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वेबिनार में बोले विशेषज्ञ- नीतियां बनाने से नहीं होता भाषाओं का विकास, क्रियान्वयन होना बेहद जरूरी
Mon, 07 Sep 2020 11:36 AM IST
पंचकुला ब्यूरो
अमर उजाला, चंडीगढ़
अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: पंचकुला ब्यूरो
Updated Mon, 07 Sep 2020 11:36 AM IST
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जब तक भारतीय भाषाओं का विकास नहीं होता, तब तक अंग्रेजी की अनिवार्यता बनी रहेगी। सरकारों को भाषा को लेकर चिंतन करना होगा। स्वदेशी चीजों की ओर यदि कोई सरकार बढ़ती है तो निश्चित रूप से भाषाएं भी पीछे नहीं रहेंगी। सरकारें नीतियां बनाती हैं, लेकिन उन नीतियों से ही भाषाओं का विकास नहीं होता, उसके लिए क्रियान्वयन होना बहुत जरूरी है। यह बात अमर उजाला की ओर से ‘हिंदी की प्रगति में सरकारों के योगदान’ विषय पर आयोजित वेबिनार में हिंदी के विशेषज्ञों ने कही।
उन्होंने कहा कि 1835 में मैकाले की शिक्षा नीति ने अंग्रेजी का खूब प्रचार-प्रसार किया और आज अंग्रेजी पूरी दुनिया में बातचीत की भाषा बन गई है। बेशक सरकारों ने इस शिक्षा नीति में बदलाव किए, लेकिन हिंदी उतनी तेजी से आगे नहीं बढ़ पाई, जितनी की अंग्रेजी। समय के साथ साथ लोगों ने खुद ही इसे अपनाना शुरू कर दिया। आज देश के लगभग 50 करोड़ लोग हिंदी भाषी हैं। हिंदी तेजी से आगे बढ़ रही है। आइए जानते हैं क्या कहा विशेषज्ञ ने-
रोजगार और संस्कार देगी नई शिक्षा नीति
अंग्रेजी के अभिमान में चूर होकर मैकाले ने 1835 में शिक्षा नीति बनाई थी। शिक्षा की भाषा ही उन्होंने अंग्रेजी को समझा, लेकिन नई शिक्षा नीति इसका मुंहतोड़ जवाब है। यह नीति भारतीय भाषाओं को आगे ले जाएगी। रोजगार, संस्कार व विचार प्रदान करेगी। भाषाओं में पूरे राष्ट्र का ज्ञान होता है। इसलिए सभी लोगों का दायित्व है कि वह हिंदी सीखें, पढ़ें और उसे आगे ले जाएं। भाषाओं को जीवित देखना है या म्यूजियम में, यह खुद तय करना होगा। सरकारें जब स्वदेशी चिंतन करेंगी तो भाषाओं का भी विकास होगा, लेकिन नीतियां बनाने से ही भाषाओं का विकास नहीं होगा, क्रियान्वयन बेहतर होना चाहिए।
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- प्रो. चमन लाल गुप्ता, उपाध्यक्ष, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडी, शिमला
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उन्होंने कहा कि 1835 में मैकाले की शिक्षा नीति ने अंग्रेजी का खूब प्रचार-प्रसार किया और आज अंग्रेजी पूरी दुनिया में बातचीत की भाषा बन गई है। बेशक सरकारों ने इस शिक्षा नीति में बदलाव किए, लेकिन हिंदी उतनी तेजी से आगे नहीं बढ़ पाई, जितनी की अंग्रेजी। समय के साथ साथ लोगों ने खुद ही इसे अपनाना शुरू कर दिया। आज देश के लगभग 50 करोड़ लोग हिंदी भाषी हैं। हिंदी तेजी से आगे बढ़ रही है। आइए जानते हैं क्या कहा विशेषज्ञ ने-
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रोजगार और संस्कार देगी नई शिक्षा नीति
अंग्रेजी के अभिमान में चूर होकर मैकाले ने 1835 में शिक्षा नीति बनाई थी। शिक्षा की भाषा ही उन्होंने अंग्रेजी को समझा, लेकिन नई शिक्षा नीति इसका मुंहतोड़ जवाब है। यह नीति भारतीय भाषाओं को आगे ले जाएगी। रोजगार, संस्कार व विचार प्रदान करेगी। भाषाओं में पूरे राष्ट्र का ज्ञान होता है। इसलिए सभी लोगों का दायित्व है कि वह हिंदी सीखें, पढ़ें और उसे आगे ले जाएं। भाषाओं को जीवित देखना है या म्यूजियम में, यह खुद तय करना होगा। सरकारें जब स्वदेशी चिंतन करेंगी तो भाषाओं का भी विकास होगा, लेकिन नीतियां बनाने से ही भाषाओं का विकास नहीं होगा, क्रियान्वयन बेहतर होना चाहिए।
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- प्रो. चमन लाल गुप्ता, उपाध्यक्ष, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडी, शिमला
बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी हिंदी में लिख रही हैं संदेश
हिंदी पूरी तरह समृद्ध है। इसकी जड़ें बहुत मजबूत हैं। हमारे संस्कारों व खून में घुली हुई है। हिंदी को बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने व्यापार के लिए प्रयोग में ला रही हैं। इसके अलावा क्षेत्रीय भाषाओं को भी कंपनियां महत्व देने लगी हैं। हिंदी सरलता की ओर बढ़ी है और यह जितनी सरल होगी उतनी आगे जाएगी। डिस्कवरी जैसे चैनल हिंदी में आ गए हैं। हिंदी को विदेशों तक ले जाने में मजदूरों का भी बड़ा हाथ है जो सात समुंदर पार गए। अंग्रेजी का विरोध न करें, उसे भी सीखें। भाषाओं को सीखना बुरी बात नहीं है। आज देश के 43 फीसदी लोग हिंदी बोलते हैं।
- प्रो. मधु गोसाईं, हिंदी विभाग अध्यक्ष, पीजीजीसीजी सेक्टर- 11, चंडीगढ़
हर जगह राजभाषा के लिए निकाली जा रहीं रिक्तियां
हिंदी हमें सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ती है। हिंदी अब संघर्षरत नहीं रही। वह तेजी से आगे बढ़ रही है। हिंदी को आगे ले जाने के लिए आकाशवाणी से लेकर कई मंचों के माध्यम से कार्य किया जा रहा है। कई राज्यों में हिंदी की टाइपिंग से लेकर कई चीजें सिखाई जा रही हैं। रोजगार से इसे जोड़ दिया गया। बैंकों में हो या केंद्रीय कार्यालयों में, हर जगह राजभाषा के लिए रिक्तियां निकाली जा रही हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि अंग्रेजी को नीचा दिखाना है, लेकिन अपनी भाषा से ही उन्नति संभव है। सरकारों को भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन की ओर ध्यान देना होगा। सार्वजनिक क्षेत्रों में भी इसका प्रयोग बहुतायत में हो।
- डॉ. मंजू पुरी, हिंदी विभाग, हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी, शिमला
सत्ता की नहीं.. संघर्ष की भाषा रही हिंदी
अंग्रेजी शासन के खिलाफ जितने भी प्रयास हुए थे वह हिंदी भाषा के माध्यम से हुए थे। बाद में हिंदी का प्रयोग कम हो गया, क्योंकि हिंदी सत्ता की भाषा नहीं रही यह संघर्ष की भाषा रही। काफी समय बाद सरकारों ने हिंदी के लिए प्रयास करना शुरू किया, लेकिन अब कमी हमारी भी है। हिंदी की जितनी प्रतियोगिताएं हो रही हैं वहां पुरस्कार अधिक हैं और प्रतिभागी कम। इसके लिए लोगों को आगे आना होगा। आज के समय में हिंदी व्यवहार, बाजार, सूचना प्रौद्योगिकी के दम पर आगे बढ़ रही है। सरकारें योजनाएं बना सकती है, लेकिन उसको लागू आपको और हमें ही करना होगा।
- डॉ. गुरमीत सिंह, हिंदी विभाग अध्यक्ष, पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़
- प्रो. मधु गोसाईं, हिंदी विभाग अध्यक्ष, पीजीजीसीजी सेक्टर- 11, चंडीगढ़
हर जगह राजभाषा के लिए निकाली जा रहीं रिक्तियां
हिंदी हमें सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ती है। हिंदी अब संघर्षरत नहीं रही। वह तेजी से आगे बढ़ रही है। हिंदी को आगे ले जाने के लिए आकाशवाणी से लेकर कई मंचों के माध्यम से कार्य किया जा रहा है। कई राज्यों में हिंदी की टाइपिंग से लेकर कई चीजें सिखाई जा रही हैं। रोजगार से इसे जोड़ दिया गया। बैंकों में हो या केंद्रीय कार्यालयों में, हर जगह राजभाषा के लिए रिक्तियां निकाली जा रही हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि अंग्रेजी को नीचा दिखाना है, लेकिन अपनी भाषा से ही उन्नति संभव है। सरकारों को भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन की ओर ध्यान देना होगा। सार्वजनिक क्षेत्रों में भी इसका प्रयोग बहुतायत में हो।
- डॉ. मंजू पुरी, हिंदी विभाग, हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी, शिमला
सत्ता की नहीं.. संघर्ष की भाषा रही हिंदी
अंग्रेजी शासन के खिलाफ जितने भी प्रयास हुए थे वह हिंदी भाषा के माध्यम से हुए थे। बाद में हिंदी का प्रयोग कम हो गया, क्योंकि हिंदी सत्ता की भाषा नहीं रही यह संघर्ष की भाषा रही। काफी समय बाद सरकारों ने हिंदी के लिए प्रयास करना शुरू किया, लेकिन अब कमी हमारी भी है। हिंदी की जितनी प्रतियोगिताएं हो रही हैं वहां पुरस्कार अधिक हैं और प्रतिभागी कम। इसके लिए लोगों को आगे आना होगा। आज के समय में हिंदी व्यवहार, बाजार, सूचना प्रौद्योगिकी के दम पर आगे बढ़ रही है। सरकारें योजनाएं बना सकती है, लेकिन उसको लागू आपको और हमें ही करना होगा।
- डॉ. गुरमीत सिंह, हिंदी विभाग अध्यक्ष, पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़
हिंदी वृक्ष है, इसकी जड़ों को मजबूत करना होगा
मातृभाषा मिट्टी से जोड़े रखती है। जैसे बोली जाती है वैसे ही लिखी जाती है। हिंदी पूरा वृक्ष है, इसलिए इसकी जड़ों को पहले मजबूत करना होगा। बच्चों को शुरू से ही हिंदी सिखानी और पढ़ानी होगी। उसके बाद उन्हें नए रोजगार उपलब्ध कराने होंगे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भाषा को पूरी तरह बढ़ावा दिया गया है। इसका असर जल्द दिखेगा। शुरू से ही बच्चों को स्थानीय भाषाओं में पढ़ाया जाएगा। उन्हें समय से ही प्रशिक्षण मिलेगा और वह रोजगार की ओर आगे बढ़ेंगे। हिंदी के विशेषज्ञों का भी दायित्व बनता है कि वह इस भाषा के लिए कुछ न कुछ नया करते रहें।
- डॉ. अर्चना सिंह, प्राचार्या, गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज, पंचकूला
राष्ट्र को आगे ले जाने में भाषा का बड़ा हाथ
अंग्रेजी का चलन देशभर में है और यह तेजी से आगे बढ़ रहा है। किसी भी राष्ट्र को आगे ले जाने में उसकी भाषा का बड़ा हाथ होता है। मजबूत इच्छाशक्ति व दृढ़ता के साथ इसे देशभर में लागू करवाया जा सकता है। हिमाचल प्रदेश में 1977 में सरकारी कार्यालयों में हिंदी में काम तेज हुआ, लेकिन अब अंग्रेजी में भी चलन आ गया। आदेश भी अंग्रेजी में जारी हो रहे हैं। लोग न्याय भी अपनी भाषा में नहीं पा रहे हैं। ऐसे में सरकारों को आम लोगों के बारे में सोचना होगा।
- प्रो. शशि कांत शर्मा, पूर्व अध्यक्ष, पत्रकारिता शिवभाग, हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी, शिमला
हिंदी के प्रति विद्यार्थियों और शिक्षकों में दिखा बड़ा प्रेम
अमर उजाला के वेबिनार में हिंदी के विद्यार्थियों की संख्या सर्वाधिक रही। विशेषज्ञों के अलावा 50 से अधिक युवाओं ने हिस्सा लिया। पीयू के यूआईएचटीएम विभाग से प्रोफेसर प्रशांत गौतम, डॉ. लिपिका गुलियानी, यूूआईएलएस विभाग से डॉ. भारत समेत कई विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। डॉ. भारत ने कहा कि हिंदी लोगों को जोड़ने का काम करती है। केंद्र सरकार इस जोड़ने पर ही विश्वास रख रही है और इसी क्रम में राष्ट्रीय शिक्षा नीति आई जो हिंदी को और आगे ले जाएगी। सरकारी स्कूलों से भी हिंदी से जुड़े शिक्षकों ने हिस्सा लिया।
- डॉ. अर्चना सिंह, प्राचार्या, गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज, पंचकूला
राष्ट्र को आगे ले जाने में भाषा का बड़ा हाथ
अंग्रेजी का चलन देशभर में है और यह तेजी से आगे बढ़ रहा है। किसी भी राष्ट्र को आगे ले जाने में उसकी भाषा का बड़ा हाथ होता है। मजबूत इच्छाशक्ति व दृढ़ता के साथ इसे देशभर में लागू करवाया जा सकता है। हिमाचल प्रदेश में 1977 में सरकारी कार्यालयों में हिंदी में काम तेज हुआ, लेकिन अब अंग्रेजी में भी चलन आ गया। आदेश भी अंग्रेजी में जारी हो रहे हैं। लोग न्याय भी अपनी भाषा में नहीं पा रहे हैं। ऐसे में सरकारों को आम लोगों के बारे में सोचना होगा।
- प्रो. शशि कांत शर्मा, पूर्व अध्यक्ष, पत्रकारिता शिवभाग, हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी, शिमला
हिंदी के प्रति विद्यार्थियों और शिक्षकों में दिखा बड़ा प्रेम
अमर उजाला के वेबिनार में हिंदी के विद्यार्थियों की संख्या सर्वाधिक रही। विशेषज्ञों के अलावा 50 से अधिक युवाओं ने हिस्सा लिया। पीयू के यूआईएचटीएम विभाग से प्रोफेसर प्रशांत गौतम, डॉ. लिपिका गुलियानी, यूूआईएलएस विभाग से डॉ. भारत समेत कई विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। डॉ. भारत ने कहा कि हिंदी लोगों को जोड़ने का काम करती है। केंद्र सरकार इस जोड़ने पर ही विश्वास रख रही है और इसी क्रम में राष्ट्रीय शिक्षा नीति आई जो हिंदी को और आगे ले जाएगी। सरकारी स्कूलों से भी हिंदी से जुड़े शिक्षकों ने हिस्सा लिया।