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करोड़ों रुपये के घोटाले में 3 सरकारी कर्मचारियों समेत पांच पर चार्ज फ्रेम
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चंडीगढ़। चार साल पहले एक निजी कंपनी के पांच करोड़ रुपये के बकाया वैल्यू एडेड टैक्स को पांच हजार रुपये में निपटाने के मामले में यूटी प्रशासन के एक्साइज एंड टैक्सेशन विभाग के तीन कर्मचारियों समेत पांच आरोपियों पर जिला अदालत में चार्ज फ्रेम कर दिए गए हैं।
आरोपियों कंपनी का निदेशक एनआर मुंजाल, कंपनी का कर्मचारी बिपिन कुमार मिश्रा, एक्साइज एंड टैक्सेशन डिपार्टमेंट के कर्मचारी राम तीर्थ, अंकित अग्रवाल और शेफाली शामिल हैं। इनके खिलाफ 11 अक्तूूबर 2022 से अदालत में मुकदमा शुरू होगा। सभी पर आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471, 120बी के तहत मुकदमा चलेगा। अदालत ने शेफाली और अंकित अग्रवाल पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम एक्ट की धाराएं भी लगाई हैं।
यह था मामलाऱ्
तत्कालीन असिस्टेंट एक्साइज एंड टैक्सेशन कमिश्नर रमेश कुमार चौधरी की शिकायत पर विजलेंस ने यह मामला दर्ज किया था। एफआईआर के अनुसार, विभाग ने एक निजी कंपनी को वर्ष 2011 में अप्रैल माह से जून तक का लंबित वैट टैक्स का नोटिस भेजा था। इसके हिसाब से कंपनी को पांच करोड़ 90 लाख 53 हजार 342 रुपये का टैक्स देना था। कंपनी ने इस नोटिस के खिलाफ अपील दायर की। फिर विभाग ने वैट ट्रिब्यूनल में अपील दायर कर दी। वैट ट्रिब्यूनल में सुनवाई के दौरान कंपनी ने बताया कि जिस टैक्स की बात की गई है उसको तो पांच हजार रुपये में डिस्पोज कर दिया गया था। विभाग ने जब मामले की जांच की तो पता चला कि डिस्पोजल रजिस्टर में छेड़छाड़ कर एक फर्जी आदेश तैयार किया गया था। उसी के आधार पर 5.9 करोड़ रुपये से ज्यादा का वैट पांच हजार रुपये में निपटा दिया गया। खुलासा होने पर विभाग ने मामले की शिकायत पुलिस को शिकायत दी। पुलिस ने शिकायत के आधार पर 2018 में आरोपियों की गिरफ्तारी शुरू कर दी।
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आरोपियों कंपनी का निदेशक एनआर मुंजाल, कंपनी का कर्मचारी बिपिन कुमार मिश्रा, एक्साइज एंड टैक्सेशन डिपार्टमेंट के कर्मचारी राम तीर्थ, अंकित अग्रवाल और शेफाली शामिल हैं। इनके खिलाफ 11 अक्तूूबर 2022 से अदालत में मुकदमा शुरू होगा। सभी पर आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471, 120बी के तहत मुकदमा चलेगा। अदालत ने शेफाली और अंकित अग्रवाल पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम एक्ट की धाराएं भी लगाई हैं।
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यह था मामलाऱ्
तत्कालीन असिस्टेंट एक्साइज एंड टैक्सेशन कमिश्नर रमेश कुमार चौधरी की शिकायत पर विजलेंस ने यह मामला दर्ज किया था। एफआईआर के अनुसार, विभाग ने एक निजी कंपनी को वर्ष 2011 में अप्रैल माह से जून तक का लंबित वैट टैक्स का नोटिस भेजा था। इसके हिसाब से कंपनी को पांच करोड़ 90 लाख 53 हजार 342 रुपये का टैक्स देना था। कंपनी ने इस नोटिस के खिलाफ अपील दायर की। फिर विभाग ने वैट ट्रिब्यूनल में अपील दायर कर दी। वैट ट्रिब्यूनल में सुनवाई के दौरान कंपनी ने बताया कि जिस टैक्स की बात की गई है उसको तो पांच हजार रुपये में डिस्पोज कर दिया गया था। विभाग ने जब मामले की जांच की तो पता चला कि डिस्पोजल रजिस्टर में छेड़छाड़ कर एक फर्जी आदेश तैयार किया गया था। उसी के आधार पर 5.9 करोड़ रुपये से ज्यादा का वैट पांच हजार रुपये में निपटा दिया गया। खुलासा होने पर विभाग ने मामले की शिकायत पुलिस को शिकायत दी। पुलिस ने शिकायत के आधार पर 2018 में आरोपियों की गिरफ्तारी शुरू कर दी।
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