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विशेषज्ञों ने ढूंढी नई तकनीक: डायबिटिक न्यूरोपैथी के मरीजों के इलाज की राह आसान, PGI बना पहला संस्थान
Wed, 04 Sep 2024 01:38 PM IST
निवेदिता वर्मा
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Wed, 04 Sep 2024 01:38 PM IST
सार
पीजीआई के एंडोक्राइनोलॉजी विभाग के प्रो. आशु रस्तोगी के मार्गदर्शन में किए गए शोध के परिणाम से विश्व में पहली बार ऐसे मरीजों की जांच का सही तरीका पता चला है। इसमें जांच के लिए उपयोग की जाने वाली मशीन डेक्सा की जगह एचआरपीक्यूसीटी का उपयोग किया गया। इससे उन मरीजों की हड्डियों की कोशिकाओं की वास्तविक स्थिति सटीक रूप से सामने आई।
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चंडीगढ़ पीजीआई
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
चंडीगढ़ पीजीआई के विशेषज्ञों ने डायबिटिक न्यूरोपैथी के मरीजों में समय रहते बीमारी का पता लगाने की नई तकनीक तलाश ली है। अभी पुरानी तकनीक से किए जा रहे जांच में सटीक रिपोर्ट न आने से इन मरीजों का इलाज समय पर शुरू नहीं हो पा रहा था।
पीजीआई के एंडोक्राइनोलॉजी विभाग के प्रो. आशु रस्तोगी ने बताया कि यह मशीन पीजीआई में उपलब्ध है लेकिन इसका उपयोग हड्डी संबंधी मर्ज की जांच में किया जाता रहा है जबकि डायबिटिक न्यूरोपैथी के मरीजों की हड्डियों की कोशिकाओं की सही जानकारी न मिलने से उनका इलाज प्रभावित हो रहा था इसलिए जांच की तकनीक में बदलाव करने का निर्णय लिया गया। चार साल पहले शुरू किए गए शोध में दो वर्गों में मरीजों को शामिल किया गया। एक वर्ग में डायबिटिक न्यूरोपैथी के मरीजों को रखा गया और दूसरे में 10 साल पुराने डायबिटिक मरीजों को शामिल किया गया। सभी मरीजों की जांच पहले डेक्सा से की गई।
चौंकाने वाली बात यह थी कि दोनों वर्ग में मरीजों की हड्डी की आंतरिक स्थिति एक जैसी मिली जो संभव नहीं था। डेक्सा सिर्फ हड्डियों की बनावट को इंगित करती है इसलिए न्यूरोपैथी वाले वर्ग में शामिल मरीजों की जांच एचआरपीक्यूसीटी मशीन से गई। इस जांच में इन मरीजों की हड्डियों की कोशिकाएं बेहद कमजोर पाई गईं जिससे यह स्पष्ट हुआ कि सही जांच न होने के कारण समय रहते प्रबंधन नहीं हो पाने से मरीजों की स्थिति तेजी से खराब हो रही है।
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- झनझनाहट या जलन महसूस होना
- तीव्र दर्द या ऐंठन
- मांसपेशियों में कमजोरी
- स्पर्श के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता। कुछ लोगों के लिए बिस्तर की चादर का वजन भी दर्दनाक हो सकता है
- पैरों की गंभीर समस्या जैसे अल्सर, संक्रमण तथा हड्डी व जोड़ों की क्षति
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पीजीआई के एंडोक्राइनोलॉजी विभाग के प्रो. आशु रस्तोगी ने बताया कि यह मशीन पीजीआई में उपलब्ध है लेकिन इसका उपयोग हड्डी संबंधी मर्ज की जांच में किया जाता रहा है जबकि डायबिटिक न्यूरोपैथी के मरीजों की हड्डियों की कोशिकाओं की सही जानकारी न मिलने से उनका इलाज प्रभावित हो रहा था इसलिए जांच की तकनीक में बदलाव करने का निर्णय लिया गया। चार साल पहले शुरू किए गए शोध में दो वर्गों में मरीजों को शामिल किया गया। एक वर्ग में डायबिटिक न्यूरोपैथी के मरीजों को रखा गया और दूसरे में 10 साल पुराने डायबिटिक मरीजों को शामिल किया गया। सभी मरीजों की जांच पहले डेक्सा से की गई।
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चौंकाने वाली बात यह थी कि दोनों वर्ग में मरीजों की हड्डी की आंतरिक स्थिति एक जैसी मिली जो संभव नहीं था। डेक्सा सिर्फ हड्डियों की बनावट को इंगित करती है इसलिए न्यूरोपैथी वाले वर्ग में शामिल मरीजों की जांच एचआरपीक्यूसीटी मशीन से गई। इस जांच में इन मरीजों की हड्डियों की कोशिकाएं बेहद कमजोर पाई गईं जिससे यह स्पष्ट हुआ कि सही जांच न होने के कारण समय रहते प्रबंधन नहीं हो पाने से मरीजों की स्थिति तेजी से खराब हो रही है।
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आसान और सुरक्षित तकनीक
प्रो. आशु रस्तोगी ने बताया कि इस मशीन की मदद से अब मरीजों को बायोप्सी की लंबी प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता है। इस मशीन से स्कैनिंग कर रिपोर्ट तुरंत मिल जाती है। बड़ी बात यह है कि इसमें रेडिएशन का खतरा न के बराबर होगा। उन्होंने बताया कि अब तक देश के किसी भी चिकित्सा संस्थान में यह मशीन स्थापित नहीं की गई है। पीजीआई चंडीगढ़ देश का ऐसा संस्थान है जहां इसका लाभ मरीजों को मिल रहा है। अभी प्रौद्योगिकी संस्थान में आविष्कार के लिए इसका उपयोग किया जा रहा है।हड्डी रोगों के इलाज में भी कारगर
ऑस्टियोपोरोसिस, प्राथमिक हाइपरथायरायडिज्म, स्टेरॉयड से हड्डी का नुकसान, मधुमेह में हड्डी रोग, सीलिएक रोग, प्रत्यारोपण हड्डी रोग जैसे विकारों के शुरुआती निदान के लिए भी यह मशीन बेहद उपयोगी है। थायराइड और पिट्यूटरी विकार व अन्य दुर्लभ हड्डी रोग के इलाज में इसके अच्छे परिणाम मिल रहे हैं। इस शोध के बाद से डायबिटिक न्यूरोपैथी के मरीजों के लिए भी यह मशीन कारगर सिद्ध हो गई है।जानें क्या है डायबिटिक न्यूरोपैथी
डायबिटिक न्यूरोपैथी मधुमेह (डायबिटीज) के कारण नसों को नुकसान पहुंचने की स्थिति है। इसमें अनियंत्रित उच्च रक्त शर्करा (हाइपरग्लाइसेमिया) मुख्य रूप से तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है जिसमें पैर व अन्य अंग और मांसपेशियां शामिल हैं।डायबिटिक न्यूरोपैथी के लक्षण
- सुन्नपन, दर्द या तापमान में परिवर्तन महसूस करने की क्षमता में कमी- झनझनाहट या जलन महसूस होना
- तीव्र दर्द या ऐंठन
- मांसपेशियों में कमजोरी
- स्पर्श के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता। कुछ लोगों के लिए बिस्तर की चादर का वजन भी दर्दनाक हो सकता है
- पैरों की गंभीर समस्या जैसे अल्सर, संक्रमण तथा हड्डी व जोड़ों की क्षति