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Chandigarh News: भारत-अमेरिका की तल्खी से एच-1बी वीजा धारक चिंतित, पंजाबी पेशेवर बोले- यह संकट की घड़ी
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-ट्रंप सरकार पर पहले ही वीजा धारकों के प्रति नर्मी को लेकर दवाब
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सुरिंदर पाल
जालंधर। अमेरिका व भारत में बेशक ट्रेड वार शुरू हो चुकी है लेकिन इसका सबसे अधिक असर अमेरिका में बसे भारतीय मूल के लोगों पर हो सकता है। इसे लेकर चिंता पैदा हो गई है। खासकर एच-1बी वीजा धारकों के लिए चिंता बढ़ना स्वभाविक है क्योंकि ट्रंप सरकार पर पहले से प्रेशर है कि ऐसे पेशेवरों के प्रति सरकार काफी नर्म है। पंजाबी पेशेवरों का कहना है कि यह संकट की घड़ी है।
पंजाबी मूल के लोग भारी संख्या में या तो राजनीतिक शरण पर हैं या फिर एच-1 बी वीजा पर। पहले से इमिग्रेशन नीतियों ने कानूनी अप्रवासियों के बीच भी चिंता पैदा कर दी है। सीमा पर जांच में अब केवल अवैध प्रवेश पर ही नहीं बल्कि ग्रीन-कार्ड धारकों और वीजा धारकों को उनके वक्तव्यों या ट्रैवल हिस्ट्री के आधार पर टारगेट किया जा रहा है। सार्वजनिक टिप्पणियों में कहा गया है कि ग्रीन-कार्ड धारकों को रहने का कोई गारंटीकृत अधिकार नहीं है। इसने कानूनी निवासियों के बीच व्यापक अनिश्चितता को बढ़ा दिया है। इन कदमों ने एच-1बी वीजा धारकों की बेचैनी बढ़ा दी है। लंबे समय से नौकरी और कानूनी स्थिति वाले लोग भी सख्त प्रवर्तन और अचानक बदलावों के बारे में चिंतित हैं जो अमेरिका में काम करने और रहने के उनके अधिकार को प्रभावित कर सकते हैं। ट्रंप ने यह कहकर चिंता बढ़ा दी है कि भारत अमेरिका का अच्छा साझीदार नहीं है।
अमेरिका में बसे निखिल शर्मा का कहना है कि एच-1बी वीजा के तहत कुशल पेशेवरों को अमेरिका में काम करने की अनुमति है लेकिन यह विशिष्ट शर्तों से बंधा है। पेशेवरों में यह डर है कि कानूनी निवासियों और वीजा धारकों के लिए अपनी स्थिति बनाए रखना मुश्किल बनाने वाली नीतियां एच-1बी वीजा धारकों को भी प्रभावित करेंगी जिससे अमेरिका में दीर्घकालिक योजना अधिक अनिश्चित हो जाएगी। अमेरिकी सरकार कुछ नियमों का पालन न करने पर एच-1बी वीजा रद्द कर सकती है। पंजाबी समुदाय के काफी प्रोफेशनल अमेरिका में इस वीजा पर हैं। यानी अगर तल्खी बढ़ी तो अमेरिका सख्त कदम उठा सकती है। इसको लेकर अमेरिका में काफी चिंता है। पहले से अमेरिका में टेक्नोलॉजी समेत कई दूसरे सेक्टरों की कंपनियों की ओर से विदेशी कर्मचारियों को रोज़गार देने के लिए इस्तेमाल होने वाले एच-1बी वीजा पर फिर विवाद है।
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अमेरिका की इमिग्रेशन नीतियां भारतीयों के साथ भेदभावपूर्ण
अमेरिका में कारोबारी मंजीत सिंह का कहना है कि पिछले दिनों अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि वो एच-1बी वीजा का समर्थन करते हैं इससे वीजा धारकों को राहत नजर आई थी। इससे कठोर प्रवासी नीति को लागू करने की मांग करते आए, उनके कई समर्थक नाराज हो गए थे। अब तल्खी बढ़ रही है तो ट्रंप पर प्रेशर बढ़ना स्वभाविक है। यहां तो पहले से माहौल बना है कि गैर-अमेरिकी इस वीजा पर अमेरिका आकर उनकी नौकरियां खा रहे हैं। इस समय सबसे ज्यादा एच-1बी वीजा भारतीयों के पास हैं।सर्बजीत साबी पंजाब से अमेरिका में एच-1बी वीजा पर हैं। उनका कहना है कि अमेरिका की इमिग्रेशन नीतियां भारतीयों के साथ भेदभाव करती हैं। अगर भारत से संबंध बिगड़ते चले गए तो आगे भविष्य में किसी समय भी वीजा रद्द किया जा सकता है। ज्यादातर अमेरिकियों को पता नहीं है कि नौकरी से जुड़े इमिग्रेशन के आवेदकों का चुनाव करने में अमेरिका काबिलियत की जगह इसको ज्यादा अहमियत देता है कि आप कहां पैदा हुए हैं। हर साल जारी किए जाने वाले 1,40,000 ग्रीन कार्ड में हर देश की कैप या सीमा सात फीसदी है। ऐसे में भारतीय और चीनी पेशेवरों को नुकसान होता है क्योंकि ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करने वालों में इन दो देशों के आवेदकों की संख्या बाकी देशों से आने वाले पेशेवर कामगारों से कहीं ज्यादा है। जो लोग सीधे तौर पर इससे प्रभावित हैं वो डरे हुए हैं और खुद वीजा पर हैं तो बहुत परेशान होने के बावजूद खुलकर बोलना नहीं चाहते हैं।
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सुरिंदर पाल
जालंधर। अमेरिका व भारत में बेशक ट्रेड वार शुरू हो चुकी है लेकिन इसका सबसे अधिक असर अमेरिका में बसे भारतीय मूल के लोगों पर हो सकता है। इसे लेकर चिंता पैदा हो गई है। खासकर एच-1बी वीजा धारकों के लिए चिंता बढ़ना स्वभाविक है क्योंकि ट्रंप सरकार पर पहले से प्रेशर है कि ऐसे पेशेवरों के प्रति सरकार काफी नर्म है। पंजाबी पेशेवरों का कहना है कि यह संकट की घड़ी है।
पंजाबी मूल के लोग भारी संख्या में या तो राजनीतिक शरण पर हैं या फिर एच-1 बी वीजा पर। पहले से इमिग्रेशन नीतियों ने कानूनी अप्रवासियों के बीच भी चिंता पैदा कर दी है। सीमा पर जांच में अब केवल अवैध प्रवेश पर ही नहीं बल्कि ग्रीन-कार्ड धारकों और वीजा धारकों को उनके वक्तव्यों या ट्रैवल हिस्ट्री के आधार पर टारगेट किया जा रहा है। सार्वजनिक टिप्पणियों में कहा गया है कि ग्रीन-कार्ड धारकों को रहने का कोई गारंटीकृत अधिकार नहीं है। इसने कानूनी निवासियों के बीच व्यापक अनिश्चितता को बढ़ा दिया है। इन कदमों ने एच-1बी वीजा धारकों की बेचैनी बढ़ा दी है। लंबे समय से नौकरी और कानूनी स्थिति वाले लोग भी सख्त प्रवर्तन और अचानक बदलावों के बारे में चिंतित हैं जो अमेरिका में काम करने और रहने के उनके अधिकार को प्रभावित कर सकते हैं। ट्रंप ने यह कहकर चिंता बढ़ा दी है कि भारत अमेरिका का अच्छा साझीदार नहीं है।
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अमेरिका में बसे निखिल शर्मा का कहना है कि एच-1बी वीजा के तहत कुशल पेशेवरों को अमेरिका में काम करने की अनुमति है लेकिन यह विशिष्ट शर्तों से बंधा है। पेशेवरों में यह डर है कि कानूनी निवासियों और वीजा धारकों के लिए अपनी स्थिति बनाए रखना मुश्किल बनाने वाली नीतियां एच-1बी वीजा धारकों को भी प्रभावित करेंगी जिससे अमेरिका में दीर्घकालिक योजना अधिक अनिश्चित हो जाएगी। अमेरिकी सरकार कुछ नियमों का पालन न करने पर एच-1बी वीजा रद्द कर सकती है। पंजाबी समुदाय के काफी प्रोफेशनल अमेरिका में इस वीजा पर हैं। यानी अगर तल्खी बढ़ी तो अमेरिका सख्त कदम उठा सकती है। इसको लेकर अमेरिका में काफी चिंता है। पहले से अमेरिका में टेक्नोलॉजी समेत कई दूसरे सेक्टरों की कंपनियों की ओर से विदेशी कर्मचारियों को रोज़गार देने के लिए इस्तेमाल होने वाले एच-1बी वीजा पर फिर विवाद है।
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अमेरिका की इमिग्रेशन नीतियां भारतीयों के साथ भेदभावपूर्ण
अमेरिका में कारोबारी मंजीत सिंह का कहना है कि पिछले दिनों अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि वो एच-1बी वीजा का समर्थन करते हैं इससे वीजा धारकों को राहत नजर आई थी। इससे कठोर प्रवासी नीति को लागू करने की मांग करते आए, उनके कई समर्थक नाराज हो गए थे। अब तल्खी बढ़ रही है तो ट्रंप पर प्रेशर बढ़ना स्वभाविक है। यहां तो पहले से माहौल बना है कि गैर-अमेरिकी इस वीजा पर अमेरिका आकर उनकी नौकरियां खा रहे हैं। इस समय सबसे ज्यादा एच-1बी वीजा भारतीयों के पास हैं।सर्बजीत साबी पंजाब से अमेरिका में एच-1बी वीजा पर हैं। उनका कहना है कि अमेरिका की इमिग्रेशन नीतियां भारतीयों के साथ भेदभाव करती हैं। अगर भारत से संबंध बिगड़ते चले गए तो आगे भविष्य में किसी समय भी वीजा रद्द किया जा सकता है। ज्यादातर अमेरिकियों को पता नहीं है कि नौकरी से जुड़े इमिग्रेशन के आवेदकों का चुनाव करने में अमेरिका काबिलियत की जगह इसको ज्यादा अहमियत देता है कि आप कहां पैदा हुए हैं। हर साल जारी किए जाने वाले 1,40,000 ग्रीन कार्ड में हर देश की कैप या सीमा सात फीसदी है। ऐसे में भारतीय और चीनी पेशेवरों को नुकसान होता है क्योंकि ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करने वालों में इन दो देशों के आवेदकों की संख्या बाकी देशों से आने वाले पेशेवर कामगारों से कहीं ज्यादा है। जो लोग सीधे तौर पर इससे प्रभावित हैं वो डरे हुए हैं और खुद वीजा पर हैं तो बहुत परेशान होने के बावजूद खुलकर बोलना नहीं चाहते हैं।