किसान आंदोलन: कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब से बुलंद आवाज को हरियाणा और यूपी ने दी धार
कृषि कानून वापसी के फैसले से हरियाणा में भाजपा निकाय और पंचायत चुनाव में मजबूती के साथ ताल ठोक सकेगी। इस निर्णय को पार्टी अपने पक्ष में भुनाने की तैयारी कर रही है। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बड़े निर्णय के रूप में जनता को गिनाया जाएगा।
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तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब से बुलंद हुई आवाज को हरियाणा और उत्तर प्रदेश ने धार देने का काम किया। पंजाब से दिल्ली की ओर चली जत्थेबंदियों को पड़ोसी राज्य के किसानों का हर मोर्चे पर साथ मिला। किसान नेताओं के रिश्तों में भले खटास आई, लेकिन मकसद से नहीं भटके। दिल्ली बार्डर पर धरना देने पहुंचे पंजाब के किसानों को राजनीतिक दलों व किसान संगठनों ने किसी भी मौके पर पीठ नहीं दिखाई। किसानों को कमतर आंकने से भाजपा के लिए स्थिति असहज होती चली गई। वहीं पंजाब-हरियाणा में नेताओं ने आंदोलनकारियों का बड़ा विरोध भी झेला।
आंदोलन कमजोर पड़ने लगा तो राकेश टिकैत के आंसुओं ने फिर से किसानों में नया जोश भर दिया। टिकैत ने हरियाणा और पंजाब में बड़ी रैलियां कर आंदोलनकारियों को आगे बढ़ने की दिशा दी। गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने भी प्रदेश में कोई कसर नहीं छोड़ी। संयुक्त किसान मोर्चा के साथ उन्होंने मंच साझा करने के अलावा अपने दम पर भी हरियाणा के साथ ही अन्य राज्यों में आंदोलन का विस्तार करने में अहम भूमिका निभाई।
किसान आंदोलन की नींव बीते वर्ष अगस्त में पड़ी। पंजाब विधानसभा के मानसून सत्र में सरकार ने तीनों कृषि अध्यादेशों के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर इन्हें लागू न करने का निर्णय लिया, जिससे हरियाणा में भी सियासत चरम पर पहुंच गई। किसानों के समर्थन में कांग्रेस, इनेलो व कुछ निर्दलीय विधायक खुलकर आ गए। खापों का भरपूर साथ मिला। जिससे आंदोलन थमने के बजाय बढ़ता गया।
वहीं कानून वापसी से हरियाणा में भाजपा निकाय और पंचायत चुनाव में मजबूती के साथ ताल ठोक सकेगी। इस निर्णय को पार्टी अपने पक्ष में भुनाने की तैयारी कर रही है। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बड़े निर्णय के रूप में जनता को गिनाया जाएगा। बीते एक साल से पार्टी नेताओं के लिए स्थिति असहज हो गई थी। किसानों को कमतर आंकना भाजपा को भारी पड़ा। किसानों के उग्र विरोध व हिंसात्मक रुख का दिग्गज नेताओं ने जगह-जगह सामना किया। आंदोलनकारी भाजपा के मंत्रियों, विधायकों, सांसदों व अन्य नेताओं से सीधे भिड़ने और वाहनों इत्यादि को क्षति पहुंचाने में भी पीछे नहीं रहे। पार्टी की आंतरिक बैठकों में अनेक बार किसान आंदोलन को खत्म कराने का मुद्दा वरिष्ठ नेताओं ने मजबूती के साथ उठाया।
आंदोलन को लंबा खींचकर खत्म कराने की सरकार की रणनीति धराशायी हो चुकी थी। किसान लगभग 700 साथियों की जान जाने पर भी टस से मस नहीं हुए। धरातल पर स्थिति बिल्कुल भिन्न थीं, इसलिए भाजपा के रणनीतिकार फैसले को अमलीजामा नहीं पहनवा पाए। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व लंबे समय तक हरियाणा के किसानों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहता था। इसलिए जमीनी हकीकत के बारे में लगातार फीडबैक जुटाया गया। बरौदा, ऐलनाबाद उपचुनाव में लगातार दो हार झेल चुकी भाजपा के लिए स्थिति विकट होने लगी थी। जजपा नेता भी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह व भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से लगातार किसान आंदोलन खत्म कराने की मांग करते आ रहे थे।
पंजाब में हर तीसरा किसान गरीबी रेखा से नीचे
पंजाब के किसान की छवि भले अमीर होने की बना दी गई हो, लेकिन कृषि विशेषज्ञों के अनुसार हर तीसरा किसान गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहा है। पंजाब के 96 फीसदी किसान गरीब हैं, जबकि अमीर किसान सिर्फ 4 फीसदी हैं। छोटे और मंझोले किसान तनाव में ही रहते हैं। बावजूद इसके पंजाब के किसानों ने दिल्ली बार्डर पर आंदोलन को बड़ी मजबूत से चलाया और दिन-रात डटे रहे। उन्होंने कानून वापस होने पर ही घर वापसी का पक्का इरादा कर लिया था।