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बुड़ैल जेल ब्रेक के फैसले को प्रशासन ने हाईकोर्ट में दी चुनौती

Tue, 20 Oct 2015 01:39 PM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमरउजाला, चंडीगढ़ Updated Tue, 20 Oct 2015 01:39 PM IST
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appeal on high court against court order of budail jail break case

चंडीगढ़ प्रशासन ने बुड़ैल जेल ब्रेक केस में सुनाए गए जिला अदालत के फैसले के खिलाफ पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में अपील दाखिल की है। याचिका में कहा है कि सुबूतों के अभाव और ट्रायल में ढिलाई के कारण ही 14 आरोपियों को बरी किया गया।

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यह मामला अति गंभीर है और आरोपियों को बरी करने का फैसला गलत है। जिला अदालत का फैसला पलटते हुए आरोपियों को सजा दी जानी चाहिए।

11 साल पुराने जेल ब्रेक केस में चंडीगढ़ के सीजेएम अनुभव शर्मा की अदालत ने बब्बर खालसा इंटरनेशनल के सदस्य आतंकी जगतार सिंह हवारा और परमजीत सिंह भ्यौरा को दोषी मानते हुए उनकी सजा अंडरगोन की थी (यानी मामले में जितनी सजा बनती थी, वह जेल में काट चुके हैं और इस मामले में जेल में और रहने की जरूरत नहीं है।) सीजेएम कोर्ट ने 14 अन्य आरोपियों को सुबूतों के अभाव में बरी किया था।
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मामले में पुलिस ने 21 व्यक्तियों को आरोपी बनाते हुए दोष पत्र दाखिल किए थे। इनमें से जेल के तत्कालीन सुपरिंटेंडेंट डीएस राणा, डिप्टी जेल सुपरिंटेंडेंट दलबीर सिंह संधू, सहायक जेल सुपरिंटेंडेंट वीएम गिल और पीएस राणा, वार्डर इंद्र सिंह, हवलदार निशान सिंह सहित नारायण सिंह चौरा, नंद सिंह, शेर सिंह, लखविंदर सिंह, गुरदीप सिंह, सुबेग सिंह, गुरनाम सिंह और एसपी सिंह को बरी किया था।
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इनके अलावा पाक जासूस आबिद मोहम्मद पहले ही सजा पूरी कर चुका था। जगतार सिंह तारा, गुरविंदर सिंह गोल्डी और देवी सिंह को भगोड़ा करार दिया था। तारा के पकड़े जाने के बाद उसके खिलाफ अलग से ट्रायल चल रहा है।

एक महिला आरोपी बलजीत कौर की ट्रायल के दौरान मौत हो चुकी थी। अब बरी किए व्यक्तियों को दोषी करार देने की मांग करते हुए अपील दाखिल की गई है। इस अपील पर जल्द ही सुनवाई होने की संभावना है।

जेल से 2004 में हुए थे फरार

जनवरी 2004 को 21 व 22 तारीख की रात हवारा, भ्यौरा, तारा और हत्यारोपी देवी सिंह करीब 94 फीट लंबी सुरंग खोदकर फरार हो गए थे। हवारा और भ्यौरा को फरार होने के दो साल बाद गिरफ्तार कर लिया गया था, जबकि तारा को इसी साल थाईलैंड से गिरफ्तार किया गया था। देवी सिंह के पाकिस्तान में छिपे होने की आशंका है। जेल अधिकारियों सहित कुछ आरोपियों पर जेल ब्रेक में लापरवाही और सहयोग का आरोप था।

आपराधिक साजिश साबित नहीं कर पाई थी पुलिस

सीजेएम ने 123 पन्नों के अपने फैसले में कहा था कि अभियोजन पक्ष केस में पूरी तरह से आपराधिक साजिश को साबित करने में नाकाम रहा है। खासकर जेल ब्रेक में जेल अधिकारियों का ही रोल साबित नहीं हो सका।


उनके खिलाफ अभियोजन पक्ष अपराध साबित ही नहीं कर सका। वहीं जगतार सिंह हवारा और परमजीत सिंह भ्यौरा के मामले में कोई ठोस बहस नहीं हुई। हालांकि केस में उनकी दोबारा गिरफ्तारी उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 224 के तहत अपराध साबित करने में पर्याप्त थी।

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