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Chandigarh News: इमिग्रेशन फर्जीवाड़े में कंपनी संचालक को दो साल की कठोर कैद
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चंडीगढ़। नौ साल पहले सीबीआई की ओर से दर्ज किए गए धोखाधड़ी और इमिग्रेंट एक्ट के मामले में आरोपी बिक्रमजीत विर्क को दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। दर्ज मामले के तहत दोषी ने विभिन्न आवेदकों की इमिग्रेशन क्लियरेंस प्राप्त करने के लिए जाली रोजगार दस्तावेज बनाए थे। मामले में आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि उसे केस में झूठा फंसाया गया था।
मामले में सामने आए तथ्यों को जांचने और दलीलों को सुनने के बाद अदालत ने दोषी की सजा पर फैसला सुनाया है। दर्ज मामले के तहत सीबीआई द्वारा वर्ष 2014 में चंडीगढ़ के सेक्टर-9 स्थित प्रोटेक्टर ऑफ इमिग्रेंट्स (पीओई) के कार्यालय में किए औचक जांच के दौरान यह मामला प्रकाश में आया था। इसके बाद सीबीआई ने 1 दिसंबर 2014 दोषी के खिलाफ आईपीसी की धारा- 420, 467, 468, 471 और इमिग्रेंट एक्ट की धारा के तहत मामला दर्ज किया था।
जेएस इंटरनेशनल के मालिक बिक्रमजीत ने जाली पॉवर ऑफ अटॉर्नी, डिमांड लेटर, विदेशी नियोक्ताओं के समझौते की प्रति और उसका अरबी वीजा में अनुवाद उन्हें गलत तरीके से दिखाया था। इसके चलते सरकारी खजाने को जुलाई 2013 से जनवरी 2014 की अवधि के दौरान प्रति आवेदक 160 सऊदी रियाल (लगभग 56 हजार रुपये) के हिसाब से कुल 3520 सऊदी रियाल का नुकसान हआ। जांच के दौरान पता चला कि 25 इमिग्रेंट को जाली तरीके से कुशल श्रेणी में दिखाते हुए इमिग्रेशन क्लियरेंस कराया। जांच से यह भी पता चला है कि इस जालसाजी के लिए एजेंटों ने मांगपत्र, पॉवर ऑफ अटॉर्नी समेत अन्य दस्तावेज अपने विदेशी नियोक्ताओं से डाक और ई-मेल के माध्यम से मंगाए। इसके बाद सीबीआई की ओर से मामले में केस दर्ज किया गया था।
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मामले में सामने आए तथ्यों को जांचने और दलीलों को सुनने के बाद अदालत ने दोषी की सजा पर फैसला सुनाया है। दर्ज मामले के तहत सीबीआई द्वारा वर्ष 2014 में चंडीगढ़ के सेक्टर-9 स्थित प्रोटेक्टर ऑफ इमिग्रेंट्स (पीओई) के कार्यालय में किए औचक जांच के दौरान यह मामला प्रकाश में आया था। इसके बाद सीबीआई ने 1 दिसंबर 2014 दोषी के खिलाफ आईपीसी की धारा- 420, 467, 468, 471 और इमिग्रेंट एक्ट की धारा के तहत मामला दर्ज किया था।
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जेएस इंटरनेशनल के मालिक बिक्रमजीत ने जाली पॉवर ऑफ अटॉर्नी, डिमांड लेटर, विदेशी नियोक्ताओं के समझौते की प्रति और उसका अरबी वीजा में अनुवाद उन्हें गलत तरीके से दिखाया था। इसके चलते सरकारी खजाने को जुलाई 2013 से जनवरी 2014 की अवधि के दौरान प्रति आवेदक 160 सऊदी रियाल (लगभग 56 हजार रुपये) के हिसाब से कुल 3520 सऊदी रियाल का नुकसान हआ। जांच के दौरान पता चला कि 25 इमिग्रेंट को जाली तरीके से कुशल श्रेणी में दिखाते हुए इमिग्रेशन क्लियरेंस कराया। जांच से यह भी पता चला है कि इस जालसाजी के लिए एजेंटों ने मांगपत्र, पॉवर ऑफ अटॉर्नी समेत अन्य दस्तावेज अपने विदेशी नियोक्ताओं से डाक और ई-मेल के माध्यम से मंगाए। इसके बाद सीबीआई की ओर से मामले में केस दर्ज किया गया था।
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