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Haryana Cabinet: सैनी के मंत्रिमंडल में सर्जन, बिजनेसमैन और पूर्व IAS; सबसे बुजुर्ग कमल तो सबसे युवा हैं असीम
Wed, 20 Mar 2024 10:53 AM IST
शाहरुख खान
आशीष वर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
आशीष वर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: शाहरुख खान
Updated Wed, 20 Mar 2024 10:53 AM IST
सार
हरियाणा मंत्रिमंडल में सर्जन, बिजनेसमैन, शिक्षक और पूर्व आईएएस शामिल हैं। मंत्रिमंडल में सबसे बुजुर्ग कमल गुप्ता हैं। जबकि सबसे युवा असीम गोयल हैं।
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Haryana Cabinet
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
हरियाणा के सीएम नायब सिंह सैनी सरकार के मंत्रिमंडल में बिजनेसमैन, सर्जन, शिक्षक, एडवोकेट और पूर्व आईएएस शामिल हैं। मंत्रिमंडल में शामिल सिर्फ एक विधायक को छोड़ बाकी सभी दो बार से विधायक हैं। मंत्रिमंडल में सबसे उम्रदार मंत्री कमल गुप्ता हैं। उनकी उम्र 71 साल है। वहीं, सबसे युवा 44 साल के असीम गोयल हैं।
पढ़े-लिखों की बात की जाए तो सबसे ज्यादा पढ़े लिखे चौधरी नांगल के विधायक अभय सिंह यादव हैं। वह पूर्व आईएएस हैं और उन्होंने लॉ में पीएचडी की है। संपत्तियों की बात करें तो सबसे अमीर जेपी दलाल हैं। उनकी संपत्ति करीब 76 करोड़ हैं। वहीं, नए मंत्रियों में महीपाल ढांडा सबसे अमीर हैं। उनके पास 12 करोड़ से ज्यादा संपत्ति है। एक नजर डालते हैं राज्य के मंत्रियों पर।
सर्जन हैं पूर्व मंत्री डा. कमल गुप्ता
डा. कमल गुप्ता मंत्रिमंडल का पुराना चेहरा हैं। वह मनोहर सरकार में निकाय मंत्री थे। उनका बचपन भी काफी संघर्ष भरा रहा है। 71 वर्षीय कमल गुप्ता रोहतक से एमबीबीएस की पढ़ाई की और उसके बाद एमएस सर्जन बने। कई साल तक उन्होंने ऑपरेशन किए हैं। पहले वह सरकारी चिकित्सक बने और उसके बाद प्राइवेट प्रैक्टिस की।
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पहले दो चुनाव में उन्हें हार का स्वाद चखना पड़ा था। साल 2014 में मोदी लहर में वह पहली बार विधायक बने। उन्हें सीपीएस बनाया गया। उसके बाद 2019 में भी वह विधायक चुने गए। साल 2019 में उन्हें मंत्री पद से नवाजा गया। इससे वह साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा संपत्ति के मालिक हैं।
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पढ़े-लिखों की बात की जाए तो सबसे ज्यादा पढ़े लिखे चौधरी नांगल के विधायक अभय सिंह यादव हैं। वह पूर्व आईएएस हैं और उन्होंने लॉ में पीएचडी की है। संपत्तियों की बात करें तो सबसे अमीर जेपी दलाल हैं। उनकी संपत्ति करीब 76 करोड़ हैं। वहीं, नए मंत्रियों में महीपाल ढांडा सबसे अमीर हैं। उनके पास 12 करोड़ से ज्यादा संपत्ति है। एक नजर डालते हैं राज्य के मंत्रियों पर।
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सर्जन हैं पूर्व मंत्री डा. कमल गुप्ता
डा. कमल गुप्ता मंत्रिमंडल का पुराना चेहरा हैं। वह मनोहर सरकार में निकाय मंत्री थे। उनका बचपन भी काफी संघर्ष भरा रहा है। 71 वर्षीय कमल गुप्ता रोहतक से एमबीबीएस की पढ़ाई की और उसके बाद एमएस सर्जन बने। कई साल तक उन्होंने ऑपरेशन किए हैं। पहले वह सरकारी चिकित्सक बने और उसके बाद प्राइवेट प्रैक्टिस की।
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पहले दो चुनाव में उन्हें हार का स्वाद चखना पड़ा था। साल 2014 में मोदी लहर में वह पहली बार विधायक बने। उन्हें सीपीएस बनाया गया। उसके बाद 2019 में भी वह विधायक चुने गए। साल 2019 में उन्हें मंत्री पद से नवाजा गया। इससे वह साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा संपत्ति के मालिक हैं।
पूर्व आईएएस हैं अभय सिंह यादव
पूर्व आईएएस अभय सिंह यादव ने विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए साल 2013 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी। कुछ महीने तक वह इनेलो में रहे। मगर साल 2014 चुनाव से पहले वह भाजपा में शामिल हो गए और नांगल चौधरी से विधानसभा का चुनाव लड़ा और पहली बार में ही विधानसभा पहुंच गए। साल 2019 में भी वह भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। वह काफी पढ़े-लिखे हैं।
एमए, एलएलएम और उसके बार पीएचडी की डिग्री भी हासिल की। 69 वर्षीय यादव 1986 में एचसीएस में सलेक्शन हो गया था। 2001 में आईएएस बने और पूरे राज्य में प्रशासनिक सेवाएं दी। बताते हैं कि अभय सिंह यादव का बचपन काफी संघर्ष भरा रहा है। उनका 2019 में ही मंत्री बनना तय था, मगर राव इंद्रजीत ने अपने कोटे से ओमप्रकाश यादव को मंत्री बनवा दिया था।
पूर्व आईएएस अभय सिंह यादव ने विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए साल 2013 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी। कुछ महीने तक वह इनेलो में रहे। मगर साल 2014 चुनाव से पहले वह भाजपा में शामिल हो गए और नांगल चौधरी से विधानसभा का चुनाव लड़ा और पहली बार में ही विधानसभा पहुंच गए। साल 2019 में भी वह भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। वह काफी पढ़े-लिखे हैं।
एमए, एलएलएम और उसके बार पीएचडी की डिग्री भी हासिल की। 69 वर्षीय यादव 1986 में एचसीएस में सलेक्शन हो गया था। 2001 में आईएएस बने और पूरे राज्य में प्रशासनिक सेवाएं दी। बताते हैं कि अभय सिंह यादव का बचपन काफी संघर्ष भरा रहा है। उनका 2019 में ही मंत्री बनना तय था, मगर राव इंद्रजीत ने अपने कोटे से ओमप्रकाश यादव को मंत्री बनवा दिया था।
पहले सरंपच का चुनाव हारा, फिर बने विधायक
भिवानी के बवानी खेड़ के विधायक विशंभर सिंह वाल्मीकी की 2014 से पहले कोई खास पहचान नहीं थी। वह खरक कलां गांव में सरपंच का चुनाव हार गए थे। 2014 में वह भाजपा में शामिल हुए और इनेलो के दया भुरटाना को 2649 वोटों से हराकर पहली बार विधायक बने।
बताया जा रहा है कि मोदी लहर में उनकी नैय्या पार हो गई थी। विधायक बनने के बाद उनका रुतबा और साल 2019 में वह फिर से भाजपा के विधायक बने। 2018 में उनके ऊपर दुखों का पहाड़ टूट गया था। उनके इकलौते 17 वर्षीय बेटे की अचानक मौत हो गई थी। उनका बेटा चंडीगढ़ के डीएवी कालेज में 12वीं का का छात्र था। वह बीए पास हैं और पेशे के तौर पर वह सामाजिक कार्यकर्ता हैं।
भिवानी के बवानी खेड़ के विधायक विशंभर सिंह वाल्मीकी की 2014 से पहले कोई खास पहचान नहीं थी। वह खरक कलां गांव में सरपंच का चुनाव हार गए थे। 2014 में वह भाजपा में शामिल हुए और इनेलो के दया भुरटाना को 2649 वोटों से हराकर पहली बार विधायक बने।
बताया जा रहा है कि मोदी लहर में उनकी नैय्या पार हो गई थी। विधायक बनने के बाद उनका रुतबा और साल 2019 में वह फिर से भाजपा के विधायक बने। 2018 में उनके ऊपर दुखों का पहाड़ टूट गया था। उनके इकलौते 17 वर्षीय बेटे की अचानक मौत हो गई थी। उनका बेटा चंडीगढ़ के डीएवी कालेज में 12वीं का का छात्र था। वह बीए पास हैं और पेशे के तौर पर वह सामाजिक कार्यकर्ता हैं।
80 के दशक में भाजपा से जुड़ गए थे ढांडा
पानीपत ग्रामीण से भाजपा विधायक महिपाल ढांडा उस समय पार्टी से जुड़े थे, जब राज्य में भाजपा के पास कुछ खास नहीं था। 80 के दशक में वह पार्टी के साथ जुड़ गए थे। पार्टी के प्रति निष्ठा को देखते हुए उन्हें मंत्री के पद से नवाजा गया है। उनका अपना बिजनेस हैं और आरएसएस से जुड़े रहे हैं।
भाजपा किसान मोर्चा के अध्यक्ष बनने के बाद 2014 में पहला चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। साल 2019 में उनका मंत्री बनना तय था, मगर उनका नंबर नहीं लगा। वह संगठन से आते हैं और ओम प्रकाश धनखड़ के काफी करीबी हैं। बताते हैं कि पूर्व सीएम से उनकी ज्यादा नहीं बनती थी।
पानीपत ग्रामीण से भाजपा विधायक महिपाल ढांडा उस समय पार्टी से जुड़े थे, जब राज्य में भाजपा के पास कुछ खास नहीं था। 80 के दशक में वह पार्टी के साथ जुड़ गए थे। पार्टी के प्रति निष्ठा को देखते हुए उन्हें मंत्री के पद से नवाजा गया है। उनका अपना बिजनेस हैं और आरएसएस से जुड़े रहे हैं।
भाजपा किसान मोर्चा के अध्यक्ष बनने के बाद 2014 में पहला चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। साल 2019 में उनका मंत्री बनना तय था, मगर उनका नंबर नहीं लगा। वह संगठन से आते हैं और ओम प्रकाश धनखड़ के काफी करीबी हैं। बताते हैं कि पूर्व सीएम से उनकी ज्यादा नहीं बनती थी।
पूर्व मंत्री विनोद शर्मा को हराकर विधायक बने
अनिल विज की नाराजगी की वजह से अंबाला सिटी के विधायक असीम गोयल की किस्मत खुल गई। वह किशोरावस्था से ही आरएसएस से जुड़ गए थे। साल 2014 में हरियाणा विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की। उन्होंने पूर्व मंत्री व दिग्गज नेता विनोद शर्मा को हराया था।
स्नातक असीम गोयल को इसी साल सर्वश्रेष्ठ विधायक के पद से नवाजा से गया था। 2019 के चुनावी हलफनामे के मुताबिक वह कमिशन एजेंट हैं। वह उस समय विवादों में आ गए थे, जब उन्होंने विवादास्पद व्यक्ति सुरेश चव्हाणके के साथ भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की शपथ ली थी। हालांकि बाद में उन्होंने कहा था कि उन्होंने किसी धर्म व मजहब के खिलाफ कुछ नहीं बोला।
अनिल विज की नाराजगी की वजह से अंबाला सिटी के विधायक असीम गोयल की किस्मत खुल गई। वह किशोरावस्था से ही आरएसएस से जुड़ गए थे। साल 2014 में हरियाणा विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की। उन्होंने पूर्व मंत्री व दिग्गज नेता विनोद शर्मा को हराया था।
स्नातक असीम गोयल को इसी साल सर्वश्रेष्ठ विधायक के पद से नवाजा से गया था। 2019 के चुनावी हलफनामे के मुताबिक वह कमिशन एजेंट हैं। वह उस समय विवादों में आ गए थे, जब उन्होंने विवादास्पद व्यक्ति सुरेश चव्हाणके के साथ भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की शपथ ली थी। हालांकि बाद में उन्होंने कहा था कि उन्होंने किसी धर्म व मजहब के खिलाफ कुछ नहीं बोला।
राजनीति में आने से पहले पढ़ाती थीं सीमा त्रिखा
बड़खल विधानसभा क्षेत्र से भाजपा की विधायक सीमा त्रिखा दूसरी बार भाजपा की विधायक बनी हैं। वह मनोहर सरकार में मुख्य संसदीय सचिव के पद पर रह चुकी हैं। 31 अगस्त 1968 को जन्मी सीमा त्रिखा ने एमए एलएलबी की शिक्षा हासिल की है। उनके पति भी वकील हैं। वह एक शिक्षक रही हैं। राजनीति में आने से पहले वह प्राइवेट स्कूल में अध्यापिका रही हैं। 2014 में उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता चौ. महेन्द्र प्रताप सिंह को हराया। उसके बाद उन्होंने विजय प्रताप सिंह को हराया था। पंजाबी व महिला होने के नाते उन्हें सरकार ने मंत्री बनाया है।
बड़खल विधानसभा क्षेत्र से भाजपा की विधायक सीमा त्रिखा दूसरी बार भाजपा की विधायक बनी हैं। वह मनोहर सरकार में मुख्य संसदीय सचिव के पद पर रह चुकी हैं। 31 अगस्त 1968 को जन्मी सीमा त्रिखा ने एमए एलएलबी की शिक्षा हासिल की है। उनके पति भी वकील हैं। वह एक शिक्षक रही हैं। राजनीति में आने से पहले वह प्राइवेट स्कूल में अध्यापिका रही हैं। 2014 में उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता चौ. महेन्द्र प्रताप सिंह को हराया। उसके बाद उन्होंने विजय प्रताप सिंह को हराया था। पंजाबी व महिला होने के नाते उन्हें सरकार ने मंत्री बनाया है।
पहले पार्षद चुने गए, फिर विधायक चुने गए सुभाष सुधा
थानेसर से विधायक सुभाष सुधा 2002 में पहली बार पार्षद चुने गए थे। उसके बाद वह 2005 में कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्होंने 2009 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ा,
मगर उन्हें हार झेलनी पड़ी। साल 2014 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले वह भाजपा की बस में सवार हो गए और विधायक बनकर विधानसभा में पहुंचे। उनकी पत्नी उमा सुधा नगर परिषद की चेयरमैन हैं। हाल ही में उनके बेटे साहिल को कुरुक्षेत्र भाजपा युवा मोर्चा का प्रधान बनाया गया है।
थानेसर से विधायक सुभाष सुधा 2002 में पहली बार पार्षद चुने गए थे। उसके बाद वह 2005 में कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्होंने 2009 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ा,
मगर उन्हें हार झेलनी पड़ी। साल 2014 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले वह भाजपा की बस में सवार हो गए और विधायक बनकर विधानसभा में पहुंचे। उनकी पत्नी उमा सुधा नगर परिषद की चेयरमैन हैं। हाल ही में उनके बेटे साहिल को कुरुक्षेत्र भाजपा युवा मोर्चा का प्रधान बनाया गया है।
जब बवाना गैंग ने मांगी थी फिरौती
49 वर्षीय संजय सिंह पूर्व राज्य मंत्री कंवर सूरज पाल सिंह के बेटे हैं। संजय सिंह का परिवार मेवात क्षेत्र में सक्रिय रहा है। पहले वह उजिना के सरपंच चुने गए और उसके बाद 2019 में उन्होंने भाजपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। राजपूत समुदाय से आने वाले संजय सिंह अक्सर गौरक्षा और किसान संगठनों के सम्मेलन में शामिल होते रहे हैं। 2022 में वह चर्चा में उस समय आ गए थे, जब उन्हें नीरज बवाना गैंग से जान से मारने की धमकी मिली थी और उनसे पांच लाख की फिरौती मांगी थी। नूंह दंगे के बाद पलवल में हुई हिंदू पंचायत में भी वह शामिल हुए थे और बयान दिया था कि वह पहले हिंदू हैं और विधायक बाद में।
49 वर्षीय संजय सिंह पूर्व राज्य मंत्री कंवर सूरज पाल सिंह के बेटे हैं। संजय सिंह का परिवार मेवात क्षेत्र में सक्रिय रहा है। पहले वह उजिना के सरपंच चुने गए और उसके बाद 2019 में उन्होंने भाजपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। राजपूत समुदाय से आने वाले संजय सिंह अक्सर गौरक्षा और किसान संगठनों के सम्मेलन में शामिल होते रहे हैं। 2022 में वह चर्चा में उस समय आ गए थे, जब उन्हें नीरज बवाना गैंग से जान से मारने की धमकी मिली थी और उनसे पांच लाख की फिरौती मांगी थी। नूंह दंगे के बाद पलवल में हुई हिंदू पंचायत में भी वह शामिल हुए थे और बयान दिया था कि वह पहले हिंदू हैं और विधायक बाद में।