Haryana Result: भाजपा के पीछे रहने के 5 कारण और कांग्रेस की मजबूती के 5 कारण, जानिए
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हरियाणा में लोकसभा चुनाव में दस सीटों पर सफलता हासिल करने के बाद 75 सीटों पर जीत का दावा ठोकने वाली भारतीय जनता पार्टी का खेल सूबे के जाट-दलित गठजोड़ ने बिगाड़ दिया। जाटलैंड में पूर्व सीएम हुड्डा और दुष्यंत चौटाला का सिक्का चला।
जीटी रोड बेल्ट के भरोसे आश्वस्त बैठी बीजेपी का जीटी बेल्ट के मतदाताओं ने भी पूरा साथ नहीं दिया। अबांला, पंचकूला और यमुनानगर से भी पार्टी के हाथ अधिक कुछ नहीं लगा।
जबकि जाट और दलित गठजोड़ के सहारे कांग्रेस पिछले विधानसभा चुनाव की अपेक्षा दोगुनी सीटें जीत गई। पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के साथ कुमारी सैलजा की जुगलबंदी काम आई और डा. अशोक तंवर के बागी तेवरों का अधिक असर नहीं हुआ।
टिकट वितरण में पूरी हुड्डा की चलती तो कांग्रेस को और सीटों पर बढ़त हासिल हो सकती थी। जबकि अपनी नई नवेली पार्टी जेजेपी को मैदान में लेकर उतरे दुष्यंत चौटाला ने सधा हुआ चुनाव लड़ा।
जेजेपी का सूबे की एक दर्जन सीटों पर फोकस था जिसमें से दहाई का अंक छूने में जेजेपी कामयाब हुई। इसके अलावा हरियाणा में डेरा फैक्टर कांग्रेस को आगे बढ़ाने में कामयाब रहा है। डेरा सच्चा सौदा समर्थकों ने साइलेंट वोटर का काम किया और जहां पर जाट मतदाता अधिक नहीं थे वहां पर भाजपा प्रत्याशियों को हरवाने का काम किया।
अहिरवाल में नहीं चल पाया राव का जादू
अहिरवाल में राव इंद्रजीत का जादू इस बार नहीं चल पाया। बादशाहपुर, रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ जैसी सीटों पर भी भाजपा प्रत्याशी हार गए हैं। सरकार में कद्दावर कहे जाने वाले लोक निर्माण मंत्री का टिकट काट कर पार्टी ने बादशाहपुर से मनीष यादव को टिकट दिया था, लेकिन यादव पार्टी को जीत नहीं दिलवा सके।
जीटी रोड बेल्ट में भी हारी भाजपा
कालका, रादौर, नारायणगढ़, शाहबाद, लाडवा, गुहला, नीलोखेड़ी, सोनीपत, इसराना, असंध और रादौर सीट पर भी भाजपा हार गई है। यह जीटी रोड बेल्ट की वे सीटें हैं। जिन्हें पार्टी अपना मान कर चल रही थी। पिछले चुनाव मेें यहां से आशातीत सफलता मिलने के बाद इन सीटों पर हारने से पार्टी भी सदमे में है।
दिग्गजों को जनता ने दिखाई जमीन
हरियाणा की जनता ने भाजपा के दिग्गज मंत्रियों को जमीन दिखा दी है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष को ही टोहाना से जीत पाना मुश्किल हो गया। इसके अलावा दिग्गजों में शुमार होने वाले मंत्री कैप्टन अभिमन्यु, ओम प्रकाश धनखड़, मनीष ग्रोवर, कविता जैन, रामबिलास शर्मा, कर्ण देव कांबोज, कृष्ण बेदी, रतनलाल पंवार चुनाव हार गए हैं।
कांग्रेस के दिग्गज भी हारे
केंद्र की राजनीति में सक्रिय रणदीप सुरजेवाला को उनके क्षेत्र की जनता ने चित कर दिया है। हुडडा के खास विधायक करण सिंह दलाल भी पलवल से हार गए हैं। इसके अलावा गन्नौर से कुलदीप शर्मा भी जीत हासिल करने में नाकाम रहे।
टिकट मिलने से पहले ही नामांकन करने वाले आनंद सिंह दांगी को भी महम की जनता ने नकार दिया। सिटिंग एमएलए में जयतीर्थ दहिया राई और उदयभान होडल से चुनाव हार गए हैं।
एक अंक पर सिमटी इनेलो
इंडियन नेशनल लोकदल के सहारे पिछली विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद हासिल करने वाले अभय सिंह चौटाला अपनी पार्टी से अकेले ही विधायक बने हैं। उनके समधी दिलबाग सिंह ने यमुनानगर से चुनाव लड़ा था वह भी हार गए। किसी समय सत्ता में शीर्ष पर होने वाली इनेलो अब एक विधायक तक सिमट गई है।
दलबदलुओं की भी अधिक नहीं चली
इस चुनाव में अधिक दलबदलू भी नहीं जीत पाए हैं। करीब 14 दलबदलू हार गए हैं। जबकि इनेलो छोड़कर भाजपा में आए रणबीर गंगवा नलवा से, इनेलो छोड़ कांग्रेस में आए प्रदीप चौधरी कालका से, कांग्रेस छोड़ जेजेपी में आए ईश्वर सिंह गुहला और कांग्रेस से जेजेपी में आए देवेंद्र सिंह बबली टोहाना से चुनाव जीत गए हैं।
भाजपा के पीछे रहने के पांच कारण
1. दो मंत्रियों सहित दस विधायकों के टिकट कटे, जिनमें से सात जीते, पांच हारे।
2. नौ सिटिंग विधायकों के टिकट काटे।
3.जींद उपचुनाव और लोकसभा के बाद अति उत्साह में आना।
4.स्थानीय मुददों पर कमजोर पकड़।
5.घोषणापत्र में नई घोषणाएं न होना।
कांग्रेस की बढ़त के पांच कारण
1. पांच साल तक हुड्डा ने अपनी कोर टीम को पकड़े रखा।
2.पांच साल तक जनता के बीच हर समय उपलब्ध रहे हुड्डा।
3.कांग्रेस का संगठन धराशाई होने के बावजूद हुडडा का सक्रिय रहना।
4. लोकसभा की हार के बाद चेत गई थी कांग्रेस।
5. कांग्रेस का बहुत सोच समझ कर किया गया टिकट वितरण।