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और बरी हो गया भ्रष्टाचार का आरोपी पूर्व चीफ इंजीनियर
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 08 Feb 2014 10:19 AM IST
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भ्रष्टाचार के आरोप में फंसे चंडीगढ़ प्रशासन के पूर्व चीफ इंजीनियर केके जेरथ समेत सात आरोपियों को अतिरिक्त जिला व सत्र न्यायाधीश की अदालत ने बरी कर दिया। मालूम हो कि इससे पहले जेरथ पांच अन्य मामलों में बरी हो चुके हैं। शुक्रवार को छठे मामले में बरी हुए हैं।
23 सितंबर 1998 में विजिलेंस ने पूर्व चीफ इंजीनियर केके जैरथ, एक्सईएन एएस ढींगरा, कॉन्ट्रेक्टर तरसेम लाल के खिलाफ जीएमसीएच-32 के सी और डी ब्लॉक की बिल्डिंग के निर्माण में इस्तेमाल स्टील और आरसीसी में तय रेट से ज्यादा पर टेंडर देने का आरोप लगाया था।
विजिलेंस ने इनके खिलाफ इस निर्माण कार्य में 62 लाख रुपये का नुकसान करने का आरोप लगाया था। 24 फरवरी 1999 में इस केस में शुरू हुआ था, जिसमें चार अन्य आरोपियों को शामिल किया गया था, इनमें सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर एससी कत्याल, एक्सईएन एसएस भट्टी, अमरजीत सिंह ढींगरा, तत्कालीन सुपरिंटेंडेंट नंदराम और हेड ड्राफ्ट्समैन कंस राज सैनी को भी आरोपी बनाया था। इन पर भी गलत टेंडर अलाट करने का आरोप था।
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जैरथ के वकील तरमिंदर सिंह के अनुसार, इन कामों में प्रशासन को नुकसान के बजाय लाभ हुआ था। पुलिस के अनुसार, अब जैरथ के खिलाफ एक केस बचा है जिस पर जिला अदालत में सुनवाई चल रही है।
जैरथ के वकील ने अदालत में दलील रखी कि किसी भी तकनीकी काम में अगर कोई खामी पाई जाती है तो उसकी इंक्वायरी सीनियर टेक्निकल अफसर ही कर सकता है।
लेकिन, इस केस में तत्कालीन होम सेक्रेटरी व चीफ विजिलेंस ऑफिसर अनुराधा गुप्ता के इशारे पर एक पुलिस इंस्पेक्टर से मामले की जांच करवाई गई।
अदालत में जब विजिलेंस पूछा गया कि उनके यहां कंप्यूटर कब लगे तो जवाब आया कि 2002 में लगे थे। लेकिन 115 पेज की इंक्वायरी रिपोर्ट कंप्यूटर पर पहले कैसे तैयार कर ली गई।
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23 सितंबर 1998 में विजिलेंस ने पूर्व चीफ इंजीनियर केके जैरथ, एक्सईएन एएस ढींगरा, कॉन्ट्रेक्टर तरसेम लाल के खिलाफ जीएमसीएच-32 के सी और डी ब्लॉक की बिल्डिंग के निर्माण में इस्तेमाल स्टील और आरसीसी में तय रेट से ज्यादा पर टेंडर देने का आरोप लगाया था।
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विजिलेंस ने इनके खिलाफ इस निर्माण कार्य में 62 लाख रुपये का नुकसान करने का आरोप लगाया था। 24 फरवरी 1999 में इस केस में शुरू हुआ था, जिसमें चार अन्य आरोपियों को शामिल किया गया था, इनमें सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर एससी कत्याल, एक्सईएन एसएस भट्टी, अमरजीत सिंह ढींगरा, तत्कालीन सुपरिंटेंडेंट नंदराम और हेड ड्राफ्ट्समैन कंस राज सैनी को भी आरोपी बनाया था। इन पर भी गलत टेंडर अलाट करने का आरोप था।
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जैरथ के वकील तरमिंदर सिंह के अनुसार, इन कामों में प्रशासन को नुकसान के बजाय लाभ हुआ था। पुलिस के अनुसार, अब जैरथ के खिलाफ एक केस बचा है जिस पर जिला अदालत में सुनवाई चल रही है।
जैरथ के वकील ने अदालत में दलील रखी कि किसी भी तकनीकी काम में अगर कोई खामी पाई जाती है तो उसकी इंक्वायरी सीनियर टेक्निकल अफसर ही कर सकता है।
लेकिन, इस केस में तत्कालीन होम सेक्रेटरी व चीफ विजिलेंस ऑफिसर अनुराधा गुप्ता के इशारे पर एक पुलिस इंस्पेक्टर से मामले की जांच करवाई गई।
अदालत में जब विजिलेंस पूछा गया कि उनके यहां कंप्यूटर कब लगे तो जवाब आया कि 2002 में लगे थे। लेकिन 115 पेज की इंक्वायरी रिपोर्ट कंप्यूटर पर पहले कैसे तैयार कर ली गई।