़े हैं। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की ही सीट करनाल से बदलकर लाडवा करने से स्थिति समझी जा सकती है।
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लगभग एक तिहाई प्रत्याशियों के विरोध में स्वर उठने से भाजपा के सामने फिलहाल नई चुनौती खड़ी हो गई है। सिर्फ हारे ही नहीं, मौजूदा विधायकों व मंत्रियों के भी टिकट काटकर जिताऊ उम्मीदवारों को मैदान में उतारने का भाजपा का फार्मूला कई राज्यों में सफल रहा है।
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इन जिताऊ उम्मीदवारों में चाहे दूसरे दलों से आए ही क्यों न हों। इसी फार्मूले पर हरियाणा में भी काम हुआ है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का फीडबैक भी रहा है कि चुने हुए कई नेताओं के विरोध को देखते हुए नए लोगों को मौका दिया जाए।
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10 साल से सत्ता में होने की वजह से सरकार के प्रति नाराजगी के मद्देनजर न केवल पिछली बार हारे 50 में से 23 उम्मीदवारों को बदल दिया गया है, बल्कि 8 मौजूदा विधायकों का भी पत्ता साफ कर दिया है। 40 सीटों पर चेहरे बदलने पड़े हैं। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की ही सीट करनाल से बदलकर लाडवा करने से स्थिति समझी जा सकती है।
भाजपा ने पहले ही साफ कर दिया था कि वह जिताऊ उम्मीदवारों पर ही दांव लगाएगी, लेकिन पार्टी के पुराने लोगों के टिकट काटने और दूसरे दलों से आए नेताओं को टिकट देने से पार्टी में बवाल हो गया है।
कुछ समय पहले ही जननायक जनता पार्टी (जजपा) से आए पांच विधायकों समेत सात नेताओं को टिकट देना भाजपाइयों ही नहीं, सभी को चौंका गया। कांग्रेस से दो और इनेलो से आए एक नेता को भी टिकट मिला है। 67 में से 10 नेता बाहरी हैं जिनका विरोध होना स्वाभाविक है।
इसे दबाव की राजनीति का असर कहें या केवल जीत पर नजर कि राजनीति में परिवारवाद का विरोध करती रही ‘पार्टी विद ए डिफरेंस’ ने छह नेताओं के परिजनों को टिकट दिए हैं। इनमें तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के वंशज हैं। इससे उन सामान्य कार्यकर्ताओं में बेचैनी हो सकती है जो जमीनी स्तर पर कई वर्षों से जुटे हुए हैं।
अपने सिद्धांत के विपरीत 75 साल से ऊपर के दो उम्मीदवार उतारे हैं। हालांकि जम्मू-कश्मीर में भी पहली सूची के बाद इसी तरह विद्रोह की चिंगारियां उठीं थीं, लेकिन दोबारा सूची आने तक उन्हें शांत कर दिया गया। हरियाणा में भाजपा के लिए स्थिति जटिल है, क्योंकि कई दिग्गज बगावत पर उतरे हैं।
इस्तीफा दे चुके मंत्री रणजीत चौटाला, निर्दलीय चुनाव लड़ने का एलान कर चुकीं उद्योगपति व सांसद नवीन जिंदल की माता सावित्री जिंदल, पार्टी छोड़ने के संकेत दे चुके मंत्री बिशंबर वाल्मीकि, नाराजगी जता चुकीं पूर्व मंत्री कविता जैन समेत करीब दर्जन भर बड़े नेताओं को मनाना डैमेज कंट्रोल के लिए बनाई गई कमेटी के लिए चुनौती है।
राजनीतिक विश्लेषक व पंजाब विश्वविद्यालय के प्रोफेसर गुरमीत सिंह कहते हैं कि जब एक अनार सौ बीमार वाली स्थिति होगी तो ऐसा होगा ही। इस असर कितना होगा यह इस पर भी निर्भर करेगा कि अभी कांग्रेस में कितनी बगावत होती है।