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Chandigarh News: अलविदा! शायरी का वो आफताब, जिसका चंडीगढ़ भी था एक हसीन ख्वाब
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चंडीगढ़। मशहूर शायर बशीर बद्र के निधन से उर्दू साहित्य जगत में गहरा शोक है। चंडीगढ़ से उनका खास जज्बाती रिश्ता रहा और यहां के साहित्यकारों ने उन्हें केवल एक बड़े शायर ही नहीं बल्कि बेहद सादगी पसंद और इंसानियत से भरे व्यक्तित्व के रूप में याद किया। शहर के साहित्यकारों का कहना है कि बशीर बद्र ने अपनी गजलों से मोहब्बत, रिश्तों और इंसानी एहसासों को नई पहचान दी। उनके जाने से शायरी के एक सुनहरे दौर का अंत हो गया।
उर्दू अकादमी हरियाणा के डायरेक्टर चंद्र त्रिखा ने कहा कि बशीर बद्र जब भी चंडीगढ़ आते थे तो पूरा माहौल उनकी शायरी से महक उठता था। उनकी आवाज और शेर सीधे दिल में उतरते थे। उन्होंने बताया कि बशीर बद्र की किताब तुम्हारे लिए का पहली बार हिंदी रूपांतरण उन्होंने ही किया था और उसकी भूमिका भी लिखी थी। त्रिखा ने कहा कि बशीर बद्र की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने गजल को महफिलों और खास तबकों से निकालकर आम आदमी तक पहुंचाया। उनकी शायरी आसान शब्दों में गहरे एहसास बयां करती थी।
उन्होंने कहा कि जदीद गजल को जो नया और खूबसूरत अंदाज बशीर बद्र ने दिया, वह विरले ही किसी दूसरे शायर ने दिया होगा। उनका मशहूर शेर लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में...आज भी लोगों की जुबान पर है।
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प्रख्यात शायर शम्श तबरेजी ने कहा कि उनका बशीर बद्र के साथ घरेलू रिश्ता था। कई मंचों पर साथ रहे और कई सफर भी किए। उन्होंने बताया कि बशीर बद्र नए और छोटे शायरों का हमेशा हौसला बढ़ाते थे। वे कहते थे कि शायरी में कठिन शब्दों से ज्यादा जरूरी सादगी और एहसास होते हैं। यही वजह रही कि उनकी गजलें हर वर्ग तक पहुंचीं। शम्श तबरेजी ने एक दिलचस्प प्रसंग साझा करते हुए कहा कि जब बशीर बद्र खुद एमए के छात्र थे तब उनकी लिखी गजलें विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही थीं। यह उनकी लोकप्रियता और साहित्यिक ऊंचाई का सबसे बड़ा प्रमाण है।
साहित्य अकादमी के राष्ट्रीय अध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा कि बशीर बद्र के निधन से उर्दू साहित्य में जो खालीपन पैदा हुआ है, उसे भरने में लंबा समय लगेगा। उन्होंने उर्दू गजल को नई भाषा, नए बिंब और नई संवेदनाएं दीं। उनकी गजलें केवल साहित्य तक सीमित नहीं रहीं बल्कि आम जनमानस की भावनाओं का हिस्सा बन गईं। साहित्यकारों ने कहा है कि बशीर बद्र भले अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी शायरी आने वाली पीढ़ियों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेगी।
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उर्दू अकादमी हरियाणा के डायरेक्टर चंद्र त्रिखा ने कहा कि बशीर बद्र जब भी चंडीगढ़ आते थे तो पूरा माहौल उनकी शायरी से महक उठता था। उनकी आवाज और शेर सीधे दिल में उतरते थे। उन्होंने बताया कि बशीर बद्र की किताब तुम्हारे लिए का पहली बार हिंदी रूपांतरण उन्होंने ही किया था और उसकी भूमिका भी लिखी थी। त्रिखा ने कहा कि बशीर बद्र की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने गजल को महफिलों और खास तबकों से निकालकर आम आदमी तक पहुंचाया। उनकी शायरी आसान शब्दों में गहरे एहसास बयां करती थी।
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उन्होंने कहा कि जदीद गजल को जो नया और खूबसूरत अंदाज बशीर बद्र ने दिया, वह विरले ही किसी दूसरे शायर ने दिया होगा। उनका मशहूर शेर लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में...आज भी लोगों की जुबान पर है।
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प्रख्यात शायर शम्श तबरेजी ने कहा कि उनका बशीर बद्र के साथ घरेलू रिश्ता था। कई मंचों पर साथ रहे और कई सफर भी किए। उन्होंने बताया कि बशीर बद्र नए और छोटे शायरों का हमेशा हौसला बढ़ाते थे। वे कहते थे कि शायरी में कठिन शब्दों से ज्यादा जरूरी सादगी और एहसास होते हैं। यही वजह रही कि उनकी गजलें हर वर्ग तक पहुंचीं। शम्श तबरेजी ने एक दिलचस्प प्रसंग साझा करते हुए कहा कि जब बशीर बद्र खुद एमए के छात्र थे तब उनकी लिखी गजलें विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही थीं। यह उनकी लोकप्रियता और साहित्यिक ऊंचाई का सबसे बड़ा प्रमाण है।
साहित्य अकादमी के राष्ट्रीय अध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा कि बशीर बद्र के निधन से उर्दू साहित्य में जो खालीपन पैदा हुआ है, उसे भरने में लंबा समय लगेगा। उन्होंने उर्दू गजल को नई भाषा, नए बिंब और नई संवेदनाएं दीं। उनकी गजलें केवल साहित्य तक सीमित नहीं रहीं बल्कि आम जनमानस की भावनाओं का हिस्सा बन गईं। साहित्यकारों ने कहा है कि बशीर बद्र भले अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी शायरी आने वाली पीढ़ियों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेगी।