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हरियाणा विस चुनावः कांग्रेस में नए और पुराने चेहरों में वर्चस्व की लड़ाई, तंवर युवाओं के हिमायती
Sat, 05 Oct 2019 11:41 AM IST
खुशबू गोयल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Sat, 05 Oct 2019 11:41 AM IST
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हरियाणा कांग्रेस
- फोटो : amar ujala
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हरियाणा विधानसभा चुनाव 2019 के रण में कांग्रेस न्यू बनाम ओल्ड गार्ड्स की लड़ाई में उलझी हुई है। पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा पुराने कांग्रेसियों के साथ ही नए साथियों को लेकर आगे बढ़ रहे हैं तो पूर्व प्रदेशाध्यक्ष डॉ. अशोक तंवर खुद को स्थापित करने के साथ ही युवा चेहरों को मैदान में उतारकर कांग्रेस को नया रंग रूप देने की कोशिश में जुटे हैं। यह लड़ाई नई नहीं, पुरानी है। तंवर प्रदेशाध्यक्ष पद पर आसीन होने के बाद से ही कांग्रेस को युवा स्वरूप देने में जुट गए थे, मगर पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा की दिल्ली दरबार में पैठ और प्रदेश के कांग्रेसियों में पकड़ के चलते यह संभव नहीं हो सका।
प्रदेश प्रभारी गुलाम नबी आजाद नए के साथ पुराने नेताओं को साथ लेकर चलने के पक्षधर थे, जो तंवर को गंवारा नहीं था, वह हुड्डा मुक्त कांग्रेस प्रदेश में चाह रहे थे। वक्त बदलते ही हुड्डा खेमे ने न केवल तंवर को विधानसभा चुनाव से पहले जोर का झटका धीरे से दिया, बल्कि उनके पांवों तले जमीन खिसका दी। उसके बाद से तंवर हुड्डा के खिलाफ तो मुखर हैं ही, हाईकमान के खिलाफ भी मोर्चा खोल रखा है। टिकट न मिलने पर तंवर समर्थक नेता व कार्यकर्ता बागी हो चुके हैं। टिकट न मिलने के बाद कुछेक नेताओं ने जजपा का दामन थाम लिया है तो बाकी भाजपा को भी समर्थन देने में लगे हुए हैं।
इससे कांग्रेस के मिशन सत्ता वापसी को झटका लग सकता है। पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा कांग्रेस को दोबारा सत्ता में लाने के लिए जोर लगाए हुए हैं, उन्होंने कद्दावर चेहरों को ही मैदान में उतारा है। जबकि, तंवर चाह रहे थे कि पुराने व हारते चले आ रहे नेताओं की जगह युवा तुर्क उतारे जाएं। पूर्व प्रदेशाध्यक्ष का यह अरमान पूरा नहीं हो सका। ऊपर से उन्होंने सबसे बड़ी गलती स्क्रीनिंग कमेटी की बैठक में शामिल न होकर कर दी। अगर वह बैठक में शामिल होते तो अपना पक्ष खुलकर रख सकते थे। अब यही बात उनके खिलाफ भी जा रही है। पार्टी हाईकमान ने भी इसे गंभीरता से लिया है।
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सोनिया गांधी के आवास के बाहर के बजाए अगर तंवर बैठक में हंगामा करते तो उसे अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि पार्टी प्लेटफार्म पर कही गई बात माना जाता। तंवर की इस अपरिपक्वता से हुड्डा खेमा और मजबूत हुआ है। राहुल गांधी के अध्यक्ष छोड़ने से भी अशोक तंवर राजनीतिक तौर पर कमजोर हुए हैं।
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प्रदेश प्रभारी गुलाम नबी आजाद नए के साथ पुराने नेताओं को साथ लेकर चलने के पक्षधर थे, जो तंवर को गंवारा नहीं था, वह हुड्डा मुक्त कांग्रेस प्रदेश में चाह रहे थे। वक्त बदलते ही हुड्डा खेमे ने न केवल तंवर को विधानसभा चुनाव से पहले जोर का झटका धीरे से दिया, बल्कि उनके पांवों तले जमीन खिसका दी। उसके बाद से तंवर हुड्डा के खिलाफ तो मुखर हैं ही, हाईकमान के खिलाफ भी मोर्चा खोल रखा है। टिकट न मिलने पर तंवर समर्थक नेता व कार्यकर्ता बागी हो चुके हैं। टिकट न मिलने के बाद कुछेक नेताओं ने जजपा का दामन थाम लिया है तो बाकी भाजपा को भी समर्थन देने में लगे हुए हैं।
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इससे कांग्रेस के मिशन सत्ता वापसी को झटका लग सकता है। पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा कांग्रेस को दोबारा सत्ता में लाने के लिए जोर लगाए हुए हैं, उन्होंने कद्दावर चेहरों को ही मैदान में उतारा है। जबकि, तंवर चाह रहे थे कि पुराने व हारते चले आ रहे नेताओं की जगह युवा तुर्क उतारे जाएं। पूर्व प्रदेशाध्यक्ष का यह अरमान पूरा नहीं हो सका। ऊपर से उन्होंने सबसे बड़ी गलती स्क्रीनिंग कमेटी की बैठक में शामिल न होकर कर दी। अगर वह बैठक में शामिल होते तो अपना पक्ष खुलकर रख सकते थे। अब यही बात उनके खिलाफ भी जा रही है। पार्टी हाईकमान ने भी इसे गंभीरता से लिया है।
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सोनिया गांधी के आवास के बाहर के बजाए अगर तंवर बैठक में हंगामा करते तो उसे अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि पार्टी प्लेटफार्म पर कही गई बात माना जाता। तंवर की इस अपरिपक्वता से हुड्डा खेमा और मजबूत हुआ है। राहुल गांधी के अध्यक्ष छोड़ने से भी अशोक तंवर राजनीतिक तौर पर कमजोर हुए हैं।