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मौत की सजा पाने वाले शख्स के भी संवैधानिक अधिकार होते हैं, नहीं छीनने देंगेः हाईकोर्ट
विवेक शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Mon, 10 Dec 2018 11:21 AM IST
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फांसी की सजा सुनाते ही दोषी को एकांत कारावास में रखने के प्रावधान को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने औपनिवेशिक मानसिकता करार देते हुए इस प्रावधान को समाप्त करने के हरियाणा सरकार को आदेश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि मौत की सजा पाने वाले के भी संवैधानिक अधिकार होते हैं और उसके मानवीय अधिकारों का हनन करने की किसी को भी अनुमति नहीं दी जा सकती है।
हरियाणा ने पंजाब के जेल मैनुअल को अपनाया है, इसलिए हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को भी इसमें संशोधन पर गौर करने के आदेश दिए हैं। याचिका पर अपना आदेश जारी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि फांसी का इंतजार करने वाले को सजा सुनाने से फांसी या बरी होने तक अकेला रखने से आखिर क्या हासिल होगा।
कोर्ट ने कहा कि सजा के बाद अपील और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं में वर्षों का समय लग जाता है और ऐसे में दिन में 23 घंटे काल कोठरी में सबसे अलग रखना न केवल अराजक, निर्दयी बल्कि क्रूर प्रावधान है। अकेले रखने की अधिकतम अवधि फांसी से पहले अधिकतम 2 से 3 दिन होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि भले ही किसी को मौत की सजा मिली हो लेकिन इस आधार पर मानवीय अधिकारों का हनन नहीं होने दिया जा सकता और ऐसे में सजा मिलने से फांसी या बरी होने तक एकांत कारावास असंवैधानिक है।
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हरियाणा ने पंजाब के जेल मैनुअल को अपनाया है, इसलिए हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को भी इसमें संशोधन पर गौर करने के आदेश दिए हैं। याचिका पर अपना आदेश जारी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि फांसी का इंतजार करने वाले को सजा सुनाने से फांसी या बरी होने तक अकेला रखने से आखिर क्या हासिल होगा।
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कोर्ट ने कहा कि सजा के बाद अपील और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं में वर्षों का समय लग जाता है और ऐसे में दिन में 23 घंटे काल कोठरी में सबसे अलग रखना न केवल अराजक, निर्दयी बल्कि क्रूर प्रावधान है। अकेले रखने की अधिकतम अवधि फांसी से पहले अधिकतम 2 से 3 दिन होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि भले ही किसी को मौत की सजा मिली हो लेकिन इस आधार पर मानवीय अधिकारों का हनन नहीं होने दिया जा सकता और ऐसे में सजा मिलने से फांसी या बरी होने तक एकांत कारावास असंवैधानिक है।
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दोषी को एकांत कारावास में भेज दिया गया था
नाबालिग से बलात्कार और बाद में उसकी हत्या के मामले में फांसी की सजा सुनाये जाने के लिए ट्रायल कोर्ट द्वारा मांगे गए रेफरेंस का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने यह आदेश जारी किए हैं। इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने गत वर्ष जनवरी में आरोपियों को दोषी करार दे फांसी की सजा सुनाई थी। जिसके तत्काल बाद ही दोषी को एकांत कारावास में भेज दिया गया था।
इस अवधि में केवल उसे आधे घंटे की प्रार्थना के लिए बाहर निकाला जाता है और किसी से मिलने नहीं दिया जाता। इस दौरान हाईकोर्ट ने सजा के खिलाफ अपील पर भी सुनवाई की और दोषी की सजा को फांसी से बदल कर 20 वर्ष के आजीवन कारावास में बदल दिया। उसे इस दौरान किसी भी किस्म की सजा माफी नहीं दिए जाने के आदेश दे दिए हैं। हालांकि मामले में दोषी को एकांत कारावास में रखेने पर हाईकोर्ट से सवाल भी उठाये हैं।
यह मामला हरियाणा का था, इसलिए हाईकोर्ट ने फिलहाल हरियाणा को इस एकांत कारावास के प्रावधान में संशोधन के आदेश दिए हैं। यह प्रावधान पंजाब जेल मैनुअल का है, जो हरियाणा में भी लागू होता है, लिहाजा हाईकोर्ट ने इस पर पंजाब सरकार को भी गौर करने को कहा है। हाईकोर्ट ने मामले में अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन द्वारा एकांत कारावास पर की गई शोध का भी हवाला दिया है।
इस अवधि में केवल उसे आधे घंटे की प्रार्थना के लिए बाहर निकाला जाता है और किसी से मिलने नहीं दिया जाता। इस दौरान हाईकोर्ट ने सजा के खिलाफ अपील पर भी सुनवाई की और दोषी की सजा को फांसी से बदल कर 20 वर्ष के आजीवन कारावास में बदल दिया। उसे इस दौरान किसी भी किस्म की सजा माफी नहीं दिए जाने के आदेश दे दिए हैं। हालांकि मामले में दोषी को एकांत कारावास में रखेने पर हाईकोर्ट से सवाल भी उठाये हैं।
यह मामला हरियाणा का था, इसलिए हाईकोर्ट ने फिलहाल हरियाणा को इस एकांत कारावास के प्रावधान में संशोधन के आदेश दिए हैं। यह प्रावधान पंजाब जेल मैनुअल का है, जो हरियाणा में भी लागू होता है, लिहाजा हाईकोर्ट ने इस पर पंजाब सरकार को भी गौर करने को कहा है। हाईकोर्ट ने मामले में अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन द्वारा एकांत कारावास पर की गई शोध का भी हवाला दिया है।