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नेशनल कांफ्रेंस में चंडीगढ़ पहुंचे पूर्व प्रधानमंत्री, कई मुददों पर खुलकर बोले

Sat, 10 Dec 2016 09:22 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Sat, 10 Dec 2016 09:22 AM IST
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formar prime minister manmohan singh in chandigarh for national conference
चंडीगढ़ में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह
दो दिवसीय नेशनल कांफ्रेंस में हिस्सा लेने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चंडीगढ़ पहुंचे तो यहां उन्होंने कई मुद्दों पर खुलकर विचार रखे। शिक्षा को तेज आर्थिक विकास का साधन माना जाता है। यह सामाजिक और आर्थिक बदलाव में अहम रोल निभाती है। ज्ञान और स्किल से भरपूर एक शिक्षित आबादी आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है।
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पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह इंडियन एसोसिएशन ऑफ सोशल साइंसेज इंस्टीट्यूशंस की ओर से आयोजित दो दिवसीय नेशनल कांफ्रेंस के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। जिसका विषय शिक्षा और विकास - चुनौतियां और अवसर था। डॉ. मनमोहन सिंह ने आर्थिक विकास के लिए शिक्षा की अहमियत बताने के साथ ग्रामीण इलाकों और कमजोर वर्ग के लिए शिक्षा के उपलब्ध साधनों पर चिंता जताई।
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वहीं, उच्च्च शिक्षा में टेक्स्ट बुक्स को रिवाइज करने और जर्नल्स का अनुवाद करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि 21वीं सदी में तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में ज्ञान का बोलबाला होगा, ये सर्विस इकोनॉमी होंगी। इसे देखते हुए ही यूपीए ने 2005 में नेशनल नॉलेज कमीशन गठित किया था। 2011 की मतगणना के मुताबिक हमारे देश की पचास फीसदी आबादी 25 साल से कम आयु वर्ग की थी। जिनमें 67 फीसदी ग्रामीण इलाकों में रहते हैं। ग्रामीण भारत इस समय बदलाव के दौर से गुजर रहा है। खेती में लगी वर्कफोर्स में गिरावट आ रही है।
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खेतीहर काम की तलाश में शिफ्ट हो रहे शहर में

formar prime minister manmohan singh in chandigarh for national conference
चंडीगढ़ में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह
डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि एनएसएस सर्वे के अनुसार 1999-2000 में 56.64 प्रतिशत लोग खेती में काम करते थे, जोकि 2011-12 में गिर कर 48.9 फीसदी रह गए। खेतों में काम करने वाले लोग रोजगार की तलाश में शहरों में शिफ्ट हो रहे हैं। पर सवाल यह है कि क्या ग्रामीण युवाओं को शिक्षा मिल पा रही है। उसकी क्वालिटी क्या है। कमजोर वर्ग के युवाओं को शिक्षा के जरिए ही आवश्यक स्किल्स मुहैया कराई जा सकती हैं।

शिक्षा और रोजगार के जरिए ही आम आदमी को शक्तिशाली और आर्थिक व सामाजिक बदलाव में भागीदार बनाया जा सकता है। इसी के जरिेए वे एक समझदार नागरिक के तौर पर राष्ट्रनिर्माण में सहयोग कर सकते हैं। शिक्षित समाज से धर्म, जाति आदि के बंटवारे को दूर किया जा सकता है। शिक्षित नागरिक अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में अनुशासित होते हैं, ऐसे में पुलिस की जरूरत कम पड़ेगी।

ग्रामीण स्कूलों में ढांचा बेहद जरूरी
पूर्व प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि ग्रामीण स्कूलों में बुनियादी ढांचा मुहैया कराना बेहद आवश्यक है। जिसमें क्लास रूम, टीचिंग मैटीरियल, उपकरण के साथ टीचरों की कमी को पूरा करना शामिल हैं। प्रशासकों को शिक्षा को एक गंभीर और संवेदनशील विषय समझना चाहिए। टीचरों से गैर-शैक्षणिक काम नहीं लेने चाहिए।

 

विकास हुआ, पर सबको नहीं मिला फायदा

formar prime minister manmohan singh in chandigarh for national conference
चंडीगढ़ में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह
डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि पिछले 25 सालों में देश ने काफी तरक्की की। 1990-91 में अर्थव्यवस्था 0.327 ट्रिलियन डॉलर थी, जो अब 6.3 गुना बढ़ कर 2.067 ट्रिलियन डॉलर हो गई है। साक्षरता दर 52.21 फीसदी से बढ़ कर 74.04 प्रतिशत हो गई है। पहले 45.3 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे थी, अब 21.9 फीसदी है। नवजात मृत्यु दर में भी गिरावट आई है।

लेकिन विकास का फायदा बराबर वितरित नहीं हुआ, देश में असमानता तेजी से बढ़ी है। ग्रामीण भारत में 74.5 फीसदी घरों मासिक आय पांच हजार रुपये से कम है। धन के साथ-साथ शिक्षा में भी असमानता है। कमजोर वर्ग के बच्चे जिन स्कूलों में पढ़ते हैं, वहां संसाधनों की भारी कमी है। प्राइवेट अन-एडेड इंग्लिश मीडियम स्कूल बड़ी तादाद में खुल गए हैं। पर गरीब इनकी फीस नहीं उठा सकते।

आरटीई के तहत गरीब बच्चों को आरक्षण दिया गया पर स्कूल उन्हें यह लाभ नहीं दे रहे हैं। मजबूरी में इन बच्चों को सरकारी स्कूलों की शरण लेनी पड़ती है, जहां बुनियादी ढांचा ही नहीं है। इन स्कूलों में पांचवीं के 52 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा की किताब नहीं पढ़ सकते, 74 फीसदी बच्चे गणित के आसान सवाल नहीं हल कर पाते। ग्रामीण इलाकों में ड्रॉप आउट रेशियो बहुत ज्यादा है।

उच्च शिक्षा पर ध्यान देने की जरूरत

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चंडीगढ़ में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह
डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि उच्च शिक्षा की ओर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है। एक दशक पहले उच्च शिक्षा में ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो 10-12 प्रतिशत था, जो 2014-15 में 24.3 फीसदी हो गया। जबकि, विकसित और कई विकासशील देशों में यह पचास प्रतिशत है। लोगों में उच्च शिक्षा के प्रति रुझान बढ़ रहा है। जिसके लिए सरकार को तरीके ढूंढने होंगे।

इस क्षेत्र में बड़ी तादाद में आए निजी संस्थानों ने कुछ बोझ बांटा है। आज देश में 34.21 प्रतिशत निजी विश्वविद्यालय और 77 प्रतिशत निजी कॉलेज हैं। पर इनकी मंहगी फीस गरीबों की पहुंच से बाहर है। निजी संस्थानों पर ज्यादा निर्भरता भी ठीक नहीं है। टेक्स्ट बुक ठीक ढंग से नहीं लिखी गई हैं। भारत में अच्छे स्कॉलर और साइंटिस्ट टेक्स्ट बुक नहीं लिखते। टेक्स्ट बुक को रिवाइज करने की जरूरत है। अच्छे जर्नल भारतीय भाषाओं में उपलब्ध नहीं हैं। उनका अनुवाद किया जाना चाहिए। इंटरनेट के जरिए सभी किताबें व जर्नल उपलब्ध हैं पर वे अंग्रेजी में हैं। इसलिए विद्यार्थियों की अंग्रेजी सुधारने को प्रयास होने चाहिए।

शिक्षा में क्वालिटी और क्वांटिटी के उच्च स्तर हासिल करने जरूरी हैं। इतिहास गवाह है कि जिन देशों ने शिक्षा व स्वास्थ्य में निवेश किया है, वहां आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में ज्यादा तरक्की हुई है। महिलाओं की शिक्षा पर भी विशेष ध्यान दिए जाने की जरूरत है। पचास फीसदी आबादी के मुकाबले उनकी लेबर फोर्स सिर्फ 25 फीसदी है। लेबर फोर्स में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत है। इससे पहले डॉ. रशपाल मल्होत्रा ने मेहमानों का स्वागत किया। प्रो. एसएस गिल ने कांफ्रेंस के बारे में बताया। प्रो. एसआर हाशिम ने आईएएसएसआई के बारे में जानकारी दी।
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