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Haryana Election: 58 साल में पहली बार सबसे कम चुने गए निर्दलीय, सरकार गठन में निभाते रहे हैं अहम भूमिका
Mon, 14 Oct 2024 04:35 AM IST
चंडीगढ़ ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Mon, 14 Oct 2024 04:35 AM IST
सार
निर्दलीय विधायक प्रदेश की सरकार को बाहर से समर्थन दे सकता है। यदि निर्दलीय विधायक सत्तारूढ़ दल या फिर किसी विपक्षी पार्टी में शामिल हो जाता है तो दल बदल विरोधी कानून में उस निर्दलीय विधायक की विधानसभा सदस्यता समाप्त हो सकती है।
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सावित्री जिंदल
- फोटो : फाइल
विस्तार
हरियाणा के विधानसभा चुनाव में हर बार जनता निर्दलीय विधायकों को चुनकर भेजती आई है। इन निर्दलीय विधायकों की कई बार सरकार के गठन में अहम भूमिका भी रही है।
इस बार तीन निर्दलीय विधायक चुन कर आए हैं। हिसार से सावित्री जिंदल, गन्नौर से देवेंद्र कादियान और बहादुरगढ़ से राजेश जून चुनाव जीते हैं। राज्य के 58 साल के इतिहास में यह पहली बार है कि सिर्फ तीन ही निर्दलीय विधायक चुनकर आए हैं। इन तीनों विधायकों ने भाजपा को समर्थन दे दिया है। 1967 व 1982 में चुनाव में सर्वाधिक 16-16 निर्दलीय विधायक चुनकर विधानसभा पहुंचे थे।
हाईकोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने बताया 1972 व 2000 में 11-11 निर्दलीय विधायक जीत कर आए थे। 1977, 1987, 2009 और 2019 के आम चुनावों में 7-7 निर्दलीय विधायक निर्वाचित हुए। 1996 और 2005 के विधानसभा चुनावों में 10-10 निर्दलीय विधायक बने। 1968 चुनाव में 6 निर्दलीय विधायक जीत कर विधानसभा पहुंचे थे। वहीं, 1991 और 2014 के चुनावों में 5-5 निर्दलीय विधायक सदन में पहुंचे।
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हेमंत ने बताया कि साल 1982, 2009 और 2019 में निर्दलीय विधायकों के समर्थन से ही सरकार बनी थी। उनके मुताबिक निर्दलीय विधायक प्रदेश की सरकार को बाहर से समर्थन दे सकता है। यदि निर्दलीय विधायक सत्तारूढ़ दल या फिर किसी विपक्षी पार्टी में शामिल हो जाता है तो दल बदल विरोधी कानून में उस निर्दलीय विधायक की विधानसभा सदस्यता समाप्त हो सकती है।
करीब 20 साल पहले 2004 में हरियाणा के चार तत्कालीन निर्दलीय विधायक भीम सेन मेहता, जय प्रकाश गुप्ता, राजिंदर बिसला और देव राज दीवान के कथित रूप से कांग्रेस पार्टी में शामिल होने के कारण उन्हें तत्कालीन स्पीकर सतबीर कादियान ने विधानसभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित कर दिया था, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी वर्ष 2006 में सही ठहराया था।
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इस बार तीन निर्दलीय विधायक चुन कर आए हैं। हिसार से सावित्री जिंदल, गन्नौर से देवेंद्र कादियान और बहादुरगढ़ से राजेश जून चुनाव जीते हैं। राज्य के 58 साल के इतिहास में यह पहली बार है कि सिर्फ तीन ही निर्दलीय विधायक चुनकर आए हैं। इन तीनों विधायकों ने भाजपा को समर्थन दे दिया है। 1967 व 1982 में चुनाव में सर्वाधिक 16-16 निर्दलीय विधायक चुनकर विधानसभा पहुंचे थे।
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हाईकोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने बताया 1972 व 2000 में 11-11 निर्दलीय विधायक जीत कर आए थे। 1977, 1987, 2009 और 2019 के आम चुनावों में 7-7 निर्दलीय विधायक निर्वाचित हुए। 1996 और 2005 के विधानसभा चुनावों में 10-10 निर्दलीय विधायक बने। 1968 चुनाव में 6 निर्दलीय विधायक जीत कर विधानसभा पहुंचे थे। वहीं, 1991 और 2014 के चुनावों में 5-5 निर्दलीय विधायक सदन में पहुंचे।
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हेमंत ने बताया कि साल 1982, 2009 और 2019 में निर्दलीय विधायकों के समर्थन से ही सरकार बनी थी। उनके मुताबिक निर्दलीय विधायक प्रदेश की सरकार को बाहर से समर्थन दे सकता है। यदि निर्दलीय विधायक सत्तारूढ़ दल या फिर किसी विपक्षी पार्टी में शामिल हो जाता है तो दल बदल विरोधी कानून में उस निर्दलीय विधायक की विधानसभा सदस्यता समाप्त हो सकती है।
करीब 20 साल पहले 2004 में हरियाणा के चार तत्कालीन निर्दलीय विधायक भीम सेन मेहता, जय प्रकाश गुप्ता, राजिंदर बिसला और देव राज दीवान के कथित रूप से कांग्रेस पार्टी में शामिल होने के कारण उन्हें तत्कालीन स्पीकर सतबीर कादियान ने विधानसभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित कर दिया था, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी वर्ष 2006 में सही ठहराया था।