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Hindi News ›   Chandigarh ›   Daulatram Kamboj of Mohali had Quit Tea till formation of Ram Mandir

अपने-अपने राम: मोहाली के दौलतराम ने 31 साल से नहीं पी चाय, अयोध्या में लिया था प्रण-रामलला जब आएंगे...

Wed, 17 Jan 2024 08:52 AM IST
निवेदिता वर्मा विशाल मित्तल, संवाद, मोहाली
विशाल मित्तल, संवाद, मोहाली Published by: निवेदिता वर्मा Updated Wed, 17 Jan 2024 08:52 AM IST
सार

मोहाली सेक्टर-68 के रहने वाले दौलतराम कंबोज एक दिसंबर, 1992 में 20 लोगों के जत्थे के साथ अयोध्या गए थे। वहां पांच दिवसीय समागम में हिस्सा लिया था। इसी दौरान उनके मन में त्याग भावना जागी और उन्होंने चाय छोड़ने की शपथ ले ली। अब वे मार्च में अयोध्या जाएंगे और रामलला के दर्शन के बाद ही चाय पिएंगे।

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Daulatram Kamboj of Mohali had Quit Tea till formation of Ram Mandir
दौलतराम - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

रामलला की प्राण प्रतिष्ठा में अब कुछ ही समय बाकी है। राम श्रद्धालुओं की बरसों की मनोकामना पूरी होने वाली है। पूरे देश में ऐसे राम दीवाने हैं जिन्होंने राम मंदिर के लिए संघर्ष किया। किसी ने भक्ति दिखाई तो कोई हठ में आ गया। ऐसे ही एक राम भक्त हैं मोहाली के 89 वर्षीय बुजुर्ग दौलतराम, जिन्होंने 31 साल से चाय नहीं पी है।  
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दो दिसंबर, 1992 को अयोध्या में खड़े होकर दौलतराम ने कसम खाई थी कि जब तक राम मंदिर नहीं बनेगा, वह चाय नहीं पिएंगे। अब 22 जनवरी को अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद मार्च में वह अयोध्या में जाकर माथा टेकेंगे, जिसके बाद वे चाय का सेवन करेंगे।
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दौलतराम कंबोज वासी सेक्टर-68 ने बताया कि एक दिसंबर, 1992 में वह अपने साथ 20 लोगों के जत्थे के साथ अयोध्या गए थे। वहां पांच दिवसीय एक समागम आयोजित किया गया था। इसमें देश के बड़े राजनेता अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती आदि मौजूद थे। वहां बैठक की जाती थी, जिसमें राम मंदिर के हित के लिए की जानी वाली प्रतिक्रिया पर चर्चा की जाती। वहीं उनके मन में त्याग भावना जागी, जिसके बाद उन्होंने राम मंदिर बनने तक चाय ना पीने की शपथ ली थी।
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12 साल की उम्र में विभाजन देखा
दौलतराम कंबोज ने बताया कि विभाजन से पहले वह पाकिस्तान के जिला मीतगुंबरी, गांव नजमदीन में रहते थे। जब देश का विभाजन हुआ, उनकी उम्र केवल 12 साल थी। वह बताते हैं कि आंखों में अब भी वह दृश्य चलते हैं, जब हिंदू-मुसलमान दंगे हो रहे थे। लोग अपना घर-बार छोड़ एक स्थान से दूसरे स्थान तक पैदल यात्रा कर पहुंच रहे थे। वहीं उन्होंने फाजिल्का में सरेआम कत्ल-ए-आम होते हुए भी देखा। इसके बाद उन्होंने 1955 में मैट्रिक पास कर आरएसएस से जुड़ गए। वहीं दो साल उन्होंने संघ के विस्तारक बन कर भी काम किया। इसके बाद वह लोकहित के कार्यों से जुड़े और कई समाजसेवी कार्य भी किए।


1960 में शहीद सरदार उधम सिंह से प्रेरणा मिली
25 साल की उम्र में जब उन्हें शहीद सरदार ऊधम सिंह के बारे में पता चला तो वह काफी प्रभावित हुए। इसके बाद उन्होंने कंबोज नौजवान सभा की शुरुआत की। जिसमें उनके साथ कई लोग जुड़े थे। 1964 में उन्होंने शहीद सरदार ऊधम सिंह की अस्थियां ब्रिटिश से मंगवाने का प्रण लिया। इसके बाद 1974 में उन्होंने ज्ञानी जैल सिंह के साथ बैठक में मांग उठाई। जिस पर उन्होंने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ चर्चा कर उनकी बात रखी। इसी वर्ष में इसका असर दिखाई दिया और ब्रिटिश सरकार में शहीद सरदार ऊधम सिंह की अस्थियां भारत भेज दी गई थी।
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