विस चुनावः तीनों ‘लाल’ के बिना होगी चुनावी जंग
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हरियाणा विधानसभा चुनाव में यह पहला मौका है जब सूबे की चुनावी जंग बिना ‘लालों’ की होगी। एक समय था जब हरियाणा की सियासत की धूरी हरियाणा के तीन ‘लाल’ बंसीलाल, चौधरी देवीलाल और भजनलाल के इर्द गिर्द घूमती थी।
लगभग तीन दशक तक हरियाणा की सियासी डोर इन्हीं ‘लालों’ के पास रहीं। देशभर में कहा भी जाता था कि हरियाणा के तीन लाल- बंसी, देवी और भजनलाल। बीते विधानसभा चुनाव में भी हरियाणा जनहित कांग्रेस की कमान भजनलाल के हाथ में थी।
तीनों महारथियों का सियासी सफर
प्रदेश की सियासत में पहले ‘लाल’ बंसी लाल थे। जिन्होंने 1968 में तीसरे मुख्यमंत्री के तौर पर प्रदेश की कमान संभाली। पहले कांग्रेस और फिर हरियाणा विकास पार्टी के बैनर तले चार बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और अलग-अलग समय पर लगभग 12 साल तक राज किया। उनके बाद आए ‘लालों’ में देवीलाल और फिर भजनलाल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।
खास बात यह है कि कांग्रेस से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करने वाले ये तीनों ‘लाल’ आखिर में उसे अलविदा कह गए। बंसीलाल को हरियाणा विकास पार्टी, चौधरी देवीलाल को कई दल बनाने के बाद अंत में इंडियन नेशनल लोकदल और भजनलाल को हरियाणा जनहित कांग्रेस बनानी पड़ी।
भजनलाल जनता पार्टी सरकार के मुख्यमंत्री थे और पूरी सरकार के साथ दलबदल कर कांग्रेस में शामिल हो गए। इस तरह जनता पार्टी सरकार रातोंरात कांग्रेस सरकार में बदल गई थी। इसीलिए आयाराम गयाराम की राजनीति को बढ़ाने के लिए उन्हें जिम्मेदार माना जाता है।
आज तक कोई न कोई लाल मैदान में रहा
एक नवंबर 1966 को पंजाब से अलग होने के बाद विधानसभा के अब तक हुए सभी चुनावों में इनमें से एक न एक ‘लाल’ चुनाव मैदान में उपस्थित दर्ज करता रहा है। चार बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे बंसीलाल 1967 के पहले चुनाव में ही विधानसभा पहुंच गए थे। इसके एक साल बाद के उपचुनाव जीतकर भजनलाल ने भी विधानसभा में दस्तक दे दी।
चौधरी देवीलाल ने 1971 में पहली बार सिरसा से विधानसभा में पहुंचे। हालांकि मुख्यमंत्री का ताज पहले देवीलाल के सर पर आया था। बंसीलाल और देवीलाल दोनों ही जाट सुमदाय से थे। जबकि बिश्नोई समाज से ताल्लुक रखने वाले भजनलाल ने हरियाणा में गैर जाट समुदायों को गोलबंद किया।
तीन बार मुख्यमंत्री बने बंसीलाल
बंसीलाल तो 1968 में तीसरे मुख्यमंत्री बनने के बाद ही प्रदेश में बड़ी राजनीतिक हस्ती बन चुके थे। इमरजेंसी के दौर में भी वे मुख्यमंत्री थे और उन्हें तब की प्रधानमंत्री इंदिरागांधी और संजय गांधी के करीबी लोगों में गिना जाता था।
भजनलाल को प्रदेश में आयाराम-गयाराम की राजनीतक को बढ़ावा देने के लिए माना जाता रहा है। जबकि प्रदेश में गैर कांग्रेस राजनीति को जमाने का श्रेय देवीलाल को जाता है। तीनों ही लाल केंद्र में भी असरदार मंत्री रहे। देवीलाल देश के उप प्रधानमंत्री भी रहे।
एक ही दिन में तीन बार दलबदल का रिकार्ड
हसनपुर सुरक्षित क्षेत्र से कांग्रेस विधायक गया लाल ने 1967 में एक ही दिन में तीन बार दलबदल कर नया रिकार्ड बनाने के साथ ही भारतीय राजनीति के इतिहास में ‘आयाराम-गयाराम’ राजनीति की कहावत शुरू करा दी। गया लाल ने दलबदल कर यूनाइटेड फ्रंट ज्वाइन कर दिया।
तब के कांग्रेस नेता राव बीरेंद्र सिंह उन्हें मनाकर कांग्रेस में वापस ले आए। इसके बाद वे गयालाल के साथ चंडीगढ़ में मीडिया से मिले और कहा कि गयाराम अब आयाराम है। हालांकि उसके बाद गयालाल फिर से यूनाइटेड फ्रंट में चले गए। इसके बाद तो देशभर में दलबदल के लिए आयाराम-गयाराम का जुमला चलने लगा।
जब भजनलाल ने किया सरकार के साथ दलबदल
हरियाणा के एक ‘लाल’ भजनलाल ने ‘आयाराम गयाराम’ की संस्कृति का परवान चढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उन्होंने 1980 में जनता पार्टी सरकार को रातों रात कांग्रेस सरकार में बदल कर ‘आयाराम गयाराम’ की इस कहावत पर भी मुहर लगा दी। तब जनता पार्यी के विघटन के बाद केंद्र में इंदिरा गांधी की सरकार बन गई थी।
भजनलाल तब जनता पार्टी सरकार के मुख्यमंत्री थे। इंदिरा गाधी ने सत्ता में लौटने के बाद जनता पार्टी शासित कई राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया था। इस पर भजनलाल ने 22 जनवरी 1980 को रातों रात पूरी सरकार के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए थे।