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हरियाणा में 'अन्नदाता' का आंदोलनों से पुराना नाता, सरकार के हर विरोधी फैसले पर लेते हैं स्टैंड

Wed, 23 Dec 2020 10:10 AM IST
निवेदिता वर्मा यशपाल शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
यशपाल शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Wed, 23 Dec 2020 10:10 AM IST
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Farmers of Haryana always oppose government anti farmer decisions
किसान आंदोलन में धरने पर बैठे किसान। - फोटो : फाइल फोटो

नए कृषि कानूनों के खिलाफ सड़कों पर डटे अन्नदाता का आंदोलनों से पुराना नाता है। हरियाणा में कांग्रेस सरकार हो या भाजपा, किसान संगठन लंबे समय से सरकारों के विपरीत फैसलों के खिलाफ मोर्चा खोलते आ रहे हैं। वर्तमान आंदोलनों से पहले भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) हरियाणा में अनेक बार सरकार से सीधी टक्कर ले चुकी है।

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अपने इतिहास के अनुसार भाकियू इस बार भी मुखर है। भाकियू अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी अपनी कोर टीम के साथ दिल्ली बॉर्डर पर हरियाणा के किसानों की अगुवाई कर रहे हैं। आंदोलन को आगे बढ़ाने में चढूनी को पुराने साथी बाबू राम गुदियाणा, कर्म सिंह मथाना, छोटू राम मछरोली, कामरेड जोगिंदर सिंह, राकेश कुमार बैंस, बलकार सिंह रामनगर, कृष्ण कुमार, संजू गुदियाना, सत्यवान नरवाल, मलकीत सिंह, हरपाल सुढ़ल, संदीप टोपरा, मास्टर सुरजीत सिंह चीमा, गुरचरण सिंह चीमा, सुरजीत गोर्सिया व सुखविंदर भूखड़ी का पूरा साथ मिल रहा है।
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चढूनी के प्रदेश में 2000 ऐसे किसान साथी हैं जो हर आंदोलन में आगे रहते हैं। ये अनेक बार जेल भी जा चुके हैं। किसान हित में काम करना इनकी विशेष पहचान है। कुरुक्षेत्र जिले के शाहबाद ब्लॉक के चढूनी गांव के गुरनाम चढूनी खुद किसान आंदोलन में दर्जनों बार जेल जा चुके हैं।

किसान आंदोलनों की वजह से हरियाणा में हर सरकार से भाकियू चढूनी का टकराव हुआ। उन पर दर्जनों मुकदमे दर्ज हुए, 307 सहित अन्य सख्त धाराओं में भी वे मुकदमा झेल रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा सरकार में वर्ष 2013 में गन्ने के रेट को लेकर उन्होंने बड़ा आंदोलन किया, जिसमें प्रदेश भर की सभी शुगर मिल बंद रहीं। प्रदेश सरकार को किसान हित में निर्णय लेते हुए गन्ने का रेट 28 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाना पड़ा। इससे किसानों को लगभग 220 करोड़ रुपये का फायदा हुआ था।


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भाकियू चढूनी की किसानों के पक्ष में कई पीआईएल पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में विचाराधीन हैं, जिसमें प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को लेकर भी एक पीआईएल है। यूनियन एमएसपी को लेकर 2014 में हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुकी है। गुरनाम सिंह 1992 में भारतीय किसान यूनियन के गांव के प्रधान बने थे। 2004 में वे हरियाणा के प्रदेश अध्यक्ष बने। उसके बाद से अब तक अनेक बार अध्यक्ष पद पर जिम्मेदारी निभाई।

‘अब पीछे हटने का सवाल नहीं’
किसान नेताओं कर्म सिंह मथाना, छोटू राम मछरोली, कामरेड जोगिंदर सिंह व राकेश कुमार बैंस ने कहा कि नए कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन अब बहुत आगे बढ़ चुका है। अब पीछे हटने का सवाल ही नहीं। दिल्ली बॉर्डर पर हुई किसानों की मौत व्यर्थ नहीं जाने देंगे। सरकार उनकी मांगों को बिना किसी देरी के मान ले।

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