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Chandigarh News: अब हाशिए पर पहुंची चंडीगढ़ की स्क्रू इंडस्ट्री
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चंडीगढ़। कभी एशिया में नंबर वन मानी जाने वाली चंडीगढ़ की स्क्रू और नट-बोल्ट इंडस्ट्री आज हाशिए पर पहुंच गई है। इंडस्ट्रियल एरिया फेज-1 और फेज-2 में जहां पहले ऐसी करीब 600 से ज्यादा इकाइयां सक्रिय थीं, वहीं अब मुश्किल से करीब 200 यूनिट ही बची हैं। कई दशक तक देश के साथ विदेशों तक यहां बने स्क्रू की सप्लाई होती रही लेकिन लगातार बढ़ती लागत और प्रशासनिक कड़े नियमों ने इस पुरानी पहचान को कमजोर कर दिया।
उद्योग से जुड़े उद्यमियों के अनुसार 1991 के आसपास यह इंडस्ट्री अपने स्वर्णिम दौर में थी। उस समय उत्पादन लागत कम, बिजली सस्ती और प्रशासनिक नियम लचीले होने से स्क्रू उद्योग तेजी से फला-फूला। इंडस्ट्रियल एरिया में हर दूसरी-तीसरी फैक्ट्री स्क्रू या नट-बोल्ट बनाने वाली होती थी, लेकिन अब गिनी-चुनी फैक्ट्रियां ही काम संभाले हुए हैं। उद्यमियों का कहना है कि चंडीगढ़ में लीज-होल्ड प्रॉपर्टी पर लोन और विस्तार की सुविधा सीमित है। ऐसे में कई उद्योगपति मोहाली, डेराबस्सी और राजकोट-सूरत जैसे क्षेत्रों की ओर शिफ्ट हो गए जहां जमीन फ्री-होल्ड और विस्तार आसान है। दूसरी ओर, सरकार ने कई फास्टनर्स पर आईएसआई मार्क अनिवार्य कर दिया है। इससे क्वालिटी तो बेहतर होगी लेकिन छोटे उद्यमी इसके लिए जरूरी मानकों और निवेश को लेकर चिंतित हैं।
कई किस्मों के स्क्रू बनते थे चंडीगढ़ में
एमएस स्टील, अलॉय स्टील, EN-8 और EN-9 स्टील से सेल्फ टैपिंग स्क्रू, मशीन स्क्रू, नट-बोल्ट, रिविट्स, स्पिलिट पिन सहित कई प्रकार के फास्टनर्स तैयार किए जाते थे।
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उद्योग जगत की राय...
बढ़ी लागत और कड़े नियमों से कमजोर हुआ उद्योग
चंडीगढ़ से कई उद्यमी मोहाली और डेराबस्सी चले गए हैं। यदि प्रशासन चाहे तो नीतिगत रियायतें देकर स्क्रू इंडस्ट्री को फिर से मजबूत किया जा सकता है। पहले जब यह इंडस्ट्री चरम पर थी, तब चंडीगढ़ की एक अलग पहचान बन चुकी थी। -एएल अग्रवाल, प्रेसिडेंट, चंडीगढ़ इंडस्ट्रियल फास्टनर्स एसोसिएशन
10 गुना बढ़ चुकी है उत्पादन लागत
मैंने 1991 में काम शुरू किया था। तब उत्पादन लागत काफी कम थी। आज एमएस वायर की कीमत ही दस गुना बढ़ चुकी है। बिजली भी महंगी है और विस्तार के संसाधन नहीं। इंडस्ट्री को बचाना है तो रियायतों के साथ सुविधाएं देनी होंगी। -राधव कुमार, चंडीगढ़ इंडस्ट्रियल यूथ एसोसिएशन
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उद्योग से जुड़े उद्यमियों के अनुसार 1991 के आसपास यह इंडस्ट्री अपने स्वर्णिम दौर में थी। उस समय उत्पादन लागत कम, बिजली सस्ती और प्रशासनिक नियम लचीले होने से स्क्रू उद्योग तेजी से फला-फूला। इंडस्ट्रियल एरिया में हर दूसरी-तीसरी फैक्ट्री स्क्रू या नट-बोल्ट बनाने वाली होती थी, लेकिन अब गिनी-चुनी फैक्ट्रियां ही काम संभाले हुए हैं। उद्यमियों का कहना है कि चंडीगढ़ में लीज-होल्ड प्रॉपर्टी पर लोन और विस्तार की सुविधा सीमित है। ऐसे में कई उद्योगपति मोहाली, डेराबस्सी और राजकोट-सूरत जैसे क्षेत्रों की ओर शिफ्ट हो गए जहां जमीन फ्री-होल्ड और विस्तार आसान है। दूसरी ओर, सरकार ने कई फास्टनर्स पर आईएसआई मार्क अनिवार्य कर दिया है। इससे क्वालिटी तो बेहतर होगी लेकिन छोटे उद्यमी इसके लिए जरूरी मानकों और निवेश को लेकर चिंतित हैं।
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कई किस्मों के स्क्रू बनते थे चंडीगढ़ में
एमएस स्टील, अलॉय स्टील, EN-8 और EN-9 स्टील से सेल्फ टैपिंग स्क्रू, मशीन स्क्रू, नट-बोल्ट, रिविट्स, स्पिलिट पिन सहित कई प्रकार के फास्टनर्स तैयार किए जाते थे।
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उद्योग जगत की राय...
बढ़ी लागत और कड़े नियमों से कमजोर हुआ उद्योग
चंडीगढ़ से कई उद्यमी मोहाली और डेराबस्सी चले गए हैं। यदि प्रशासन चाहे तो नीतिगत रियायतें देकर स्क्रू इंडस्ट्री को फिर से मजबूत किया जा सकता है। पहले जब यह इंडस्ट्री चरम पर थी, तब चंडीगढ़ की एक अलग पहचान बन चुकी थी। -एएल अग्रवाल, प्रेसिडेंट, चंडीगढ़ इंडस्ट्रियल फास्टनर्स एसोसिएशन
10 गुना बढ़ चुकी है उत्पादन लागत
मैंने 1991 में काम शुरू किया था। तब उत्पादन लागत काफी कम थी। आज एमएस वायर की कीमत ही दस गुना बढ़ चुकी है। बिजली भी महंगी है और विस्तार के संसाधन नहीं। इंडस्ट्री को बचाना है तो रियायतों के साथ सुविधाएं देनी होंगी। -राधव कुमार, चंडीगढ़ इंडस्ट्रियल यूथ एसोसिएशन