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मरकर भी जिंदा रहेगी 14 महीने की तन्नु, पिता ने किया कुछ ऐसा
ब्यूरो/अमर उजाला, करनाल(हरियाणा)
Updated Thu, 26 May 2016 12:32 PM IST
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पिता ने दान की 14 महीने की बेटी की आंखें
- फोटो : अमर उजाला
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जीते जी तो न देख सकी, मरने के बाद ही 14 महीने की तन्नु दुनिया देख सके, इसके लिए पिता ने बड़ा कदम उठाया। मामला हरियाणा के करनाल का है। पिता ने अपनी मासूम बेटी की आंखें दान कर दी, ताकि वह मरने के बाद भी दुनिया देख सके। गर्मी के कारण अचानक उल्टी दस्त हुए तो माता-पिता उसे जलमाना के एक निजी अस्पताल में ले गए, लेकिन तन्नु की इलाज के दौरान मौत हो गई। परिवार के लिए यह बड़ा सदमा था, बावजूद इसके परिवार ने अपनी नन्ही परी की आंखें दान कर दी, ताकि वह दुनिया को देख सके।
जनसेवा दल माधव नेत्र बैंक के माध्यम से यह कार्य किया गया। अब मौत के बावजूद इस बच्ची की आंखें दुनिया को देख सकेंगी। गांव जलमाना में सर्वजीत सिंह अपने परिवार के साथ रहता है और उसकी दो बेटियां थी। दसवीं कक्षा तक पढ़े व गांव में कपड़े सीलने का काम करने वाले सर्वजीत की 14 माह की तन्नु और दूसरी तीन साल की मन्नु। दो दिन पहले बच्ची की अचानक तबीयत खराब हो गई और उसे उल्टी दस्त लग गए। दवा दी गई, लेकिन आराम नहीं लगा, सोमवार को उसे एक निजी अस्पताल में दाखिल कराया गया, जहां उसकी सांसें रूक गई।
इस पर सर्वजीत ने अपनी बेटी की आंखें दान में देने का फैसला लिया और बेटी माधव नेत्र बैंक को समर्पित कर दी। उधर, मात्र 14 महीनों की इस बेटी का नेत्रदान हो रहा था तो वहां पर खड़ा हॉस्पिटल के डाक्टर और पेरामेडिकल स्टाफ ने बच्ची को झुककर सलाम किया। समाजसेवी चरणजीत बाली एवं अनु मदान ने जिस समय उस नन्ही कली के नेत्रदान लिए तो डाक्टरों के हाथ भी कांप रहे थे। हम उस नन्ही बेटी को सलाम करते हैं।
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इसलिए दान दी आंखें
सर्वजीत ने बताया कि उसकी बड़ी बेटी की आंख की पुतली खराब थी। पीजीआई चंडीगढ़ से उसका इलाज चल रहा है। बच्ची की आंखें दान करने का फैसला यहीं से मिला। उसने कहा कि मैं अपनी बेटी की आंखें किसी को दे रहा हूं, क्योंकि मैंने अपनी बड़ी बेटी की आंखें की बीमारी होने के दर्द का पता है। मुझे अंधेरे और रोशनी का पता है, मैं चाहता हूं कि मेरी बेटी की आंखों के माध्यम से कोई पूरी दुनिया देख सके। उधर, इस सेवा कार्य के अंदर चरणजीत बाली एवं अनु मदान ने जिस समय उस नन्ही कली के नेत्रदान लिए तो उनके हाथ कांप रहे थे आंखों से आंसू बह रहे थे। अपनी बेटी की तरह उन्होंने उस बेटी के नेत्रदान लिए।
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जनसेवा दल माधव नेत्र बैंक के माध्यम से यह कार्य किया गया। अब मौत के बावजूद इस बच्ची की आंखें दुनिया को देख सकेंगी। गांव जलमाना में सर्वजीत सिंह अपने परिवार के साथ रहता है और उसकी दो बेटियां थी। दसवीं कक्षा तक पढ़े व गांव में कपड़े सीलने का काम करने वाले सर्वजीत की 14 माह की तन्नु और दूसरी तीन साल की मन्नु। दो दिन पहले बच्ची की अचानक तबीयत खराब हो गई और उसे उल्टी दस्त लग गए। दवा दी गई, लेकिन आराम नहीं लगा, सोमवार को उसे एक निजी अस्पताल में दाखिल कराया गया, जहां उसकी सांसें रूक गई।
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इस पर सर्वजीत ने अपनी बेटी की आंखें दान में देने का फैसला लिया और बेटी माधव नेत्र बैंक को समर्पित कर दी। उधर, मात्र 14 महीनों की इस बेटी का नेत्रदान हो रहा था तो वहां पर खड़ा हॉस्पिटल के डाक्टर और पेरामेडिकल स्टाफ ने बच्ची को झुककर सलाम किया। समाजसेवी चरणजीत बाली एवं अनु मदान ने जिस समय उस नन्ही कली के नेत्रदान लिए तो डाक्टरों के हाथ भी कांप रहे थे। हम उस नन्ही बेटी को सलाम करते हैं।
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इसलिए दान दी आंखें
सर्वजीत ने बताया कि उसकी बड़ी बेटी की आंख की पुतली खराब थी। पीजीआई चंडीगढ़ से उसका इलाज चल रहा है। बच्ची की आंखें दान करने का फैसला यहीं से मिला। उसने कहा कि मैं अपनी बेटी की आंखें किसी को दे रहा हूं, क्योंकि मैंने अपनी बड़ी बेटी की आंखें की बीमारी होने के दर्द का पता है। मुझे अंधेरे और रोशनी का पता है, मैं चाहता हूं कि मेरी बेटी की आंखों के माध्यम से कोई पूरी दुनिया देख सके। उधर, इस सेवा कार्य के अंदर चरणजीत बाली एवं अनु मदान ने जिस समय उस नन्ही कली के नेत्रदान लिए तो उनके हाथ कांप रहे थे आंखों से आंसू बह रहे थे। अपनी बेटी की तरह उन्होंने उस बेटी के नेत्रदान लिए।