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हिमाचल से निर्मल जल लाती है घग्गर नदी, हरियाणा में पहुंचते ही पानी न पीने लायक रहता है, न नहाने लायक
Thu, 25 Feb 2021 11:14 AM IST
निवेदिता वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Thu, 25 Feb 2021 11:14 AM IST
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हरियाणा में घग्गर नदी में प्रदूषण बढ़ जाता है।
- फोटो : अमर उजाला
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हिमाचल के सिरमौर से घग्गर नदी साफ और स्वच्छ जल लेकर निकलती है, लेकिन जैसे ही वह हरियाणा में प्रवेश करती है तो उसके पानी का रंग बदलने लगता है। पंचकूला में कुछ ठीक रहता है, लेकिन इसके बाद से जैसे-जैसे नदी आगे बढ़ती है तो पानी काला होता चला जाता है। इसका कारण है नदी में फ्लो बनाने के नाम पर छोड़ा जा रहा ड्रेनों का दूषित पानी। जैसे जैसे ड्रेनें घग्गर नदी में मिलती जाती हैं, वैसे वैसे ही घग्गर का पानी खराब होता चला जाता है और यह न तो नहाने के लायक रहता है और न ही पीने के।
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हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से की गई जांच में ये तथ्य सामने आए हैं। घग्गर बरसाती नदी है, पहाड़ों में जब अधिक बारिश होती है तो इसमें पानी आता है और यह हरियाणा-पंजाब से होते हुए राजस्थान तक पहुंचती है। बारिश के मौसम में कई बार ज्यादा पानी आने के कारण बाढ़ के भी हालात बन जाते हैं।
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भौगोलिक स्थिति के अनुसार, यह नदी पंचकूला से हरियाणा में प्रवेश करती है। जिसके बाद पंचकूला, अंबाला, कुरुक्षेत्र, कैथल, फतेहाबाद और सिरसा जिलों की ड्रेनों का पानी इसमें जाता है। इनमें से कई ऐसी ड्रेन हैं, जिनके पानी को बिना साफ किए ही नदी में डाला जा रहा है। जैसे जैसे ड्रेनों का पानी घग्गर में मिलता है, उसी के मुताबिक प्रदूषण का स्तर भी बढ़ जाता है। इस पानी में न केवल बीओडी (बायो आक्सीजन डिमांड) की मात्रा बढ़ जाती है बल्कि फीकल बैक्टीरिया की मात्रा भी बढ़ जाती है। ऐसे में इस पानी को किसी भी तरह से प्रयोग में नहीं लाया जा सकता है। अगर इस पानी का प्रयोग किया जाता है तो यह स्वास्थ्य के लिए काफी खतरनाक साबित हो सकता है।
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कौन सी ड्रेन मिलने के बाद कितना बढ़ता है प्रदूषण
बरती जा रही घोर लापरवाही : अरोड़ा
नदियों के पास पार्यवरण संरक्षण को लेकर काम कर रहे पंचायत विभाग से सेवानिवृत्त एसडी अरोड़ा ने बताया कि नदियों को बचाने की मुहिम को गंभीरता से लेना होगा, तभी कुछ सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं। जहां तक पानी की बात है तो फ्लो के नाम पर ड्रेनों का पानी नदियों में डालना बंद किया जाना चाहिए। इसके लिए दूसरे विकल्प तलाशने होंगे। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड केवल नोटिस देने तक सीमित है, प्रदूषण फैलाने वालों पर कड़े एक्शन लेने होंगे, साथ ही पौधरोपण को बढ़ावा देना होगा।
- ड्रेन बीओडी फीकल कॉलीफार्म (बैक्टीरिया)(एमएल में)
- मोरनी के पास 5.2 110
- कौशल्या नदी 34 130000
- एसटीपी ककराली 7.5 170
- अंबाला ड्रेन 11 140
- घेल ड्रेन समसपुर 12 130
- मारकंडा 46 170000
- डांडोता 35 110000
- चीका ड्रेन 58 230000
- सागर पारा, रसौली 39 170000
- कैथल ड्रेन, खनौरी 46 210000
- रतिया के बाद 34 96000
- जाखल के बाद 48 180000
- ऐलनाबाद के बाद 36 120000
बरती जा रही घोर लापरवाही : अरोड़ा
नदियों के पास पार्यवरण संरक्षण को लेकर काम कर रहे पंचायत विभाग से सेवानिवृत्त एसडी अरोड़ा ने बताया कि नदियों को बचाने की मुहिम को गंभीरता से लेना होगा, तभी कुछ सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं। जहां तक पानी की बात है तो फ्लो के नाम पर ड्रेनों का पानी नदियों में डालना बंद किया जाना चाहिए। इसके लिए दूसरे विकल्प तलाशने होंगे। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड केवल नोटिस देने तक सीमित है, प्रदूषण फैलाने वालों पर कड़े एक्शन लेने होंगे, साथ ही पौधरोपण को बढ़ावा देना होगा।