मुद्दे तो दिखावा हैं, जाति पर होगी सियासत
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हरियाणा के महासंग्राम में सभी सियासी दल सड़क, पानी, बिजली, विकास में भेदभाव, महिलाओं की सुरक्षा आदि मुद्दों पर सत्ताधारी दल को घेरने में जुटे हुए हैं। कांग्रेस पर कोई विकास में भेदभाव का आरोप मढ़ रहा है तो कोई युवाओं को नौकरी देने में धांधली का आरोप लगा रहा है जबकि कांग्रेस अपने विकास के मुद्दे का ही हवाला देकर तीसरी बार सत्ता में आने का दावा कर रही है।
वर्षों से सूबे में इन्हीं मुद्दों पर चुनाव लड़े जा रहे हैं वास्तव में राजनीतिक दलों के यह मुद्दे दिखावा मात्र हैं सभी सियासी दल इन दिनों जातीय समीकरण भिड़ाने में जुटे हुए हैं। यही कारण है कि अभी तक सभी सियासी दल अपने प्रत्याशी तक घोषित नहीं कर पाए हैं। क्योंकि यदि विकास के मुद्दे पर ही चुनाव लड़ना हो तो पार्टी किसी को भी उतार कर मैदान मार सकती है लेकिन जातीय गुणा गणित भिड़ाकर कि किस विधानसभा सीट पर किस जाति के वोट ज्यादा हैं उसी जाति के प्रत्याशी को उम्मीदवार बनाया जाए। वैसे भी चुनाव में जातीय समीकरणों का बड़ा महत्व होता है, यहां भी राजनीति में जाट और गैर जाट का मामला लंबे अर्से से चला आ रहा है।
अपने सूबे में 38 से 40 सीटों पर जहां जाट वोट बैंक का दबदबा है वहीं 45 से 50 सीटों पर गैर जाट मतदाताओं का बोलबाला है। अब सियासी दल इन्हीं समीकरणों को भिड़ने में जुटे हुए हैं।
इनेलो ने जहां इस स्थिति को भांपते हुए पहले ही अपने 73 उम्मीदवार घोषित कर दिए तो हजकां और कांग्रेस अभी इस मंथन में लगे हैं कि कहां से जिताऊ उम्मीदवार उतारे जाएं जो उन्हें सत्ता की कुर्सी तक पहुंचा सकें। भाजपा ने अब तक 43 उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं इनमें ज्यादातर जातीय समीकरणों को देखते हुए ही मैदान में उतारे गए हैं।
जिधर जाएंगे जाट, उसके होंगे ठाठ
हरियाणा की राजनीति में जाट वोट बैंक का दबदबा रहा है। सोनीपत, रोहतक, जींद, फतेहाबाद, हिसार, भिवानी, झज्जर/बहादुरगढ़, कैथल और सिरसा जिलों की ज्यादातर सीटें या तो जाट बहुल हैं या उनकी अच्छी खासी संख्या है जो हार जीत का फैसला कर सकें। इसीलिए सभी सियासी दल हमेशा टिकट वितरण में जाट वोट बैंक को रिझाने की कोशिश करते हैं।
कांग्रेस, इनेलो और हजकां इस वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए है। इनेलो को जहां अपने कैडर वोट से उम्मीद है कांग्रेस वहीं जाट समाज का मुख्यमंत्री होने का लाभ उठाना चाहती है।
इन सीटों पर है जाटों का जलवा
रोहतक: महम, गढ़ी-सांपला किलोई, कलानौर
झज्जर: बहादुरगढ़, बादली, झज्जर, बेरी
कैथल: कलायत, कैथल, पुंडरी, घरौंदा
पानीपत: पानीपत ग्रामीण, इसराना
सोनीपत: गन्नौर, राई, खरखौदा, गोहाना, बरौदा
जींद: जींद, उचाना कलां, नरवाना, सफीदों
फतेहाबाद: फतेहाबाद, टोहाना
सिरसा: ऐलनाबाद, रानियां
हिसार: आदमपुर, उकलाना, नारनौंद, हांसी, बरवाला, नलवा
भिवानी: लोहारू, बाढ़डा, तोशाम, दादरी
कुरुक्षेत्र: लाडवा, शाहबाद, पिहोवा, गुहला
गैर जाट मतदाता भी दिखाएंगे दम
गैर जाट मतदाताओं को लुभाने के लिए भी सभी सियासी दल लगे हुए हैं। कांग्रेस जहां दलित वोट बैंक को अपना कैडर वोट मानती है वहीं भाजपा इस बार सभी गैर जाट वोटों को मोदी लहर के सहारे रिझाना चाह रही है। हजकां प्रमुख कुलदीप बिश्नोई छोटे-छोटे दलों से गठबंधन कर सभी गैर जाट मतदाताओं के नेताओं को एक प्लेटफार्म पर लाने का प्रयास कर रहे हैं। इस कड़ी में उन्होंने सबसे पहले विनोद शर्मा का हाथ थामा है। अब बसपा से गठबंधन के लिए प्रयास कर रहे हैं। बसपा ने भी हरियाणा में सेंध लगाने के लिए अपना सोशल इंजीनियरिंग कार्ड खेला है।
उसने मुख्यमंत्री पद के लिए अरविंद शर्मा के रूप में जहां ब्राम्हण चेहरा उतारा है वहीं दलित वोट बैंक पर भी पूरी तरह से नजर गढ़ाए हुए है। अरविंद शर्मा ने भी गैर जाट मतदाताओं को लुभाने के लिए एक नया फॉर्मूला चला है। उन्होंने कहा है सभी जातियों को 20-20 प्रतिशत सीटें देने वाले दलों के साथ गठबंधन करने में उन्हें कोई परहेज नहीं है और हजकां प्रमुख ने उनकी इस बात पर सहमति जता दी है।
गैर जाट मतदाता बहुल सीटें
रोहतक, सोनीपत, सिरसा, हिसार, गुड़गांव, थानेसर, करनाल, असंध, पानीपत शहर, रतिया, कलांवली, डबवाली, कालका, पंचकूला, नारायणगढ़, अंबाला कैंट, अंबाला शहर, मुलाना, यमुना नगर, नीलोखेड़ी, इंद्री, समालखा, भिवानी, होडल, सोहना, पृथला, अटेली, महेंद्रगढ़, नांगल चौधरी, नारनौल, बावल, कोसली, रेवाड़ी, पटौदी, बादशाहपुर, तिगांव, साढौरा, जगाधरी, रादौर, बवानीखेड़ा, पलवल, फरीदाबाद, फरीदबाद एनआईटी, बढ़खल, वल्लभगढ़, नूंह, फिरोजपुर झिरका, पुन्हाना, हथीन। (इन सीटों पर ब्राम्हण, दलित, सिख, पंजाबी, अहीर, यादव और मुसलिम शामिल हैं)