Election Results 2024 : हरियाणा में तीसरे दलों का अस्तित्व फिलहाल खत्म, वोटरों ने गुम की किंगमेकर जजपा की चाबी
जजपा आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के साथ गठबंधन में उतरकर दलित मतदाता को लुभा नहीं पाई। 84 सीटों में से जजपा-एएसपी गठबंधन एक भी सीट हासिल नहीं कर सकी।
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दलित फॉर्मूला फ्लॉप
2019 विधानसभा चुनाव में 10 सीट जीतकर किंगमेकरी बनने वाली जजपा को जनता ने इस बार पूरी तरह से नकार दिया है। पार्टी आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के साथ गठबंधन में उतरकर दलित मतदाता को लुभा नहीं पाई। 84 सीटों में से जजपा-एएसपी गठबंधन एक भी सीट हासिल नहीं कर सकी।
जजपा के दिग्गज पूर्व उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला, जजपा महासचिव दिग्विजय चौटाला सहित सभी उम्मीदवार बुरी तरह हार गए। पांचवें नंबर पर रहने वाले दुष्यंत को उचाना में करारी हार मिली है। दिग्विजय को छोड़ सभी की जमानत जब्त हो गई। केवल दिग्विजय ही सबसे ज्यादा 35 हजार वोट ले पाए।
जजपा 68 और एएसपी 16 सीटों पर मैदान में थी। किसान आंदोलन में भाजपा सरकार के साथ खड़े रहने के कारण दुष्यंत और उनके अन्य प्रत्याशियों को चुनाव प्रचार के दौरान सबसे ज्यादा विरोध का सामना करना पड़ा था।
विधानसभा चुनाव तक पार्टी के सात विधायकों के बागी होने के बाद जजपा कमजोर होकर बिखर गई थी। 85 सीटों पर दुष्यंत, दिग्विजय के अलावा कोई बड़ा चेहरा नहीं था। 2019 में 14.80% वोट हासिल करने वाली जजपा को इस बार 0.90 % मत ही मिले हैं।
हार के प्रमुख फैक्टर
- किसान आंदोलन को लेकर जनता में गुस्सा
- विधानसभा चुनाव से पहले जजपा में बिखराव
- दुष्यंत चौटाला, दिग्विजय के अलावा कोई बड़ा चेहरा न होना
- गठबंधन पार्टी एएसपी का हरियाणा में अस्तित्व नहीं
आप को महज 1.79 फीसदी मिले वोट पर चार सीटों पर कांग्रेस का बिगाड़ा खेल
दिल्ली शराब घोटाले में जमानत पर जेल से बाहर आकर हरियाणा विधानसभा चुनाव में प्रचार करने वाले दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल मतदाताओं को लुभाने में असफल रहे। पहले उनकी पत्नी सुनीता , राज्यसभा सांसद संजय सिंह, पूर्व सांसद सुशील गुप्ता ने मोर्चा संभाला था। पार्टी में बड़ा स्थानीय चेहरा न होने पर केजरीवाल को लोकल ब्वॉय के तौर पर दिखाने के दांव ने भी काम नहीं किया। पंजाब के सीएम भगवंत मान को बीमार होने के कारण प्रचार से हटना पड़ा।
पिछले विधानसभा चुनाव में 46 सीटों पर लड़ने वाली आप को एक भी सीट नहीं मिली थी। आप को कुल आजाद प्रत्याशियों के 9.17 प्रतिशत और नोटा 0.54 प्रतिशत से भी कम मत प्रतिशत मिले थे। इस बार आप को 1.79 प्रतिशत वोट मिले हैं। आप के 89 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई है। हालांकि चार सीटों पर उसने कांग्रेस का खेला बिगाड़ दिया। लोकसभा चुनाव में आप के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस को पांच सीटें मिली थीं, लेकिन विधानसभा चुनाव में आप के साथ गठबंधन नहीं होने का खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ा। उचाना, डबवाली, रानियां और असंध में कांग्रेस प्रत्याशियों की हार उतने मतों से हुई है, जितने वोट आप को मिले हैं।
सबसे मजबूत आदर्श तीसरे नंबर पर
आप के सबसे मजबूत प्रत्याशी माने जाने वाले जगाधरी सीट से आदर्श पाल तीसरे नंबर पर रहे है। उन्हें 43, 813 वोट मिले। कलायत सीट से प्रत्याशी अनुराग ढांडा करीब साढ़े 5 हजार वोट पाकर 7वें नंबर पर रहे है। ढांडा से पहले भाजपा, इनेलो प्रत्याशी सहित दो आजाद उम्मीदवार रहे है। देश की पहली महिला डब्ल्यूडब्ल्यूई की पहलवान कविता को 1280 वोट मिले है।
हाथी पर बैठकर भी चौटाला नहीं कर सके चमत्कार...सिर्फ चश्मा ही बचा
इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) इनेलो भी बसपा के साथ मिलकर वापसी नहीं कर सकी। इनेलो के प्रधान महासचिव व पांच बार के विधायक अभय चौटाला को कांग्रेस के भरत सिंह बेनीवाल से अपनी परंपरागत ऐलनाबाद सीट से करारी हार मिली है। हालांकि उनके बेटे अर्जुन चौटाला ने रानियां और डबवाली से उनके चचेरे भाई आदित्य चौटाला ने जीत दर्ज की है। इनेलो 2019 के चुनाव में जजपा की तरफ गए मतदाताओं को वापस लाने में विफल रही है। बसपा के साथ मिलकर दलित मतदाताओं को साधने का दांव भी फेल हो गया।
बसपा ने 36 सीटों पर चुनाव लड़ा और सिर्फ एक सीट अटेली पर टक्कर दे पाई। 2019 विधानसभा चुनाव में 2.44 प्रतिशत वोट लेने वाली इनेलो के सामने अपना चुनाव चिह्न बचाने के लिए चुनाव आयोग के नियमों के तहत कम से कम 6 प्रतिशत वोट या दो सीटों पर जीत हासिल करना जरूरी था। इस बार पार्टी 4.22 फीसदी वोट मिले हैं। बसपा ने 2019 में 4.16 वोट हासिल किए थे। बसपा को इस बार 1.82 प्रतिशत वोट मिले हैं। एलनाबाद से अभय करीब 15 हजार से हार गए जबकि फतेहाबाद से सुनैना को केवल 9681 वोट मिले। उनकी जमानत जब्त हो गई।
हार के कारण
- इनेलो से टूटकर जजपा का अलग चुनाव लड़ने से वोट बैंक का बिखराव
- बुजुर्ग होने के नाते पूर्व मुख्यमंत्री ओपी चाैटाला का ज्यादा प्रचार व रैलियों में शामिल नहीं होना
- भाजपा-कांग्रेस के देरी से उम्मीदवार घोषित करने पर मजबूत प्रत्याशियों का नहीं मिलना