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मनप्रीत के कांग्रेस में जाने पर कहीं खुशी तो कही विरोध
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Fri, 15 Jan 2016 10:23 PM IST
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पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब के कांग्रेस में विलय और मनप्रीत बादल के पार्टी में शामिल होने पर कहीं खुशी का माहौल है तो कहीं विरोध। सियासी विश्लेषकों का मानना है कि इससे कांग्रेस को तो बल मिला है, लेकिन मनप्रीत के भविष्य और अस्तित्व पर संकट है।
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विश्लेषकों का यह भी मानना है कि मनप्रीत के पास अब और कोई विकल्प भी नहीं बचा था। मनप्रीत बादल और उनकी पीपीपी का जनाधार खिसक चुका था। ऐसे में मनप्रीत के लिए किसी न किसी पार्टी से हाथ मिलाना जरूरी हो गया था।
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हवा का रुख भांपते हुए मनप्रीत ने पहले आम आदमी पार्टी के साथ जाने का फैसला किया था, लेकिन आप के कुछ स्थानीय नेता उन्हें लाने पर सहमत नहीं थे। इसके बाद पार्टी हाईकमान ने उन्हें शामिल न करने का फैसला किया। अकाली दल में मनप्रीत वापसी कर नहीं सकते थे।
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शिअद की गठबंधन साझीदार भाजपा के दरवाजे भी उनके लिए बंद थे। ऐसे में उनके लिए कांग्रेस ही एकमात्र विकल्प बचा था। हालांकि, अगर वह विलय के बजाय कांग्रेस से समझौता कर चुनाव लड़ते तो उनकी पार्टी का वजूद बरकरार रहता, लेकिन कांग्रेस इसके लिए तैयार नहीं होती। क्योंकि उसे पता है कि पीपीपी का जनाधार है नहीं और समझौता करने पर कांग्रेस को पीपीपी को टिकट भी देने पड़ते।
इसलिए कांग्रेस रणनीतिकारों ने विलय की योजना बनाई। माहिरों का मानना है एक पार्टी के प्रधान मनप्रीत का अस्तित्व कांग्रेस जैसे समंदर में मुश्किल है। वहीं, कांग्रेस को इससे बल मिला है। पिछले दिनों सीडी कंबोज, सुखपाल खैरा और जगतार राजला के आप में जाने से गलत संदेश जा रहा था। पीपीपी के विलय से कांग्रेस के पक्ष में मैसेज जाएगा। वहीं, कांग्रेस को मनप्रीत के रूप में एक बेहतरीन वक्ता भी मिलेगा।
खिसक चुका था पीपीपी का जनाधार
मनप्रीत बादल ने 2010 के अंत में अकाली दल छोड़ने का एलान किया था। पूरे पंजाब का दौरा करने के बाद मार्च 2011 में उन्होंने पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब का गठन किया। इसे जबरदस्त रिस्पॉन्स मिला। तीसरे विकल्प के रूप में उनकी पार्टी तेजी से उभरी, लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव में पीपीपी को एक भी सीट नहीं मिली, मनप्रीत खुद हार गए। हालांकि, पीपीपी पांच फीसदी वोट ले गई, जिसका खामियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ा। इसके बाद पीपीपी का जनाधार खिसक कर आप की तरफ चला गया। 2014 लोकसभा चुनाव में मनप्रीत कांग्रेस के टिकट पर बठिंडा से लड़े। हालांकि, उन्हें बीस हजार वोटों से हार का सामना करना पड़ा।
यूथ ब्रिगेड ने किया था विरोध
कैप्टन अमरिंदर सिंह और प्रताप बाजवा जहां मनप्रीत बादल को लाने के हक में थे। वहीं, कांग्रेस की यूथ ब्रिगेड ने सार्वजनिक तौर पर इसका विरोध किया था। यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रधान अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने सबसे पहले इसका विरोध किया। वड़िंग ने गिद्दड़बाहा हलके से पिछले चुनाव में मनप्रीत को हराया था। उसके बाद सांसद रवनीत बिट्टू ने विरोध जताया। उनका कहना था कि कई जिलों में सर्वे की रिपोर्ट उनके पास है कि लोग बादल शब्द के ही खिलाफ हैं।
कैप्टन ने किया विलय का स्वागत
प्रदेश कांग्रेस प्रधान कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पीपीपी के कांग्रेस में विलय का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि पंजाब की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, खेती संबंधी दशा को सुधारने में यह विलय मील का पत्थर साबित होगा। जब मिशन एक हो तो रास्ते अलग-अलग होने का कोई सवाल नहीं रह जाता। कैप्टन ने कहा कि मनप्रीत के साथ हमारी समान विचारधारा होने के कई आधार हैं।