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क्या हरियाणा फिर बनेगा गैस चैंबर?: धुएं में घुलने लगी खुशियों की रोशनी...धीरे-धीरे बढ़ने लगा प्रदूषण; हवा खराब
Sun, 19 Oct 2025 11:33 AM IST
शाहरुख खान
आशीष वर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
आशीष वर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: शाहरुख खान
Updated Sun, 19 Oct 2025 11:33 AM IST
सार
दिवाली से पहले हरियाणा के आठ शहरों की वायु गुणवत्ता खराब श्रेणी में पहुंच गई है। हरियाणा के एनसीआर में आने वाले जिलों में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए ग्रैप का पहला चरण लागू हो गया है।
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Haryana Air Pollution
- फोटो : PTI
विस्तार
मानसून की विदाई और धान की कटाई के साथ हर साल हरियाणा की फिजा में प्रदूषण घुलने लगता है। प्रदेश के कई इलाके गंभीर रूप से वायु प्रदूषण की चपेट में आ जाते हैं। दीपावली के बाद प्रदेश के अधिकतर इलाकों का वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई ) अचानक बहुत खराब यानी रेड जोन (एक्यूआई 300-400) में पहुंच जाता है।
इसका बड़ा कारण दीपावली पर चलने वाली आतिशबाजी, त्योहार की आड़ में धड़ल्ले से पराली जलाना, त्योहार के चलते ट्रैफिक जाम और मौसम में आया बदलाव होता है। बीते कई वर्षों से देखा जा रहा है कि दीपावली से शुरू वायु प्रदूषण कई दिनों तक स्थिर रहता है। हालांकि हरियाणा सरकार ने मजबूती से दावा करते हुए कहा है कि वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार कारकों पर कदम उठाए जा रहे हैं।
पराली जलाने से रोकने के लिए विशेष अभियान चलाया गया है। विंटर एक्शन प्लान के तहत भी शहरों में कदम उठाए जा रहे हैं। पटाखों पर भी नजर रखने की बात कही जा रही है मगर विभाग के इस आदेश का अनुपालन करना इतना आसान नहीं है।
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वायु प्रदूषण का असर न सिर्फ स्वास्थ्य पर पड़ता है बल्कि बच्चों की पढ़ाई भी अब बाधित होने लगी है। मजबूरी में स्कूल प्रशासन को कई दिनों तक स्कूलों को बंद रखना पड़ता है। दीपावली नजदीक आते ही लोगों की फिर से चिंताए बढ़ने लगी कि कहीं इस बार भी दिवाली के अगले दिन हरियाणा गैस चेंबर न बन जाए।
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इसका बड़ा कारण दीपावली पर चलने वाली आतिशबाजी, त्योहार की आड़ में धड़ल्ले से पराली जलाना, त्योहार के चलते ट्रैफिक जाम और मौसम में आया बदलाव होता है। बीते कई वर्षों से देखा जा रहा है कि दीपावली से शुरू वायु प्रदूषण कई दिनों तक स्थिर रहता है। हालांकि हरियाणा सरकार ने मजबूती से दावा करते हुए कहा है कि वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार कारकों पर कदम उठाए जा रहे हैं।
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पराली जलाने से रोकने के लिए विशेष अभियान चलाया गया है। विंटर एक्शन प्लान के तहत भी शहरों में कदम उठाए जा रहे हैं। पटाखों पर भी नजर रखने की बात कही जा रही है मगर विभाग के इस आदेश का अनुपालन करना इतना आसान नहीं है।
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वायु प्रदूषण का असर न सिर्फ स्वास्थ्य पर पड़ता है बल्कि बच्चों की पढ़ाई भी अब बाधित होने लगी है। मजबूरी में स्कूल प्रशासन को कई दिनों तक स्कूलों को बंद रखना पड़ता है। दीपावली नजदीक आते ही लोगों की फिर से चिंताए बढ़ने लगी कि कहीं इस बार भी दिवाली के अगले दिन हरियाणा गैस चेंबर न बन जाए।
हरियाणा में धीरे-धीरे बढ़ने लगा वायु प्रदूषण
दिवाली से पहले हरियाणा के आठ शहरों की वायु गुणवत्ता खराब श्रेणी में पहुंच गई है। हरियाणा के एनसीआर में आने वाले जिलों में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए ग्रैप का पहला चरण लागू हो गया है। यह स्थिति तब है जब राज्य सरकार का दावा है कि पराली जलाने की घटनाएं नियंत्रण में हैं और आतिशबाजी भी पूरी तरह से शुरू नहीं हुई है। जिस तरह से वायु प्रदूषण में बढ़ोतरी हो रही है आगे की स्थिति और खराब होती दिख रही है।
दिवाली से पहले हरियाणा के आठ शहरों की वायु गुणवत्ता खराब श्रेणी में पहुंच गई है। हरियाणा के एनसीआर में आने वाले जिलों में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए ग्रैप का पहला चरण लागू हो गया है। यह स्थिति तब है जब राज्य सरकार का दावा है कि पराली जलाने की घटनाएं नियंत्रण में हैं और आतिशबाजी भी पूरी तरह से शुरू नहीं हुई है। जिस तरह से वायु प्रदूषण में बढ़ोतरी हो रही है आगे की स्थिति और खराब होती दिख रही है।
पूर्वानुमान के अनुसार चंद रोज में हरियाणा के कई शहरों की हवा बेहद खराब स्तर पर पहुंच सकती है। यदि इसी तरह के हालात आगे भी जारी रहे तो पाबांदियां बढ़ाई जा सकती हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के बुलेटिन के मुताबिक बहादुरगढ़ में एक्यूआई (वायु गुणवत्ता सूचकांक) 213, बल्लभगढ़ में 254, धारूखेड़ा में 239, फतेहाबाद में 224, गुरुग्राम में 266, मानेसर में 278, पानीपत में 242, रोहतक में 287 एक्यूआई दर्ज किया गया है।
यदि बीते सप्ताह के पहले के आंकड़ों को देखेंगे तो 17 अक्तूबर को गुरुग्राम में अब तक का सबसे ज्यादा एक्यूआई दर्ज किया गया है। एक हफ्ते पहले यानी दस अक्तूबर को एक्यूआई 162 दर्ज किया गया था। फतेहाबाद व अन्य शहरों में पिछले दिनों के मुकाबले अधिक एक्यूआई दर्ज किया गया है। यह ट्रेंड दिखाता है कि अगले कुछ दिनों में इन शहरों की वायु गुणवत्ता बहुत खराब (301-400) श्रेणी में पहुंच सकता है। इससे पर्यावरण प्रेमियों के साथ प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की चिंताएं बढ़ गई हैं।
दिवाली के अगले दिन बढ़ जाता है वायु प्रदूषण
हरियाणा का बीते छह साल का ट्रेंड देखें तो दिवाली के अगले दिन रिकॉर्ड तोड़ वायु प्रदूषण दर्ज किया जाता रहा है। पिछले साल हरियाणा के एनसीआर में आने वाले जिलों में प्रतिबंध के बावजूद खूब पटाखे चलाए गए। छुट्टियां होने के कारण पराली भी अन्य दिनों के मुकाबले अधिक जली। नतीजन कुछ शहरों का एक्यूआई 300 को पार कर गया।
हरियाणा का बीते छह साल का ट्रेंड देखें तो दिवाली के अगले दिन रिकॉर्ड तोड़ वायु प्रदूषण दर्ज किया जाता रहा है। पिछले साल हरियाणा के एनसीआर में आने वाले जिलों में प्रतिबंध के बावजूद खूब पटाखे चलाए गए। छुट्टियां होने के कारण पराली भी अन्य दिनों के मुकाबले अधिक जली। नतीजन कुछ शहरों का एक्यूआई 300 को पार कर गया।
अंबाला में एक्यूआई 367 दर्ज किया गया जो पूरे देश में सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर था। हालांकि पिछले साल दीपावली पर वायु प्रदूषण छह साल में सबसे कम दर्ज किया गया था। दरअसल पिछले साल हवा की गति अच्छी थी और सर्दी भी कम पड़ रही थी। मगर ध्यान देने वाली बात है कि दिवाली के अगले दिन अन्य दिनों के मुकाबले अधिक वायु प्रदूषण दर्ज किया गया था।
दिवाली के अगले दिन सबसे प्रदूषित शहर
| वर्ष | शहर | एक्यूआई |
|---|---|---|
| 2024 | अंबाला | 367 |
| 2023 | रोहतक | 383 |
| 2022 | धारूखेड़ा | 318 |
| 2021 | जींद | 462 |
| 2020 | गुरुग्राम | 456 |
| 2019 | गुरुग्राम | 394 |
इन कारणों से बढ़ता है वायु प्रदूषण
पराली : दीपावली पर पराली जलाने की घटनाएं अचानक से बढ़ जाती हैं। छुट्टी होने के कारण अफसर व कर्मचारी भी त्योहार मनाने में मशगूल रहते हैं। इसी आड़ में किसान पराली को धड़ल्ले से जला देते हैं।
पराली : दीपावली पर पराली जलाने की घटनाएं अचानक से बढ़ जाती हैं। छुट्टी होने के कारण अफसर व कर्मचारी भी त्योहार मनाने में मशगूल रहते हैं। इसी आड़ में किसान पराली को धड़ल्ले से जला देते हैं।
मौसम : मानसून की विदाई के बाद हवा की गति भी प्रभावित होती है। हवा की गति धीमी पड़ जाने से प्रदूषण के कण एक जगह ही जमा रहते हैं। इस मौसम बारिश भी नाम मात्र की होती है। मानसून के दौरान बारिश काफी अधिक होती जिससे प्रदूषण के करण बारिश में घुल जाते हैं।
आतिशबाजी : पटाखों से पीएम 2.5 की मात्रा अधिक होती है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की एक रिपोर्ट बताती है कि दिवाली के दौरान पीएम 2.5 कणों की सांद्रता बढ़ती है। हालांकि सभी पटाखों में पीएम 2.5 कण उत्पन्न नहीं होते, मगर बड़े पटाखों में इनकी सांद्रता अधिक होती है।
ट्रैफिक : दिवाली के दौरान वाहनों की आवाजाही बढ़ जाती है। लोग उपहार खरीदने, परिवार व मित्रों से मिलने जाते हैं। वाहनों से निकलने वाले धुएं के अलावा टायर जब सड़कों पर रगड़ते हैं तो इससे भी प्रदूषण के कण निकलते हैं।
ये भी हैं कारण : इसके अलावा सड़कों व निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल, कारखानों का उत्सर्जन और सर्दियों में कूड़ा-करकट के साथ सूखी पत्तियों को जलाने का काम शुरू कर दिया जाता है।
हरियाणा सरकार ऐसे नियंत्रित कर रही है वायु प्रदूषण
- पराली पर निगरानी के लिए पराली प्रोटेक्शन फोर्स बनाई गई है जिसमें पुलिस, कृषि और राजस्व अधिकारी शामिल हैं। यह दल उपग्रह निगरानी और मोबाइल एप के जरिये गांव-गांव पराली जलाने की निगरानी कर रहा है।
- 500 वर्गमीटर से बड़े निर्माण प्रोजेक्ट्स को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के डस्ट पोर्टल पर पंजीकरण करना अनिवार्य है। सीसीटीवी व लो-कॉस्ट सेंसर्स लगाना होगा। हर 15 दिन में सेल्फ-ऑडिट रिपोर्ट जमा करनी होगी। नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माना और साइट बंद करने की कार्रवाई होगी।
- सड़कों की सफाई के लिए मशीनों की संख्या बढ़ाई जा रही है। 29 नई रोड स्वीपिंग मशीनें खरीदने की तैयारी है।
- जिला अधिकारियों को कूड़ा करकट में आग जलाने से रोकने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही जिन इलाकों में धूल ज्यादा है, वहां पानी के छिड़काव का सुझाव दिया गया है।
- ग्रीन पटाखों जलाने की अनुमति दी गई है। इसके साथ ही आनलाइन पटाखों पर बिक्री की रोक भी लगाई गई है।
इस बार हालात बेहतर, मगर ग्रीन पटाखे प्रदूषण मुक्त नहीं : विशेषज्ञ
वायु प्रदूषण के मामलों के जानकार व पीजीआई के सामुदायिक चिकित्सा विभाग के पर्यावरण स्वास्थ्य विभाग के प्रोफेसर डॉ. रवींद्र खैवाल ने बताया कि इस बार स्थिति थोड़ी बेहतर है। इस बार सभी हितधारक वायु प्रदूषण को रोकने के लिए मजबूती से कदम उठा रहे हैं। सरकार, किसान, उद्योग और नागरिक, सभी की इसमें अहम भूमिका है।
वायु प्रदूषण के मामलों के जानकार व पीजीआई के सामुदायिक चिकित्सा विभाग के पर्यावरण स्वास्थ्य विभाग के प्रोफेसर डॉ. रवींद्र खैवाल ने बताया कि इस बार स्थिति थोड़ी बेहतर है। इस बार सभी हितधारक वायु प्रदूषण को रोकने के लिए मजबूती से कदम उठा रहे हैं। सरकार, किसान, उद्योग और नागरिक, सभी की इसमें अहम भूमिका है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, कृषि विभाग और विभिन्न एजेंसियां फसल अवशेषों के प्रबंधन, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण और वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए पहले से ही कदम उठा रही हैं। वहीं, हरियाणा में शुरुआती दौर में वायु गुणवत्ता में मिला-जुला रुख देखने को मिला है।
कुल मिलाकर राज्य का वायु गुणवत्ता सूचकांक अच्छे से खराब के बीच रहा, जो शहरी क्षेत्रों में स्थानीय प्रदूषण के बढ़ने का संकेत देता है, जबकि कई ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्र अपेक्षाकृत स्वच्छ हवा में सांस ले रहे हैं। मुझे लगता है कि हरियाणा इस बार गैस चैंबर नहीं बनेगा, लेकिन हम सभी को जिम्मेदारी से काम करने की जरूरत है।
प्रोफेसर खैवाल बताते हैं कि हरित पटाखे सामान्य पटाखों की तुलना में पर्यावरण के लिए कम हानिकारक माने जाते हैं। इनमें बेरियम नाइट्रेट जैसी जहरीली धातुएं नहीं होती और ये 30 फीसदी तक कम धुआं व गैस उत्सर्जित करते हैं।
इनकी आवाज भी 110-125 डेसिबल तक सीमित रहती है जिससे शोर प्रदूषण घटता है। सीएसआईआर-नीरी द्वारा विकसित ये पटाखे स्वास, स्टार और सफल श्रेणियों में आते हैं। ये पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त नहीं, पर सामान्य पटाखों से काफी बेहतर विकल्प हैं।
दिवाली का त्योहार जल्दी इसलिए थोड़ी राहत, ग्रीन पटाखे ज्यादा फोड़े तो बढ़ेगा प्रदूषण : विशेषज्ञ
पर्यावरण विशेषज्ञ सुनील दहिया ने बताया कि वायु गुणवत्ता के लिए एकमात्र राहत की बात यह है कि इस साल दिवाली अक्तूबर में पिछले वर्षों के मुकाबले जल्दी पड़ रही है। इस दौरान मौसम संबंधी स्थितियां बेहतर रहती है। हवा की गति ठीक-ठाक होती है।
पर्यावरण विशेषज्ञ सुनील दहिया ने बताया कि वायु गुणवत्ता के लिए एकमात्र राहत की बात यह है कि इस साल दिवाली अक्तूबर में पिछले वर्षों के मुकाबले जल्दी पड़ रही है। इस दौरान मौसम संबंधी स्थितियां बेहतर रहती है। हवा की गति ठीक-ठाक होती है।
इससे प्रदूषकों के कण एक जगह इकट्ठे नहीं होते। प्रदूषण के लिए पटाखे ही नहीं दूसरे भी कई कारक होते हैं। पराली भी एक कारक है। यदि कम पराली जलेगी तो यह भी बात सही है कि प्रदूषण कम होगा। डीजल वाले वाहन भी प्रदूषण का सबसे बड़े कारकों में शामिल हैं।
वहीं, हरित पटाखों के निर्माण और उन्हें चलाने की अनुमति देना मूल रूप से त्योहार के समय प्रदूषण के उत्सर्जन में बढ़ोतरी को वैध करार देना है। एक ग्रीन पटाखा पुराने पटाखों के मुकाबले 30 प्रतिशत कम प्रदूषण पैदा कर सकता है लेकिन ज्यादा पटाखे जलाने के चलते यह मामूली फायदा पूरी तरह से खत्म हो जाएगा। नतीजतन उत्सर्जन में वृद्धि होने के आसार बढ़ेंगे जिससे यह कदम उल्टा साबित होने वाला है।
पटाखे तो सिर्फ एक दिन चलते हैं : विक्रेता
हरियाणा पटाखा एसोसिएशन के राज्य उप प्रधान और पटाखा कारोबारी सुभाष कालड़ा ने बताया कि प्रदूषण के लिए सिर्फ आतिशबाजी को जिम्मेदार नहीं ठहराया नहीं जा सकता। पटाखे तो सिर्फ ही एक दिन जलाए जाते हैं। उन्होंने बताया कि हरियाणा में मुख्य रूप से रोहतक, झज्जर, करनाल, हिसार आदि शहरों में पटाखों का निर्माण करने वाली फैक्टरियां हैं। सामान्य पटाखों की तुलना में ग्रीन पटाखों से 30 से 35 प्रतिशत तक कम प्रदूषण होता है।
हरियाणा पटाखा एसोसिएशन के राज्य उप प्रधान और पटाखा कारोबारी सुभाष कालड़ा ने बताया कि प्रदूषण के लिए सिर्फ आतिशबाजी को जिम्मेदार नहीं ठहराया नहीं जा सकता। पटाखे तो सिर्फ ही एक दिन जलाए जाते हैं। उन्होंने बताया कि हरियाणा में मुख्य रूप से रोहतक, झज्जर, करनाल, हिसार आदि शहरों में पटाखों का निर्माण करने वाली फैक्टरियां हैं। सामान्य पटाखों की तुलना में ग्रीन पटाखों से 30 से 35 प्रतिशत तक कम प्रदूषण होता है।
ग्रीन पटाखों के उत्पादन के दाैरान उसमें जियोलाइट नामक केमिकल का मिश्रण होता है। जब पटाखे को जलाया जाता है तो इस केमिकल के कारण तुरंत ही यह धुंआ बनने के बजाय भाप के रूप में परिवर्तित हो जाता है। इस कारण वातावरण में मिश्रित होने के बजाय जमीन के निचले तल पर बैठ जाता है और भाप के रूप में यह बिखरता है। ग्रीन पटाखों में नीरी (नेशनल इनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट) की तरफ से जारी पंजीकरण नंबर का लोगो लगा होता है।
वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए हरियाणा सरकार ने इस बार पहले से अधिक सख्ती की है। सरकार ने सभी जिलों में सफाई के लिए आधुनिक मशीनें तैनात की हैं ताकि धूल और कचरे से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सके। प्रत्येक जिले में पर्याप्त मैनपावर की व्यवस्था की गई है और जिला स्तर पर अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर दी गई है कि वे वायु गुणवत्ता पर लगातार निगरानी रखें। साथ ही, निर्माण स्थलों पर कवरिंग, सड़क किनारे पानी छिड़काव और कूड़ा जलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लागू किया गया है। सरकार का लक्ष्य है कि इस बार सर्दियों में प्रदूषण का स्तर पिछले वर्षों की तुलना में काफी कम रखा जाए।इस बार पराली के बेहद कम मामले इसका एक उदाहरण हैं।-प्रदीप कुमार, सदस्य सचिव राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड