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मोहालीः पूरा महीना काम करवाया और सैलरी में पकड़ा दिए 2500 रुपये के साथ 5 किलो चावल

Sat, 23 May 2020 01:06 PM IST
खुशबू गोयल नगमा सिंह, मोहाली
नगमा सिंह, मोहाली Published by: खुशबू गोयल Updated Sat, 23 May 2020 01:06 PM IST
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Coronavirus, Lockdown, Migrant Workers Facing Problems
घरों को वापस लौटते मजदूर
जिस फैक्टरी में हम काम कर रहे थे वहां लॉकडाउन के दौरान भी काम चल रहा था। हम खुश थे कि चलो हमारी नौकरी चल रही है, सैलरी भी आ ही जाएगी। लेकिन मई महीने के शुरू में फैक्टरी मालिक की नीयत बदल गई। पहले अप्रैल की सैलरी को लेकर फैक्टरी प्रबंधकों ने ड्रामा किया। अप्रैल की सैलरी के रूप में उन्हें 25 सौ रुपये और 5 किलो चावल पकड़ा दिए।
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इसके बाद अगले ही दिन कह दिया गया कि फैक्टरी में अब आधे मजदूरों से, मतलब अब 50 फीसदी मुलाजिमों के साथ काम करेगी। इसके साथ ही कहा गया कि जो फैक्टरी के अंदर ही रहेंगे वो ही मुलाजिम काम करेंगे। फैक्टरी मालिक के इस फरमान से ही उनके जीवन में मुश्किलों का पहाड़ टूट पड़ा। आंखों के आगे अंधेरा छा गया, समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करें।
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इतना बताते ही जीरकपुर-दिल्ली हाईवे पर तपती धूप में पैदल जा रहे अभिषेक की आंखों से आंसू बहने लगे, गला भी भर आया। वह बोला कि इसके बाद मजबूरी में अपने गांव यूपी के जिला दरिया जाने का फैसला लिया है। ट्रेन के लिए रजिस्ट्रेेशन करवाने के लिए लाइनों में लगकर धक्के तक खाए।
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लेकिन बहुत देर लगने के कारण अब अब पैदल ही सफर पर निकलने का फैसला किया है। उसने कहा कि अब तय कर लिया है कि अपने घर जाकर कोई भी काम कर लेंगे, जिससे जीवन में दोबारा ऐसी स्थिति न बने।

जेब में पैसा नहीं तो पैदल ही जाना पड़ेगा...

अभिषेक ने बताया कि कोरोना काल में उन्हें जिंदगी के कई सबक मिले हैं। जिस फैक्टरी वाले के लिए कभी उन्होंने काम करते हुए दिन-रात नहीं देखा। इस मुश्किल समय में उसकी भी नियत बदल गई। उसने हमें मजदूरी तक देने से मना कर दिया।  बाद में कुछ पैसे और चावल दिए हैं। जो कमरे के किराए में चले गए। अब इतने पैसे नहीं हैं कि किसी वाहन से गांव में जा सकें। प्रशासन लोगों को ट्रेनों में गांव भेजने के जो सपने दिखा रहा है। उसकी हकीकत हम आपके सामने हैं।

इस चक्कर में कई बार धक्के खाए। हमारे ऊपर पूरा परिवार निर्भर है। लेकिन हालात यह है कि उनको खाना खिलाने तक के लिए पैसे नहीं हैं। रास्ते में घर जाते हुए हमारे साथ कोई दुर्घटना हो जाए तो न जाने हमारे परिवार का क्या होगा। इसी बात को लेकर चिंता सता रही है। उन्होंने बताया कि कोरोना ने हमारे सभी सपने तोड़ दिए हैं। अब किसी तरह अपने गांव पहुंचना चाहते हैं, बस यह तमन्ना रह गई है।

जिनके सहारे पढ़ने भेजा था, वह खुद सड़क पर आ गए

मुकेश ने बताया कि वह 12वीं की पढ़ाई कर रहा है। माता-पिता ने अपने रिश्तेदारों के साथ पढ़ाने-लिखाने के लिए मुझे यहां भेजा था। लेकिन लॉकडाउन की वजह से मेरा भविष्य खराब हो गया। क्योंकि फैक्टरी में काम बंद होने के चलते अब मेरे रिश्तेदार सड़क पर आ गए हैं, जिनमें पास मैं रह रहा था। सब यूपी वापस जा रहे हैं। ऐसे में घरवाले मुझे अकेले यहां किसके सहारे छोड़ेंगे। अब हमारा एक साल खराब हो जाएगा। क्योकि एक साल से पहले कोई वापस गांव से यहां नहीं आएगा।

मुकेश ने बताया कि  हम पढ़े लिखे हैं और ट्रेन से जाने के लिए ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया की थी, लेकिन ट्रेन में जाने में सफलता नहीं मिली। चंडीगढ़ जाकर भी कई दिन कोशिश की। कई दिनों से डेराबस्सी के स्कूल के बाहर सुबह 5 बजे से लाइनों में लगकर स्क्रीनिंग के लिए इंतजार भी किया। लेकिन वह इसमें कामयाब नहीं हो पाए। पुलिस वालों ने लाठी मारकर भगा दिया। वहीं, अब उन्होंने पैदल ही जाने का फैसला लिया है। उम्मीद है कि शाम तक अंबाला पार कर जाएंगे, उसके बाद वह आगे जाएंगे।

राशन के लिए हेल्पलाइन पर फोन करो तो जवाब मिलता है...कृपया धैर्य रखें

संतोष कुमार ने बताया कि वह गोरखपुर के पास स्थित एक गांव के रहने वाले हैं। 2015 से मोहाली जिले में रह रहे हैं। मजूदरी कर परिवार को चला रहे थे। लॉकडाउन की वजह से काम बंद है। हालात इतने खराब हो गए हैं कि अब पड़ोस के दुकानदारों ने उधार देना बंद कर दिया है। हेल्पलाइन पर राशन के लिए कॉल करते हैं तो जवाब मिलता है... कृपया धैर्य रखें। जबकि कई दिन से वह दोनों टाइम के खाने के लिए लंगर पर निर्भर हैं। आज हालात यह है कि जेब में पैसा तक नहीं है। काम कोई करवा नहीं रहा है।

ऐसे में यहां रहना तो मुश्किल हो गया है। लेकिन अपने घर कैसे जाएं यह भी समस्या गंभीर है। सुना था रेल और बस से प्रशासन बाहरी लोगों को घर भेज रहा है। इसके लिए लाइनों में लगकर धक्के और डंडे तक खाए। लेकिन कोई कामयाबी नहीं मिली है। जो ट्रक और अन्य वाहन जा रहे हैं, वह प्रति सवारी पांच से सात हजार ले रहे हैं। जबकि हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है। संतोष ने केंद्र सरकार से नाराजगी जताने हुए कहा कि सरकार उन्हें पहले बता देती कि लॉकउाउन में इस तरह चलना है, तो हम खुद इंतजाम कर टाइम से अपने घर यूपी चले जाते।
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