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दर्द से कराहता मजदूर बोला... पास बनवा दीजिए, इलाज के लिए घर जाकर जमीन गिरवी रखनी है
Sat, 23 May 2020 01:22 PM IST
खुशबू गोयल
दीपक शाही, जीरकपुर
दीपक शाही, जीरकपुर
Published by: खुशबू गोयल
Updated Sat, 23 May 2020 01:22 PM IST
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धक्के खाने को मजबूर दिहाड़ीदार मजदूर
- फोटो : अमर उजाला
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अब मेरी हिम्मत जवाब देने लगी है, पिछले ढाई महीने से बिस्तर पर बीमार जो पड़ा हूं। कोरोना मेरी जिंदगी में ऐसा लॉकडाउन बनकर आया कि बिस्तर से उठने की लाख कोशिश कर लूं, पर शरीर साथ ही नहीं देता। कहने को तो सिर ढकने के लिए तपती टिन की छत तो है, पर खाने के लिए घर में रोटी नहीं है। एक वक्त का निवाला कहीं से मिल भी गया तो कूल्हे का दर्द है कि पूरी रात सोने ही नहीं देता।
अपना दुखड़ा सुनाते हुए यूवी के इलाहाबाद के रहने वाले करीब 35 साल के दिहाड़ीदार रवि ने टीन की शैड में पड़े-पड़े कहा कि उसे डॉक्टर कहते हैं कि उसका कूल्हा बदलने के इलाज में साढ़े तीन लाख रुपये का खर्च आएगा। यहां तो एक वक्त की रोटी का जुगाड़ तक नहीं है, इतने पैसे कहां से लाऊं। इस उम्मीद में बैठा हूं कि एक दिन कोई मसीहा बनकर आएगा और उसकी मदद से मेरा इंटर स्टेट पास बन जाएगा। जिससे वह अपने शहर उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद लौट सके।
रवि ने आंखों से आंसू पोंछते हुए कहा कि उसका यूपी के इलाहाबाद जाना बेहद जरूरी है। ले-देकर उसके पास गांव में 50 गज जमीन बची है, जिसे वह बेचकर अपना कूल्हा बदलवाना चाहता, लेकिन कोरोना काल में लगे लॉकडाउन में वह डेराबस्सी के मुबारिकपुर में फंस गया है और यहां एक व्यक्ति ने उसे रहने के लिए टीन की शैड दी हुई है।
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दो साल के बच्चों को किसके सहारे छोड़कर जाऊं...
दिहाड़ीदार रवि कहता है, कि पैर में दर्द इतना है कि रो रोकर आंखों के आंसू सूख गए हैं। अब तो रात-दिन कराहता रहता हूं। कभी-कभी तो दर्द इतना बढ़ जाता है कि जीने की इच्छा नहीं होती, पर क्या करूं तीन और दो साल के दो छोटे बच्चे हैं, उनकी परवरिश कौन करेगा। उनके बेहतर भविष्य के लिए डेराबस्सी की एक निजी कंपनी में मजदूरी करता था, लेकिन शरीर जवाब दे गया और नौकरी भी छूट गई।
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अपना दुखड़ा सुनाते हुए यूवी के इलाहाबाद के रहने वाले करीब 35 साल के दिहाड़ीदार रवि ने टीन की शैड में पड़े-पड़े कहा कि उसे डॉक्टर कहते हैं कि उसका कूल्हा बदलने के इलाज में साढ़े तीन लाख रुपये का खर्च आएगा। यहां तो एक वक्त की रोटी का जुगाड़ तक नहीं है, इतने पैसे कहां से लाऊं। इस उम्मीद में बैठा हूं कि एक दिन कोई मसीहा बनकर आएगा और उसकी मदद से मेरा इंटर स्टेट पास बन जाएगा। जिससे वह अपने शहर उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद लौट सके।
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रवि ने आंखों से आंसू पोंछते हुए कहा कि उसका यूपी के इलाहाबाद जाना बेहद जरूरी है। ले-देकर उसके पास गांव में 50 गज जमीन बची है, जिसे वह बेचकर अपना कूल्हा बदलवाना चाहता, लेकिन कोरोना काल में लगे लॉकडाउन में वह डेराबस्सी के मुबारिकपुर में फंस गया है और यहां एक व्यक्ति ने उसे रहने के लिए टीन की शैड दी हुई है।
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दो साल के बच्चों को किसके सहारे छोड़कर जाऊं...
दिहाड़ीदार रवि कहता है, कि पैर में दर्द इतना है कि रो रोकर आंखों के आंसू सूख गए हैं। अब तो रात-दिन कराहता रहता हूं। कभी-कभी तो दर्द इतना बढ़ जाता है कि जीने की इच्छा नहीं होती, पर क्या करूं तीन और दो साल के दो छोटे बच्चे हैं, उनकी परवरिश कौन करेगा। उनके बेहतर भविष्य के लिए डेराबस्सी की एक निजी कंपनी में मजदूरी करता था, लेकिन शरीर जवाब दे गया और नौकरी भी छूट गई।
क्या सरकारी व्यवस्थाएं सिर्फ पढ़े लिखे और समर्थ लोगों के लिए हैं
दिहाड़ीदार बीमार चल रहे रवि ने बताया कि उसे सूचना मिली कि सरकार मजदूरों के लिए मुफ्त में राशन बांट रही है। सारा दिन मेरी पत्नी लाइन में खड़ी रही, उसके बावजूद उसे राशन नहीं मिला। क्योंकि आधार कार्ड पर पता पानीपत का था, बांटने वाले ने कहा की राशन यहां के लोगों के लिए है। पिछले 6 महीने से मेरी टांगों में दर्द था। कई डाक्टरों से दवाई ली पर कोई फर्क नहीं पड़ा।
डेराबस्सी सिविल अस्पताल के डॉक्टर ने एक्स-रे करके बताया की ये केस हिप रिप्लेसमेंट का है और ऑपरेशन के लिए तीन लाख रुपये लगेंगे। सुना है कि सरकार सब को मुफ्त में गांव भेज रही है, हम किस को बोलें कि हमें गांव भेज दें। पता लगा है कि इंटरनेट पर रजिस्ट्रेशन होता है लॉकडाउन में सभी बाजार तो बंद हैं, रजिस्ट्रेशन कहां से होगा।
बड़ी मशक्कत से लोगों से कहकर ट्रेन के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया, बाद में आधार कार्ड पर पानीपत का पता होने से आवेदन रिजेक्ट हो गया है। प्रधानमंत्री जी... आपसे निवेदन है कि क्या सरकारी व्यवस्था सिर्फ पढ़े लिखे और समर्थ नागरिकों के लिए ही है..., आपकी ओर से भेजी गई सभी तरह की मदद हम तक नहीं पहुंच रही है। क्या स्थायी पहचान के लिए कागज का टुकड़ा नहीं होगा, तो आम पब्लिक को भूखे मरना पड़ेगा क्या?
डेराबस्सी सिविल अस्पताल के डॉक्टर ने एक्स-रे करके बताया की ये केस हिप रिप्लेसमेंट का है और ऑपरेशन के लिए तीन लाख रुपये लगेंगे। सुना है कि सरकार सब को मुफ्त में गांव भेज रही है, हम किस को बोलें कि हमें गांव भेज दें। पता लगा है कि इंटरनेट पर रजिस्ट्रेशन होता है लॉकडाउन में सभी बाजार तो बंद हैं, रजिस्ट्रेशन कहां से होगा।
बड़ी मशक्कत से लोगों से कहकर ट्रेन के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया, बाद में आधार कार्ड पर पानीपत का पता होने से आवेदन रिजेक्ट हो गया है। प्रधानमंत्री जी... आपसे निवेदन है कि क्या सरकारी व्यवस्था सिर्फ पढ़े लिखे और समर्थ नागरिकों के लिए ही है..., आपकी ओर से भेजी गई सभी तरह की मदद हम तक नहीं पहुंच रही है। क्या स्थायी पहचान के लिए कागज का टुकड़ा नहीं होगा, तो आम पब्लिक को भूखे मरना पड़ेगा क्या?
प्रशासन ने बुलाया, पर घर नहीं भेजा, 18 मई से सड़क पर हैं...
वहीं एक श्रमिक रिंकू कुमारी ने बताया कि जिस कंपनी में वह काम करती थी वह करीब दो माह से बंद है। जब पैैसे खत्म हो गए तो घर जाने के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन बिहार के छपरा जाने के लिए करवाया था, इसका मैसेज आया कि अगर बरेली, लखनऊ और गोंडा के रास्ते गोरखपुर के लिए आगे का सफर करना है, तो 18 मई को दोपहर 12 बजे जीरकपुर के सत्संग भवन पहुंचें।
यहां आने के बाद प्रशासन ने आगे भेजा ही नहीं, तब से भवन के बाहर धूप में पड़े हैं। इतनी तेज धूप है कि हालत खराब हो रही है। रिंकू ने बताया कि अब तो जो मकान किराए पर लिया था, वह भी छोड़ दिया है तो अब कहां जाएं... समझ में नहीं आ रहा है।
प्यास लगी तो टैंकर से पानी भरने गई
श्रमिक रोशनी ने बताया कि वह लोगों के घरों में काम करती थी, उसे यूपी के हरदोई जाना है, ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के बाद यहां सत्संग भवन में बुलाया गया था, लेकिन जगह नहीं होने के चलते कुछ लोग यहीं रह गए। उनके साथ मैं भी थी। रात सड़क किनारे कट रही है, पूरे दिन इधर उधर पेड़ों की छांव में रहते हैं। दोपहर में प्यास लगी तो पानी के टैंकर से पानी भरने गई, तभी पैर पर तेज रफ्तार बाइक सवार ने टक्कर मार दी और मौके से फरार हो गया पूरा पांव सूज गया है, चल नहीं पा रही हूं और दर्द बहुत ज्यादा है। अब घर कैसे जाऊंगी।
यहां आने के बाद प्रशासन ने आगे भेजा ही नहीं, तब से भवन के बाहर धूप में पड़े हैं। इतनी तेज धूप है कि हालत खराब हो रही है। रिंकू ने बताया कि अब तो जो मकान किराए पर लिया था, वह भी छोड़ दिया है तो अब कहां जाएं... समझ में नहीं आ रहा है।
प्यास लगी तो टैंकर से पानी भरने गई
श्रमिक रोशनी ने बताया कि वह लोगों के घरों में काम करती थी, उसे यूपी के हरदोई जाना है, ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के बाद यहां सत्संग भवन में बुलाया गया था, लेकिन जगह नहीं होने के चलते कुछ लोग यहीं रह गए। उनके साथ मैं भी थी। रात सड़क किनारे कट रही है, पूरे दिन इधर उधर पेड़ों की छांव में रहते हैं। दोपहर में प्यास लगी तो पानी के टैंकर से पानी भरने गई, तभी पैर पर तेज रफ्तार बाइक सवार ने टक्कर मार दी और मौके से फरार हो गया पूरा पांव सूज गया है, चल नहीं पा रही हूं और दर्द बहुत ज्यादा है। अब घर कैसे जाऊंगी।