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डॉक्यूमेंटरी फिल्म फेस्टिवल में दिखा समाज का असली चेहरा 

Fri, 30 Dec 2016 11:29 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Fri, 30 Dec 2016 11:29 AM IST
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Documentary film festival showing the real face of society
फिल्म फेस्टिवल - फोटो : अमर उजाला

फिल्मों को अब सिर्फ मनोरंजन का माध्यम मान लेना सही सोच नहीं है। फिल्मों का दायरा मनोरंजन से कहीं आगे तक बढ़ चुका है। बेहतर फिल्में समाज की सोच में बदलाव का मजबूत आधार बन रही हैं। 

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फिल्म की कहानी को अगर आम आदमी की जिंदगी से जोड़ा जाए तो उसकी सार्थकता कई गुणा बढ़ सकती है। कुछ ऐसे ही मन के भावों को पेश करती फिल्में वीरवार को चंडीगढ़ में आयोजित नेशनल डॉक्यूमेंटरी फिल्म फेस्टिवल में दिखाई गई। 
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सेक्टर-26 स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्निकल टीचर्स ट्रेनिंग एंड रिसर्च (एनआईटीटीटीआर) में सीईसी (कंसोर्टियम ऑफ एजुकेशन कम्युनिकेशन) और यूजीसी के  फिल्म फेस्टिवल प्रकृति-2016 का आयोजन किया जा रहा है। 
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फेस्टिवल में दूसरे दिन 8 फिल्में दिखाई गईं, जिनका थीम ह्यूमन राइट्स और सिनेमा के महत्व को दिखाया गया। फिल्मों के माध्यम से थर्ड जेंडर (किन्नर) जैसे ज्वलंत मुद्दों को पेश किया।   

फिल्म में बेटियों की शिक्षा के महत्व पर फोकस किया गया है। फेस्टिवल में सिनेमा,ह्यूमन राइट्स,लॉ से जुड़ी कई जानी मानी हस्तियों ने पैनल चर्चा में हिस्सा लिया। 

फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन दूरदर्शन के पूर्व डायरेक्टर जनरल और बिहार में बोर्ड ऑफ रेविन्यू के चेयरमैन त्रिपुरारी शरण विशेष अतिथि थे। फिल्म फेस्टिवल के मुख्य संयोजक और सीईसी डायरेक्टर प्रो.राजबीर सिंह ने कहा कि चंडीगढ़ में पहली बार आयोजित फेस्टिवल को काफी अच्छा रिस्पांस मिला है। 

फिल्मों ने किया दर्शकों को प्रभावित 

Documentary film festival showing the real face of society
फिल्म फेस्ट - फोटो : Demo Pic.

फिल्मों ने किया दर्शकों को प्रभावित 
फेस्टिवल में वीरवार को लगभग सभी फिल्मों ने दर्शकों को प्रभावित किया। लेकिन थर्ड जेंडर पर आधारित मैं कौन हूं...शीर्षक  से बनी फिल्म में किन्नर वर्ग की जिंदगी को काफी बेहतर तरीके से प्रदर्शित किया गया। 

धारा सरस्वती द्वारा निर्देशित फिल्म में समाज और परिवार के बीच थर्ड जेंडर को लेकर भेदभाव को स्क्रीन पर प्रभावित तरीके से पेश किया गया। सुधीर कुमार सक्सेना द्वारा तैयार रजनी से रोशनी लघु फिल्म में एक ऐसी बच्ची की कहानी दिखाई गई जिसमें बेटी को सिर्फ घर की चारदीवारी में कैद करने और बेटे से नीचे दिखाया गया। 

लेकिन एक शिक्षिका अपने प्रयासों से झुग्गी में रहने वाली लड़की को  के सपने पूरे करने में मदद करती है। डॉ.भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता विभाग के डॉ.गोविंद पांडे ने कचरा कचरा जिंदगी थीम पर लघु फिल्म तैयार की। फिल्म में देश में ऐसे बच्चों का कहानी दिखाई जिसमें लाखों बच्चों का बचपन सिर्फ कूड़ा बीनने तक सीमित रह जाता है। फिल्म में बच्चों के दर्द को बखूबी पेश किया गया।  
  
शुक्रवार को फिल्म फेस्टिवल का समापन 
सीईसी-यूजीसी के नेशनल डॉक्यूमेंटरी फिल्म फेस्टिवल में देश भर से चुनी ह्यूमन राइट्स, पर्यावरण और डेवलेपमेंट पर कुछ 20 फिल्मों को दिखाया जा रहा है। शुक्रवार को फिल्म फेस्टिवल का अंतिम दिन है।

प्रो.राजबीर ने बताया कि आखिरी दिन दो सत्र में डॉक्यूमेंटरी फिल्में दिखाई जाएंगी। इन फिल्म का थीम डेवलेपमेंट रहेगा। फिल्मों के बाद विभिन्न एक्सपर्ट का पैनल डिस्कशन भी होगा। दोपहर 3 से 4 बजे समापन समारोह आयोजित किया जाएगा। 

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