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जोखिम में जान... चंडीगढ़ के ईएसआई हॉस्पिटल में व्यवस्था भगवान भरोसे, संक्रमण से कैसे बचेंगे
Sat, 19 Sep 2020 12:54 PM IST
पंचकुला ब्यूरो
अमर उजाला, चंडीगढ़
अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: पंचकुला ब्यूरो
Updated Sat, 19 Sep 2020 12:54 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Pixabay
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चंडीगढ़ में रामदरबार स्थित ईएसआई हॉस्पिटल में व्यवस्था भरोसे चल रही है। आलम यह है कि अगर किसी मरीज को ईएसआई हॉस्पिटल से अन्य अस्पताल में रेफर कराना हो तो करीब 8 महीने का समय लग रहा है। ऐसे में समझा जा सकता है कि किसी गंभीर मरीज के जिंदगी से किस तरह खिलवाड़ हो रहा है। हॉस्पिटल में अव्यवस्थाओं की भरमार है। ओपीडी में आने वाले मरीजों को डॉक्टर की बजाय गंदगी और परेशानियों से दो-चार होना पड़ रहा है।
आलम यह है कि अस्पताल की इमरजेंसी में महिला और पुरुष के लिए एक ही शौचालय की व्यवस्था की गई है। साफ-सफाई तो छोड़िए शौचालय के दरवाजे पर पोंछा लटकाए जा रहे हैं। ऐसे में इमरजेंसी में भर्ती मरीज उस दरवाजों को छूकर वहां जा रहा है। मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि कोरोना काल में सभी साफ सफाई और संक्रमण से बचने की बात कह रहे हैं। लेकिन ईएसआई हॉस्पिटल में मरीजों को इलाज की बजाय संक्रमण बांटने की व्यवस्था की गई है। इतना ही नहीं अस्पताल की समस्याओं को लेकर उच्च अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं।
ओपीडी में नहीं मिलते डॉक्टर
ओपीडी में इलाज कराने आई नीतू शर्मा ने बताया कि अस्पताल में दांतों के डॉक्टर कभी नहीं मिलते। जब भी दिखाने जाओ यही जवाब मिलता है कि कोरोना के बाद मरीज देखा जाएगा। हर बार दर्द की दवा देकर वापस कर दिया जाता है। इतना ही नहीं अगर दूसरे अस्पताल में रेफर कराकर इलाज करने की बात कहो तो फिर डॉक्टर परेशान करते हैं। अस्पताल में महिला मरीजों के लिए न तो ढंग के शौचालय की व्यवस्था नहीं इलाज कराने की।
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रेफर होने में लगता है 6 महीने
विकास नगर के सुमित कुमार शर्मा ने बताया कि उन्हें किडनी में पथरी थी। पिछले 8 महीने से वह दर्द से परेशान थे। लेकिन ईएसआई हॉस्पिटल से निजी अस्पताल में रेफर होने में उन्हें 8 महीने का समय लग गया। सुमित का कहना है कि रेफर करने में अस्पताल वाले मरीज को इतना परेशान करते हैं कि वह वहां से रेफर होने की बजाय जाकर दूसरे अस्पताल में इलाज कराने को मजबूर हो जाता है। एक ही कागज की 10 बार फोटो कॉपी मंगाई जाती है। हर बार यह कहा जाता है कि रेफर होने वाले हॉस्पिटल से डॉक्टर से सलाह लेकर आओ, वहां से यह कागज लेकर आओ जबकि उन चीजों की कोई जरूरत ही नहीं होती।
किससे कहे.. कोई सुनने वाला नहीं
वहां इलाज कराने आने वाले मरीजों का कहना है कि अस्पताल में इलाज के बजाय गड़बड़ियां ही गड़बड़ियां हैं। इसे लेकर अगर किसी उच्च अधिकारी से शिकायत करने की कोशिश की जाए तो कोई कुछ सुनने को तैयार ही नहीं होता। उसे यह कहकर भगा दिया जाता है कि अगर शिकायत की थी दोबारा यहां इलाज कराने मत आना।
मेडिकल सुपरिंटेंडेंट ने साधा मौन
हॉस्पिटल में व्याप्त अव्यवस्था को लेकर वहां की मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ संगीता माथुर पूरे मामले में मौन हैं। टेक्स्ट मैसेज के जरिये उनका पक्ष मांगा गया लेकिन उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया।
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आलम यह है कि अस्पताल की इमरजेंसी में महिला और पुरुष के लिए एक ही शौचालय की व्यवस्था की गई है। साफ-सफाई तो छोड़िए शौचालय के दरवाजे पर पोंछा लटकाए जा रहे हैं। ऐसे में इमरजेंसी में भर्ती मरीज उस दरवाजों को छूकर वहां जा रहा है। मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि कोरोना काल में सभी साफ सफाई और संक्रमण से बचने की बात कह रहे हैं। लेकिन ईएसआई हॉस्पिटल में मरीजों को इलाज की बजाय संक्रमण बांटने की व्यवस्था की गई है। इतना ही नहीं अस्पताल की समस्याओं को लेकर उच्च अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं।
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ओपीडी में नहीं मिलते डॉक्टर
ओपीडी में इलाज कराने आई नीतू शर्मा ने बताया कि अस्पताल में दांतों के डॉक्टर कभी नहीं मिलते। जब भी दिखाने जाओ यही जवाब मिलता है कि कोरोना के बाद मरीज देखा जाएगा। हर बार दर्द की दवा देकर वापस कर दिया जाता है। इतना ही नहीं अगर दूसरे अस्पताल में रेफर कराकर इलाज करने की बात कहो तो फिर डॉक्टर परेशान करते हैं। अस्पताल में महिला मरीजों के लिए न तो ढंग के शौचालय की व्यवस्था नहीं इलाज कराने की।
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रेफर होने में लगता है 6 महीने
विकास नगर के सुमित कुमार शर्मा ने बताया कि उन्हें किडनी में पथरी थी। पिछले 8 महीने से वह दर्द से परेशान थे। लेकिन ईएसआई हॉस्पिटल से निजी अस्पताल में रेफर होने में उन्हें 8 महीने का समय लग गया। सुमित का कहना है कि रेफर करने में अस्पताल वाले मरीज को इतना परेशान करते हैं कि वह वहां से रेफर होने की बजाय जाकर दूसरे अस्पताल में इलाज कराने को मजबूर हो जाता है। एक ही कागज की 10 बार फोटो कॉपी मंगाई जाती है। हर बार यह कहा जाता है कि रेफर होने वाले हॉस्पिटल से डॉक्टर से सलाह लेकर आओ, वहां से यह कागज लेकर आओ जबकि उन चीजों की कोई जरूरत ही नहीं होती।
किससे कहे.. कोई सुनने वाला नहीं
वहां इलाज कराने आने वाले मरीजों का कहना है कि अस्पताल में इलाज के बजाय गड़बड़ियां ही गड़बड़ियां हैं। इसे लेकर अगर किसी उच्च अधिकारी से शिकायत करने की कोशिश की जाए तो कोई कुछ सुनने को तैयार ही नहीं होता। उसे यह कहकर भगा दिया जाता है कि अगर शिकायत की थी दोबारा यहां इलाज कराने मत आना।
मेडिकल सुपरिंटेंडेंट ने साधा मौन
हॉस्पिटल में व्याप्त अव्यवस्था को लेकर वहां की मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ संगीता माथुर पूरे मामले में मौन हैं। टेक्स्ट मैसेज के जरिये उनका पक्ष मांगा गया लेकिन उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया।