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बड़ा बयानः 'हमने मांगा नहीं था, सिरसा डेरे ने तो खुद ही दे दिया समर्थन'

Fri, 03 Feb 2017 01:58 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Fri, 03 Feb 2017 01:58 PM IST
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cm parkash singh badal statement on dera sacha sauda support to akali and bjp
प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर बादल - फोटो : अमर उजाला
विधानसभा चुनाव के लिए सिरसा डेरा सच्चा सौदा ने अकाली-भाजपा गठबंधन को समर्थन दिया है और इस पर मुख्यमंत्री बादल ने पहली बार बातचीत की। मुख्यमंत्री ने कहा कि पंजाब का भला चाहने वाला कोई भी अकाली-भाजपा को समर्थन कर सकता है।
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उसमें डेरा सच्चा सौदा भी शामिल है। डेरा की ओर से अकाली-भाजपा को दिया गया फैसला उनका खुद का है। हमने डेरे से समर्थन नहीं मांगा था, बल्कि उन्होंने खुद ही ऐलान कर दिया। वहीं, इस समर्थन से पंथक संगठन नाराज हैं।
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ऐसे में समर्थन से जहां शिअद को मालवा की 40 सीटों का फायदा मिलेगा, वहां पार्टी को नुकसार भी झेलना पड़ेगा। संगठनों ने धमकी दी है कि पंजाब में सरकार किसी की भी बने, मगर यहां पर डेरे का कोई भी गुरमत विरोधी सत्संग या समागम नहीं होने दिया जाएगा।
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वीरवार को करीब आधा दर्जन पंथक जत्थेबंदियों ने एकजुट होकर बादल परिवार और शिअद प्रत्याशियों के सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक बहिष्कार करने का आह्वान सिख समुदाय से किया है।

सिखों का डेरा सच्चा सौदा से हमेशा ही टकराव रहा

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मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल
प्रेस क्लब में बुलाई गई संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में शिरोमणि खालसा पंचायत के कनवीनर राजिंदर सिंह, दल खालसा के नेता सतनाम सिंह पाउंटा साहिब, केंद्रीय श्री गुरु सिंह सभा केनेता गुरप्रीत सिंह, खुशहाल सिंह, सुरिंदर सिंह किशनपुरा, इंटरनेशनल सिख कनफेडरेशन केनेता जगदेव सिंह सोढी और प्रो. गुरदर्शन सिंह ढिल्लों ने कहा कि सिखों का डेरा सच्चा सौदा के साथ हमेशा ही टकराव रहा है, लेकिन शिअद ने सियासी फायदा उठाने के लिए पहले डेरा प्रमुख को अकाल तख्त से माफी दिलाई थी।

हालांकि, सिख संगत के विरोध के चलते जत्थेदार को बाद में अपना फैसला बदलना पड़ा। अब डेरा सिरसा के ताजा फैसले से साफ हो गया है कि शिअद सिखों की हितैषी नहीं बल्कि एक धोखेबाज जत्थेबंदी है। पंथक नेताओं ने सिख समुदाय को बादल परिवार और शिअद को वोट न देने का आह्वान तो किया, लेकिन सिख समुदाय किसे वोट दे, इस सवाल पर कुछ पंथक नेताओं ने कांग्रेस और कुछ ने आम आदमी पार्टी को समर्थन दिए जाने की बात कही। पंथक नेता इस मामले में बंटे हुए नजर आए।

डेरा सच्चा सौदा के फरमान ने बदले राजनीतिक समीकरण

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सुखबीर बादल और कैप्टन
दूसरी ओर, पंजाब विधानसभा चुनाव-2017 में जीत के लिए जोड़तोड़ में लगे सभी राजनीतिक दल सिरसा के डेरा सच्चा सौदा में नतमस्तक हो आए थे। अब डेरे के राजनीतिक विंग ने सत्ताधारी शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन को समर्थन देने का एलान किया है। डेरे की इस घोषणा से प्रदेश में अगली सरकार को लेकर जारी विभिन्न ओपिनियन पोल नतीजों पर सवाल खड़ा हो गया है।

ओपिनियन पोल के लिए सर्वे करने वाली मीडिया एजेंसियों को अब क्षेत्रवार फिर से राजनीतिक दलों को मिलने वाले वोटों का अनुमान लगाना पड़ेगा। 30 जनवरी को डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह ने ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए अपने अनुयायियों को एकजुट होने का संदेश दिया था। इसके बाद से कयास लगाए जा रहे थे कि डेरे का राजनीतिक विंग जल्दी ही किसी राजनीतिक दल को समर्थन का एलान कर देगा।

डेरे का दावा है कि बठिंडा, मानसा, श्री मुक्तसर साहिब, फरीदकोट, फिरोजपुर और मोगा समेत पूरे मालवा क्षेत्र में उसके 50 लाख से अधिक समर्थक हैं, जिनमें से 35 लाख डेरा प्रेमी वोटर हैं। इस तरह मालवा की 40-45 विधानसभा सीटों पर डेरा प्रेमियों का खासा प्रभाव है, जो किसी भी पार्टी की जीत में अहम भूमिका निभा सकते हैं। खास बात यह भी है कि पंजाब के राजनीतिक इतिहास में सरकार उसी दल की बनती रही है, जिसने मालवा में सबसे ज्यादा सीटें जीती हों।

मालवा की 40 से 45 सीटें मिल सकती हैं डेरा समर्थन से

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'सिर्फ लंबी से ही चुनाव लड़कर दिखाएं कैप्टन' - फोटो : File Photo
जाहिर है, डेरा प्रेमियों के समर्थन से यदि अब शिअद-भाजपा गठबंधन मालवा की 40-45 सीटों पर कब्जा जमा लेती है तो उसे तीसरी बार प्रदेश में सरकार में ज्यादा कठिनाई नहीं आएगी, क्योंकि दोआबा और माझा में भी गठबंधन की कई परंपरागत सीटें हैं। फिर भी डेरा प्रेमियों के ही समर्थन के बावजूद गठबंधन के लिए यह इतना आसान नहीं रह गया है। हर सीट को गठबंधन को त्रिकोणीय जंग लड़नी है।

उसके सामने कांग्रेस के अलावा आम आदमी पार्टी है, जिन्हें विभिन्न मीडिया एजेंसियों ने इस बार चुनाव में पहले दो स्थान पर रहने वाली पार्टियां माना है। डेरा सच्चा सौदा के समर्थन की घोषणा के साथ ही शिअद का पारंपरिक पंथक वोटर नाराज हो गया है। बीते 24 घंटे में ही पंथक सिखों ने कई स्थानों पर गठबंधन के विरोध का एलान कर दिया है।

इस तरह शिअद-भाजपा गठबंधन जहां डेरे के समर्थन से फायदे में दिखाई दे रहा है, वहीं पंथक वोटरों का गुस्सा गठबंधन को नुकसान भी पहुंचा सकता है। वहीं, पंथक वोटर अगर शिअद से अलग हुए तो यह वोटर कांग्रेस या आप में बंट सकते हैं, जिससे इन दो दलों की स्थिति में और सुधार आ सकता है। यानी, पंजाब में ओपिनियन पोल का सारा गणित डेरे के फरमान से बदल गया है। शिअद-भाजपा गठबंधन ने जहां राहत महसूस की है, वहीं कांग्रेस और आप को अपने वोटों का फिर से हिसाब-किताब लगाना होगा।

 
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