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पेंशन और फैमिली पेंशन में रखें अंतर, हाईकोर्ट ने सरकार से समीक्षा करने को कहा
विवेक शर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sun, 16 Apr 2017 09:49 AM IST
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट
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पेंशन और फैमिली पेंशन के बीच के अंतर और फैमिली पेंशन पाने वालों की अधिक निर्भरता के तथ्यों के साथ पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पेंशन नीति की समीक्षा का जिम्मा अब केंद्र सरकार को सौंप दिया है। हाईकोर्ट ने अपने आदेशों में स्पष्ट किया है कि कल्याणकारी नीतियों की समीक्षा समय-समय पर करते रहना जरूरी है। अब इस मामले में गेंद केंद्र के पाले में आ गई है और उसे इस बारे में निर्णय लेना है। इस पर देश भर के केंद्रीय कर्मचारियों की पेंशन निर्भर होगी।
बठिंडा निवासी अरुण बंसल ने याचिका दाखिल कर कहा था कि केंद्रीय विद्यालय में कार्यरत उनके पिता राजकुमार बंसल की 29 मई 1993 को एक्सीडेंट में मौत हो गई थी। इसके बाद उनकी मां कमलेश बंसल को अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिली और उनको बढ़ी हुई पेंशन भी मिलने लगी, लेकिन 7 सितंबर 2004 को उनकी मां की भी मौत हो गई।
याची ने कहा कि उसे 2015 तक फैमिली पेंशन मिलती रही, लेकिन इसके बाद अचानक पेंशन को बंद कर दिया गया। इस पर केंद्रीय विद्यालय संगठन की ओर से बताया गया कि फैमिली पेंशन की अधिकतम राशि का भुगतान करने के चलते इसे रोका गया है।
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याची ने हाईकोर्ट के समक्ष दलील रखी कि परिवार के इकलौते कमाने वाले की मौत के बाद परिवार की स्थिति बेहद गंभीर हो जाती है। उस स्थिति में उसे अधिक वित्तीय सहायता की जरूरत होती है। पेंशन के मामले में आखिरी वेतन का 50 प्रतिशत न्यूनतम भुगतान होता है, जबकि फैमिली पेंशन के मामले में मूल वेतन का 30 प्रतिशत भुगतान किया जाता है।
याची ने कहा कि पेंशन और फैमिली पेंशन के बीच फर्क नहीं किया जा सकता। यह संविधान के खिलाफ है। हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि केंद्र सरकार को वर्तमान के बदलते समाज को देखते हुए कल्याणकारी नीतियों की समय-समय पर समीक्षा करनी चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि हमें कोई संशय नहीं है कि याची की ओर से उठाए गए मुद्दों पर केंद्र सरकार इन नियमों की समीक्षा करते हुए गंभीरता से ध्यान देगी। हाईकोर्ट के इन आदेशों के बाद अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है और केंद्र को पेंशन और फैमिली पेंशन के इस मसले पर निर्णय लेना है। केंद्र के निर्णय पर ही पेंशन भोगियों की पेंशन निर्भर होगी।
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बठिंडा निवासी अरुण बंसल ने याचिका दाखिल कर कहा था कि केंद्रीय विद्यालय में कार्यरत उनके पिता राजकुमार बंसल की 29 मई 1993 को एक्सीडेंट में मौत हो गई थी। इसके बाद उनकी मां कमलेश बंसल को अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिली और उनको बढ़ी हुई पेंशन भी मिलने लगी, लेकिन 7 सितंबर 2004 को उनकी मां की भी मौत हो गई।
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याची ने कहा कि उसे 2015 तक फैमिली पेंशन मिलती रही, लेकिन इसके बाद अचानक पेंशन को बंद कर दिया गया। इस पर केंद्रीय विद्यालय संगठन की ओर से बताया गया कि फैमिली पेंशन की अधिकतम राशि का भुगतान करने के चलते इसे रोका गया है।
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याची ने हाईकोर्ट के समक्ष दलील रखी कि परिवार के इकलौते कमाने वाले की मौत के बाद परिवार की स्थिति बेहद गंभीर हो जाती है। उस स्थिति में उसे अधिक वित्तीय सहायता की जरूरत होती है। पेंशन के मामले में आखिरी वेतन का 50 प्रतिशत न्यूनतम भुगतान होता है, जबकि फैमिली पेंशन के मामले में मूल वेतन का 30 प्रतिशत भुगतान किया जाता है।
याची ने कहा कि पेंशन और फैमिली पेंशन के बीच फर्क नहीं किया जा सकता। यह संविधान के खिलाफ है। हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि केंद्र सरकार को वर्तमान के बदलते समाज को देखते हुए कल्याणकारी नीतियों की समय-समय पर समीक्षा करनी चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि हमें कोई संशय नहीं है कि याची की ओर से उठाए गए मुद्दों पर केंद्र सरकार इन नियमों की समीक्षा करते हुए गंभीरता से ध्यान देगी। हाईकोर्ट के इन आदेशों के बाद अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है और केंद्र को पेंशन और फैमिली पेंशन के इस मसले पर निर्णय लेना है। केंद्र के निर्णय पर ही पेंशन भोगियों की पेंशन निर्भर होगी।