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पुलिस जांच में जानबूझकर हुई गलती, स्नैचिंग के आठ केस में दो आरोपी बरी
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चंडीगढ़। शहर में स्नैचिंग एक गंभीर अपराध बनता जा रहा है। आए दिन स्नैचिंग की घटनाएं सामने आ रही हैं, लेकिन स्नैचरों को जेल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी शायद चंडीगढ़ पुलिस ठीक ढंग से नहीं निभा रही। पुलिस की जांच पर अब जिला अदालत ने भी सवाल खड़े किए हैं। साल 2015 के स्नैचिंग के आठ केस में शामिल दो आरोपियों को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी संजय की अदालत ने बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि पुलिस जांच के दौरान जानबूझकर गलती की है। जिस जांच अधिकारी ने रिकवरी की थी, उसे गवाह के तौर पर शामिल नहीं किया गया। इससे जांच प्रभावित हुई और आरोपियों को संदेह का लाभ भी मिला है। इसके साथ ही शिकायतकर्ता भी आरोपियों की शिनाख्त करने में असफल रहे हैं।
अप्रैल 2015 में दर्ज केस के मुताबिक पुलिस को चार शिकायत मिली कि दो युवक बाइक से आए और सोने के जेवरात छीनकर फरार हो गए। पुलिस ने शिकायत के आधार पर दो युवक बिलासपुर निवासी कमल ठाकुर और मुल्लांपुर निवासी हरप्रीत के खिलाफ आईपीसी की धारा 356 और 379 के तहत सेक्टर 11 में एफआईआर दर्ज की। उसके बाद चार और शिकायतें आईं। इसमें भी इन युवकों को भी आरोपी बनाया गया है। केस के ट्रायल के दौरान जांच अधिकारी मोहन कश्यप ने बयान दर्ज कराया कि जब दोनों आरोपी जांच में शामिल हुए तो वह पहले से ही एफआईआर नंबर 175 के केस में पुलिस कस्टडी में थे। इस दौरान उनसे सोने के जेवरात बरामद हुए। यह बरामदगी अन्य जांच अधिकारी कुलदीप सिंह ने की थी।
अदालत ने पाया कि स्नैचिंग को केस को साबित करने में जांच अधिकारी कुलदीप सिंह भूमिका महत्वपूर्ण थी, क्योंकि रिकवरी उन्होंने ही की थी। लेकिन इस केस में उनकी गवाही ही नहीं डाली गई। गवाही के अभाव में, कथित रिकवरी साबित नहीं हुई है और इसका फायदा स्नैचरों को मिला। आरोपियों पर दोष साबित करने के लिए यह महत्वपूर्ण पक्ष था, जबकि मौजूदा जांच अधिकारी मोहन कश्यप की गवाही की कोई प्रासंगिकता नहीं है, क्योंकि रिकवरी के मुख्य गवाह (कुलदीप सिंह) खुद शामिल नहीं हुए थे और अभियोजन पक्ष ने भी उनकी जांच नहीं की थी। इसलिए, अदालत यह मानने के लिए बाध्य है कि जांच अधिकारी ने कानून के मुताबिक जांच नहीं की और वर्तमान मामले में गवाह के रूप में सभी उपलब्ध साक्ष्य नहीं बनाए हैं। यह पुलिस की ओर से जानबूझकर गलती हुई है। इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि कुलदीप सिंह को इसमें गवाह क्यों नहीं बनाया गया।
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स्नैचिंग के चार अन्य मामलों में भी दोनों युवकों को आरोपी बनाया गया था। इसमें दो शिकायतकर्ता आरोपी की पहचान नहीं कर सके, बल्कि दो ने उल्लेख किया कि उन्हें आरोपी के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई। यह भी नहीं बताया गया कि अभियुक्तों को गिरफ्तार किया गया या कोई रिकवरी हुई। अदालत ने कहा कि आरोपियों की पहचान स्थापित करने के लिए रिकॉर्ड पर पर्याप्त सबूत नहीं है, क्योंकि शिकायत में आरोपी व्यक्तियों का जिक्र नहीं किया गया था। पुलिस ने कानून के अनुसार आरोपियों की टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड नहीं करवाई। किसी भी विश्वसनीय सबूत के अभाव में, अभियुक्तों की पहचान साबित नहीं होती है, इसलिए आरोपियों पर दोष साबित नहीं होते।
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अप्रैल 2015 में दर्ज केस के मुताबिक पुलिस को चार शिकायत मिली कि दो युवक बाइक से आए और सोने के जेवरात छीनकर फरार हो गए। पुलिस ने शिकायत के आधार पर दो युवक बिलासपुर निवासी कमल ठाकुर और मुल्लांपुर निवासी हरप्रीत के खिलाफ आईपीसी की धारा 356 और 379 के तहत सेक्टर 11 में एफआईआर दर्ज की। उसके बाद चार और शिकायतें आईं। इसमें भी इन युवकों को भी आरोपी बनाया गया है। केस के ट्रायल के दौरान जांच अधिकारी मोहन कश्यप ने बयान दर्ज कराया कि जब दोनों आरोपी जांच में शामिल हुए तो वह पहले से ही एफआईआर नंबर 175 के केस में पुलिस कस्टडी में थे। इस दौरान उनसे सोने के जेवरात बरामद हुए। यह बरामदगी अन्य जांच अधिकारी कुलदीप सिंह ने की थी।
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अदालत ने पाया कि स्नैचिंग को केस को साबित करने में जांच अधिकारी कुलदीप सिंह भूमिका महत्वपूर्ण थी, क्योंकि रिकवरी उन्होंने ही की थी। लेकिन इस केस में उनकी गवाही ही नहीं डाली गई। गवाही के अभाव में, कथित रिकवरी साबित नहीं हुई है और इसका फायदा स्नैचरों को मिला। आरोपियों पर दोष साबित करने के लिए यह महत्वपूर्ण पक्ष था, जबकि मौजूदा जांच अधिकारी मोहन कश्यप की गवाही की कोई प्रासंगिकता नहीं है, क्योंकि रिकवरी के मुख्य गवाह (कुलदीप सिंह) खुद शामिल नहीं हुए थे और अभियोजन पक्ष ने भी उनकी जांच नहीं की थी। इसलिए, अदालत यह मानने के लिए बाध्य है कि जांच अधिकारी ने कानून के मुताबिक जांच नहीं की और वर्तमान मामले में गवाह के रूप में सभी उपलब्ध साक्ष्य नहीं बनाए हैं। यह पुलिस की ओर से जानबूझकर गलती हुई है। इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि कुलदीप सिंह को इसमें गवाह क्यों नहीं बनाया गया।
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स्नैचिंग के चार अन्य मामलों में भी दोनों युवकों को आरोपी बनाया गया था। इसमें दो शिकायतकर्ता आरोपी की पहचान नहीं कर सके, बल्कि दो ने उल्लेख किया कि उन्हें आरोपी के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई। यह भी नहीं बताया गया कि अभियुक्तों को गिरफ्तार किया गया या कोई रिकवरी हुई। अदालत ने कहा कि आरोपियों की पहचान स्थापित करने के लिए रिकॉर्ड पर पर्याप्त सबूत नहीं है, क्योंकि शिकायत में आरोपी व्यक्तियों का जिक्र नहीं किया गया था। पुलिस ने कानून के अनुसार आरोपियों की टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड नहीं करवाई। किसी भी विश्वसनीय सबूत के अभाव में, अभियुक्तों की पहचान साबित नहीं होती है, इसलिए आरोपियों पर दोष साबित नहीं होते।