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Chandigarh News: नए सत्र से स्कूली व्यवस्था में शामिल होगी प्रारंभिक शिक्षा
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चंडीगढ़। नए सत्र से स्कूलों में शिक्षा विभाग नई शिक्षा नीति को चरणबद्ध तरीके से अपनाने जा रहा है। अब तक 3 से 6 वर्ष की आयु के बच्चों को 10+2 के स्कूली ढांचे में शामिल नहीं किया गया था पर नई व्यवस्था में बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा और संख्या ज्ञान पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इस कड़ी में 5+3+3+5 के पाठ्यक्रम का अनुसरण करते हुए स्कूलों में बाल वाटिकाएं बनाई गई हैं। तीन वर्ष की आयु में बच्चा आंगनबाड़ी, चार साल में प्री प्राइमरी और पांच साल की उम्र में बाल वाटिका में पढ़ाई करेगा।क्या है 5+3+3+4 व्यवस्था
नई शिक्षा नीति के अनुसार 6 साल की उम्र से पूर्व ही बच्चे का 85 प्रतिशत शारीरिक और मानसिक विकास हो जाता है इसलिए प्रारंभिक वर्ष बच्चे के विकास के लिए जरूरी हैं। इसी को मद्देनजर रखते हुए नए अकादमिक ढांचे में बच्चे को तीन वर्ष की आयु से शामिल किया गया है। पहले पांच वर्षों में आंगनबाड़ी से दूसरी कक्षा तक प्रारंभिक शिक्षा दी जाएगी। तीसरी से पांचवीं कक्षा तक तीन वर्ष प्रेपरेटरी, छठी से आठवीं मिडिल और नौवीं से 12वीं तक सेकेंडरी शिक्षा मिलेगी। प्रारंभिक शिक्षा का उद्देश्य बच्चों में मूलभूत साक्षरता के साथ उनके मस्तिष्क और शरीर का सर्वांगीण विकास करना है।
नई शिक्षा नीति के नए आयाम
वर्तमान में हो रहे बदलावों तकनीकीकरण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जलवायु परिवर्तन के चलते नई शिक्षा नीति को भविष्य की जरूरतों के अनुसार बनाया गया है। इसमें पढ़ाई को बहु विषयक बनाने की कोशिश की गई है जिससे बच्चे कला के साथ विज्ञान पाठ्यक्रम व अन्य गतिविधियों में बराबरी से भाग ले पाएं और अनुशासित बन सकें।
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प्रारंभिक शिक्षा और संख्या ज्ञान बनेगा शिक्षा का आधार
नई शिक्षा नीति में इस पर विशेष ध्यान दिया गया है कि बच्चे को बुनियादी शिक्षा अच्छे से मिल पाए। विद्यार्थी का आधार मजबूत होगा तो आगे की पढ़ाई में भी आसानी होगी।
लिखित पढ़ाई की जगह व्यावहारिक शिक्षा पर बल
लिखकर पढ़ाई करने के बजाय व्यावहारिक शिक्षा पर बल दिया जाएगा। विद्यार्थी की सोचने और समस्या हल करने की क्षमता को विभिन्न गतिविधियों के जरिए बढ़ाया जाएगा। इससे विद्यार्थियों पर पढ़ाई का बोझ नहीं होगा और रोचक तरीकों से पढ़ाई होगी।
कला, विज्ञान, व्यावसायिक आदि विषयों के बीच मिटेगी दूरी
कला, विज्ञान और अन्य विषयों के बीच की दूरी को समाप्त किया जाएगा। विषय चुनने में विद्यार्थी को अधिक छूट मिलेगी जिससे सामाजिक विज्ञान का विद्यार्थी विज्ञान, व्यावसायिक व अन्य विषय पढ़ सकेगा।
नियमित मूल्यांकन
साल में एक बार परीक्षा लेकर विद्यार्थियों के मूल्यांकन की नियमित रूप से पढ़ाई का मूल्यांकन होगा। नियमित मूल्यांकन से पढ़ाई में रट्टे की कोई जगह नहीं रहेगी और कोचिंग कल्चर को भी बढ़ावा नहीं मिलेगा।
तकनीक का शिक्षा में व्यापक उपयोग
विद्यार्थियों को पढ़ाने से लेकर आधिकारिक काम को तकनीक के प्रयोग से और भी सरल किया जाएगा। इससे विशेष बच्चों को सभी सुविधाएं मिल पाएंगी। स्मार्ट बोर्ड, ई-पुस्तकालय आदि से पढ़ाई के नए आयाम खुलेंगे।
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नई शिक्षा नीति के अनुसार 6 साल की उम्र से पूर्व ही बच्चे का 85 प्रतिशत शारीरिक और मानसिक विकास हो जाता है इसलिए प्रारंभिक वर्ष बच्चे के विकास के लिए जरूरी हैं। इसी को मद्देनजर रखते हुए नए अकादमिक ढांचे में बच्चे को तीन वर्ष की आयु से शामिल किया गया है। पहले पांच वर्षों में आंगनबाड़ी से दूसरी कक्षा तक प्रारंभिक शिक्षा दी जाएगी। तीसरी से पांचवीं कक्षा तक तीन वर्ष प्रेपरेटरी, छठी से आठवीं मिडिल और नौवीं से 12वीं तक सेकेंडरी शिक्षा मिलेगी। प्रारंभिक शिक्षा का उद्देश्य बच्चों में मूलभूत साक्षरता के साथ उनके मस्तिष्क और शरीर का सर्वांगीण विकास करना है।
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नई शिक्षा नीति के नए आयाम
वर्तमान में हो रहे बदलावों तकनीकीकरण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जलवायु परिवर्तन के चलते नई शिक्षा नीति को भविष्य की जरूरतों के अनुसार बनाया गया है। इसमें पढ़ाई को बहु विषयक बनाने की कोशिश की गई है जिससे बच्चे कला के साथ विज्ञान पाठ्यक्रम व अन्य गतिविधियों में बराबरी से भाग ले पाएं और अनुशासित बन सकें।
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प्रारंभिक शिक्षा और संख्या ज्ञान बनेगा शिक्षा का आधार
नई शिक्षा नीति में इस पर विशेष ध्यान दिया गया है कि बच्चे को बुनियादी शिक्षा अच्छे से मिल पाए। विद्यार्थी का आधार मजबूत होगा तो आगे की पढ़ाई में भी आसानी होगी।
लिखित पढ़ाई की जगह व्यावहारिक शिक्षा पर बल
लिखकर पढ़ाई करने के बजाय व्यावहारिक शिक्षा पर बल दिया जाएगा। विद्यार्थी की सोचने और समस्या हल करने की क्षमता को विभिन्न गतिविधियों के जरिए बढ़ाया जाएगा। इससे विद्यार्थियों पर पढ़ाई का बोझ नहीं होगा और रोचक तरीकों से पढ़ाई होगी।
कला, विज्ञान, व्यावसायिक आदि विषयों के बीच मिटेगी दूरी
कला, विज्ञान और अन्य विषयों के बीच की दूरी को समाप्त किया जाएगा। विषय चुनने में विद्यार्थी को अधिक छूट मिलेगी जिससे सामाजिक विज्ञान का विद्यार्थी विज्ञान, व्यावसायिक व अन्य विषय पढ़ सकेगा।
नियमित मूल्यांकन
साल में एक बार परीक्षा लेकर विद्यार्थियों के मूल्यांकन की नियमित रूप से पढ़ाई का मूल्यांकन होगा। नियमित मूल्यांकन से पढ़ाई में रट्टे की कोई जगह नहीं रहेगी और कोचिंग कल्चर को भी बढ़ावा नहीं मिलेगा।
तकनीक का शिक्षा में व्यापक उपयोग
विद्यार्थियों को पढ़ाने से लेकर आधिकारिक काम को तकनीक के प्रयोग से और भी सरल किया जाएगा। इससे विशेष बच्चों को सभी सुविधाएं मिल पाएंगी। स्मार्ट बोर्ड, ई-पुस्तकालय आदि से पढ़ाई के नए आयाम खुलेंगे।