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जीएमसीएच-32 की लापरवाही से गई बेटी की जान, 60 वर्षीय पिता ने छह साल तक लड़ी लड़ाई, मिला इंसाफ

Sat, 14 May 2022 01:54 AM IST
Panchkula Bureau पंचकुला ब्‍यूरो
Updated Sat, 14 May 2022 01:54 AM IST
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GMCH-32's daughter died due to negligence, 60-year-old father fought for six years, got justice
चंडीगढ़। जीएमसीएच-32 के डॉक्टरों की लापरवाही से 25 वर्षीय युवती की जान चली गई। युवती के 60 वर्षीय पिता ने छह साल तक अस्पताल के खिलाफ जंग लड़ी और आखिरकार अपनी बेटी को इंसाफ दिलाने में सफल रहे। राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने जीएमसीएच-32, अस्पताल के निदेशक, एमएस, इलाज करने वाले डॉक्टर, लैब इंचार्ज समेत छह को दोषी पाया है। आयोग ने कहा है कि 25 वर्षीय बेटी को खोना सबसे बड़ा दुख है। इसे पैसों में नहीं आंका जा सकता। फिर भी आयोग ने आदेश दिए हैं कि सभी दोषी शिकायतकर्ता को 20 लाख रुपये का मुआवजा देंगे।
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सेक्टर-21 निवासी राजेश कुमार (60) और उनकी पत्नी स्नेह अरोड़ा ने यूटी प्रशासक के सलाहकार, जीएमसीएच-32, जीएमसीएच-32 के डायरेक्टर प्रिंसिपल डॉ. अतुल सचदेव, मेडिकल सुपरिंटेंडेंट, जूनियर रेजिडेंट डॉ. रिचा, डॉ. सूरज, सीनियर रेजिडेंट ऑन ड्यूटी डॉ. बलदीप कौर, लैब इंचार्ज डॉ. प्रज्ञा और डॉ. अमरवीर, जीएमएसएच-16 के असिस्टेंट मलेरिया डायरेक्टर के खिलाफ शिकायत दी थी। शिकायत में बताया था कि एक सितंबर 2016 को उनकी 25 वर्षीय बेटी दिशा अरोड़ा को बुखार हो गया। चार सितंबर तक वह स्थानीय डॉक्टरों से ही इलाज कराते रहे लेकिन चार और पांच सितंबर की मध्यरात्रि को उनकी बेटी की तबीयत ज्यादा अचानक खराब हो गई। 100 डिग्री के करीब बुखार होने की वजह से वह उसे लेकर रात 1:30 बजे जीएमसीएच-32 की इमरजेंसी में पहुंचे। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि अस्पताल प्रबंधन को यह अच्छे से मालूम था कि उन दिनों डेंगू बुखार फैला हुआ है, लेकिन उन्होंने उनकी बेटी को ठीक से नहीं देखा और गलत दवाइयां दीं, जिसकी वजह से पांच सितंबर को ही उनकी बेटी की मृत्यु हो गई।
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तबीयत बिगड़ती रही, डॉक्टर को बुलाते रहे लेकिन नहीं हुई जांच
शिकायतकर्ता ने बताया कि अस्पताल में भर्ती होने के बाद दिशा की स्थिति लगातार खराब होती जा रही थी। वह काफी असहज और अंदर से बेचैन थी और वह बार-बार बेचैनी, दर्द, दम घुटने, पेट दर्द आदि की शिकायत डॉक्टर से कर रही थी। दिशा ने खुद कई बार डॉक्टरों को कहा कि उन्हें तुरंत इलाज की आवश्यकता है, क्योंकि उन्हें ठीक नहीं महसूस हो रहा। लगातार शिकायतों के बावजूद मौके पर मौजूद डॉ. रिचा ने न तो जवाब दिया और न इलाज किया। ड्यूटी पर एक सीनियर डॉक्टर भी थे लेकिन उन्होंने भी दिशा की तकलीफ को नहीं समझा और इलाज नहीं किया। उनकी बेटी इलाज के लिए तड़पती रही और दर्द से कराहती रही।
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बेटी के जाने के बाद माता-पिता के दर्द का आकलन नहीं किया जा सकता : आयोग
आयोग ने सभी पक्षों को नोटिस जारी किया और सुनवाई की। सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद आयोग ने पाया कि अस्पताल की तरफ से लापरवाही हुई है। आयोग ने प्रशासक के सलाहकार, लैब इंचार्ज डॉ. अमरवीर, जीएमएसएच-16 के असिस्टेंट मलेरिया डायरेक्टर को इस केस में दोषी नहीं पाया। अन्य के खिलाफ फैसला सुनाया। आयोग ने टिप्पणी की है कि 25 साल की बेटी की मौत के बाद उनके माता-पिता ने जो कुछ झेला, उसकी किसी भी तरह से क्षतिपूर्ति नहीं की जा सकती है। न ही दर्द, पीड़ा, हताशा और निराशा का आकलन किया जा सकता है। 25 साल की बेटी का जाना किसी भी माता-पिता के लिए सबसे बड़ा दुख है। मुआवजे की राशि पर आयोग ने कहा कि किसी भी राशि को ऐसी परिस्थितियों में मानवीय पीड़ा के बराबर नहीं किया जा सकता है।

आयोग ने जारी किए ये आदेश
आयोग ने जीएमसीएच-32 के डायरेक्टर प्रिंसिपल, मेडिकल सुपरिंटेंडेंट, जूनियर रेजिडेंट डॉ. रिचा, डॉ. सूरज, सीनियर रेजिडेंट ऑन ड्यूटी डॉ. बलदीप कौर, लैब इंचार्ज डॉ. प्रज्ञा के खिलाफ फैसला सुनाया है। कहा है कि ये सभी मिलकर शिकायतकर्ता को 20 लाख रुपये मुआवजा और मुकदमा खर्च के रूप में 50 हजार रुपये की अतिरिक्त राशि देंगे। इस आदेश का पालन 30 दिन के अंदर करना होगा नहीं तो 9 प्रतिशत ब्याज भी देना होगा।
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